सुवेंदु से डर लगता है, गला ममता बनर्जी का भी सूखता है! नंदीग्राम छोड़ अब भबानीपुर के भरोसे, क्यों?
नंदीग्राम में हार के बाद ममता बनर्जी ने भबानीपुर को अपनी सुरक्षित सीट के रूप में चुना है. सुवेंदु अधिकारी की मजबूत चुनौती ने बंगाल की राजनीति का समीकरण बदल दिया है.
पश्चिम बंगाल की राजनीति में एक बार फिर यह सवाल चर्चा में है कि क्या ममता बनर्जी (Mamata Banerjee) इस बार नंद्रग्राम से दूरी बनाकर भबानीपुर से चुनाव लड़ने का फैसला कर चुकी हैं? इसका जवाब है, हां. टीएमसी की ओर से 17 मार्च को जारी सभी प्रत्याशियों की सूची में उन्हें भबानीपुर से प्रत्याशी बनाया गया है. संकेत साफ है कि 2021 की हार के बाद उन्होंने नंदीग्राम की बजाय भबानीपुर को प्राथमिकता दी है. यही सीट उन्हें राजनीतिक सुरक्षा और स्थिरता भी देती है. वोट बैंक के लिहाज से भबानीपुर उनके लिए सेफ सीट है.
2021 का नंदीग्राम चुनाव क्यों बना टर्निंग प्वाइंट?
साल 2021 का विधानसभा चुनाव बंगाल की राजनीति में बड़ा मोड़ साबित हुआ. नंदीग्राम, जो कभी ममता बनर्जी के आंदोलन की पहचान था, वहीं उन्हें सुवेंद्र अधिकारी के खिलाफ कड़ी टक्कर में हार का सामना करना पड़ा. यह हार मामूली अंतर से जरूर थी, लेकिन इसका राजनीतिक संदेश बहुत बड़ा था. अब चुनौती सीधी और मजबूत है.
सुवेंदु अधिकारी की चुनौती कितनी मजबूत है?
सुवेंदु अधिकारी पहले ममता बनर्जी के करीबी सहयोगी रहे, लेकिन बीजेपी में शामिल होने के बाद उन्होंने उसी जमीन पर उन्हें चुनौती दी. नंदीग्राम में उनकी पकड़ मजबूत मानी जाती है और स्थानीय स्तर पर उनका प्रभाव लगातार बना हुआ है. यही वजह है कि यह सीट अब सिर्फ चुनावी मैदान नहीं, बल्कि प्रतिष्ठा का युद्ध बन चुकी है.
ममता बनर्जी ने भबानीपुर को ‘सेफ सीट’ क्यों चुना?
नंदीग्राम में हार के बाद ममता बनर्जी ने भबानीपुर से उपचुनाव लड़कर विधानसभा में वापसी की. भबानीपुर को उनका मजबूत गढ़ माना जाता है, जहां शहरी वोटर, अल्पसंख्यक समर्थन और पार्टी संगठन उनके पक्ष में मजबूती से खड़े रहते हैं. यहां चुनावी जोखिम कम होता है, इसलिए यह उनके लिए “सेफ सीट” के रूप में देखा जाता है.
क्या वाकई ममता बनर्जी सुवेंदु अधिकारी से डरती हैं?
राजनीति में 'डर' शब्द उतना सही नहीं होता, जितना दिखता है. असल में यह रणनीति का हिस्सा होता है. नंदीग्राम में दोबारा चुनाव लड़ना अब सिर्फ जीत-हार का मामला नहीं, बल्कि छवि और साख से जुड़ा है. अगर फिर हार होती है, तो इसका असर पूरे राज्य की राजनीति पर पड़ सकता है. इसलिए भबानीपुर का चयन एक सोची-समझी रणनीति माना जा रहा है.
नंदीग्राम बनाम भबानीपुर - क्या है बड़ा राजनीतिक संदेश?
यह मुकाबला सिर्फ दो सीटों की लड़ाई नहीं है, बल्कि बंगाल की बदलती राजनीति का संकेत है. एक तरफ ममता बनर्जी का पारंपरिक और शहरी वोट बैंक है, तो दूसरी तरफ बीजेपी और सुवेंदु अधिकारी की बढ़ती चुनौती. यह टकराव दिखाता है कि राज्य की राजनीति अब एकतरफा नहीं रही.
TMC की रणनीति क्या संकेत देती है?
तृणमूल कांग्रेस ने बंगाल की 294 में से 2ू91 सीटों पर उम्मीदवारों की घोषणा कर दी है. नंदीग्राम से पार्टी ने नए चेहरे को मौका दिया है, जिससे साफ संकेत मिलता है कि पार्टी अब इस सीट पर अलग रणनीति के साथ आगे बढ़ रही है. ममता बनर्जी खुद सुरक्षित सीट से चुनाव लड़कर पूरे राज्य पर फोकस करना चाहती हैं.
चुनाव कार्यक्रम क्या कहता है?
चुनाव आयोग के अनुसार, पश्चिम बंगाल में दो चरणों में मतदान होगा. पहले चरण में 152 सीटों पर और दूसरे चरण में 142 सीटों पर वोट डाले जाएंगे. मतदान 23 और 29 अप्रैल को होगा, जबकि मतगणना 4 मई को की जाएगी.
क्या यह फैसला राजनीतिक मजबूरी है या रणनीतिक चाल?
यह एक अहम सवाल है कि क्या ममता बनर्जी का भबानीपुर पर भरोसा मजबूरी है या रणनीति? राजनीतिक जानकारों का मानना है कि टीएमसी की यह एक “स्मार्ट मूव” है. जहां जोखिम ज्यादा है, वहां से दूरी और जहां जीत की संभावना मजबूत है, वहां से चुनाव- यही आज की राजनीति का यथार्थ है.