किस्से नेताओं के : बंगाल का वो CM जिसके सियासी 'पाप' ने कांग्रेस की वापसी लगभग खत्म कर दी, क्या है इसकी कहानी?
बंगाल की राजनीति का वह किस्सा जहां एक सीएम के सख्त फैसलों और इमरजेंसी दौर की राजनीति ने कांग्रेस की जमीन कमजोर कर दी और उसकी वापसी दशकों तक मुश्किल हो गई. पूरी कहानी यहां पढ़ें.
पश्चिम बंगाल की राजनीति में कुछ घटनाएं ऐसी हुईं, जो न सिर्फ सत्ता बदलने का जरिया साबित हुईं, बल्कि पूरे युग की दिशा बदल दी. 1960 के दशक के अंत में ऐसा ही एक मोड़ आया, जब खाद्य संकट, महंगाई और जनता के बढ़ते असंतोष ने कांग्रेस की मजबूत पकड़ को हिला दिया. सड़कों पर “चावल चाहिए” जैसे नारे गूंज रहे थे और सत्ता के खिलाफ गुस्सा खुलकर सामने आ रहा था. इसी उथल-पुथल के बीच एक नए नेतृत्व की तलाश शुरू हुई, और आगे चलकर सिद्धार्थ शंकर रे (Siddhartha Shankar Ray) का नाम सामने आया, जो 1972 में प्रदेश का सीएम बने. वह एक तेज-तर्रार वकील और निर्णायक प्रशासक माने जाते थे. उनके फैसलों, सख्ती और राजनीतिक परिस्थितियों ने न सिर्फ उस दौर को परिभाषित किया, बल्कि आने वाले दशकों तक बंगाल की सत्ता संरचना को प्रभावित किया. यह कहानी एक ऐसे नेता और समय की है, जहां हर निर्णय इतिहास का रुख बदलनकी क्षमता रखता था.
दरअसल, राय का कार्यकाल सिर्फ फैसलों का नहीं, बल्कि सियासी धारणाओं में बदलाव का भी दौर था. उन्हें एक निर्णायक और सक्षम प्रशासक माना गया, लेकिन उनकी सख्ती ने धीरे-धीरे कांग्रेस की छवि पर भारी पड़ने लगी. दयाबती रॉय ओर पार्थ सारथी बनर्जी की पुस्तक 'कॉन्टेम्पोरेरी पॉलिटिक्स इन वेस्ट बंगाल' शुतापा पॉल की बुक 'दीदी : द अनटोल्ड ममता बनर्जी', कूमी कपूर की बुूक : 'इमरजेंसी - अ पर्सनल हिस्ट्री', रामचंद्र गुहा की पुस्तक : 'इंडिया अफ्टर गांधी', कुलदीप नैयर की 'इमरजेंसी रिटोल्ड' और प्रणब मुखर्जी की पुस्तक : द ड्रैमेटिक डिकैड : द इंदिरा गांधी ईयर्स में इसका जिक्र है. यहां पर इस बात का जिक्र कर दें किसी सभी पुस्तकों के लेखकों ने सिद्धार्थ शंकर रे को लेकर अपने हिसाब से कुछ कुछ अंशों को जिक्र किया है, जिससे इस बात की झलक मिलती है कि उस दौर के सीएम सिद्धार्थ शंकर रे दौर एकतरफा नहीं, बल्कि बहुआयामी था.
1. क्या एक चुनाव ने पूरे बंगाल की राजनीति बदल दी?
दीदी : द अनटोल्ड ममता बनर्जी की लेखिका शुतापा पॉल के मुताबिक पश्चिम बंगाल की राजनीति में 1960 के दशक के अंत को एक निर्णायक मोड़ माना जाता है. उस दौर में कांग्रेस के पतन के लिए सिर्फ सिद्धार्थ रे को नहीं, बल्कि उनसे पहले सीएम बने प्रफुल्ल चंद्र सेन भी जिम्मेदार थे. कांग्रेस सरकार जनता के गहरे असंतोष का सामना कर रही थी. खाद्य संकट, महंगाई और प्रशासनिक सख्ती ने लोगों के भीतर ऐसा गुस्सा पैदा किया, जिसने 1967 के चुनाव को सिर्फ एक लोकतांत्रिक प्रक्रिया नहीं बल्कि व्यवस्था के खिलाफ जनविद्रोह बना दिया. “चावल चाहिए” जैसे नारे उस समय सिर्फ मांग नहीं, बल्कि सत्ता के खिलाफ जनभावना का प्रतीक बन गए. इसी चुनाव ने कांग्रेस की अजेय छवि को तोड़ दिया और बंगाल में राजनीतिक अस्थिरता की नींव रख दी, जो आगे चलकर बड़े बदलावों का कारण बनी.
2. कैसे नक्सल आंदोलन ने सत्ता पलट दी?
1970 के दशक की शुरुआत में बंगाल एक नए संकट से जूझ रहा था. नक्सल आंदोलन, राजनीतिक हिंसा और प्रशासनिक चुनौती. इसी उथल-पुथल के बीच सिदार्थ शंकर रे 1972 बंगाल के मुख्यमंत्री बने. वे एक मजबूत कानूनी पृष्ठभूमि वाले, तेज-तर्रार और निर्णायक नेता माने जाते थे, जिनकी दिल्ली तक राजनीतिक पकड़ थी. उस समय राज्य में कानून-व्यवस्था सबसे बड़ी चुनौती थी. उन्होंने सख्त प्रशासनिक दृष्टिकोण अपनाया, बड़े पैमाने पर गिरफ्तारियां हुईं और पुलिस कार्रवाई तेज की गई. उनके इस रवैये की तुलना कई बार आज के यूपी के सीएम की तरह की जाती थी. ऐसा इसलिए कि रे को “कानून-व्यवस्था आधारित सख्त शासन शैली” के लिए जाना जाता है. हालांकि, समय और परिस्थितियां पूरी तरह अलग थीं.
3. क्या सख्ती ने जनता को कांग्रेस से दूर किया?
सिद्धार्थ शंकर रे का शासनकाल एक ऐसे दौर का प्रतिनिधित्व करता है, जहां प्रशासनिक सख्ती और लोकतांत्रिक अपेक्षाएं आमने-सामने थीं. सरकार का दावा था कि नक्सल हिंसा और अराजकता को रोकने के लिए कठोर कदम जरूरी हैं. जबकि विपक्ष और जनता के एक बड़े हिस्से ने इसे दमनकारी नीति माना. इसी समय उनकी छवि एक “कड़े प्रशासक” की बन गई, जिसने राज्य को नियंत्रण में लाने की कोशिश तो की, लेकिन जनता और सरकार के बीच दूरी भी बढ़ा दी. यही वह चरण था जहां कांग्रेस की जमीनी पकड़ कमजोर पड़ने लगी और राजनीतिक विश्वास का संकट गहराने लगा.
4. इमरजेंसी ने Congress की छवि को कैसे बदल दिया?
25 जून 1975 में देश भर में Emergency लागू हुई, जिसने भारतीय लोकतंत्र को गहरे विवादों में डाल दिया. उस समय देश की पीएम इंदिरा गांधी थीं. उनके करीबी सलाहकारों में सिद्धार्थ शंकर राय का नाम प्रमुखता से लिया जाता था. कई तथ्य बताते हैं कि सिद्धार्थ शंकर ने ही संवैधानिक प्रावधानों के तहत आपातकाल लगाने का कानूनी प्रस्ताव इंदिरा को दिया था. इस फैसले के बाद प्रेस नियंत्रण, राजनीतिक गिरफ्तारियां और नागरिक अधिकारों पर प्रतिबंध जैसे कदम उठे, जिससे जनता के एक बड़े वर्ग में असंतोष बढ़ा. इसी दौर ने उनकी छवि को “कड़े कानूनी दिमाग” से बदलकर “विवादित राजनीतिक सलाहकार” के रूप में स्थापित कर दिया.
5. 1977 का चुनाव राजनीतिक जनादेश था या प्रतिशोध?
पश्चिम बंगाल में 1977 का चुनाव भारतीय राजनीति में एक ऐतिहासिक मोड़ साबित हुआ, जब जनता ने कांग्रेस के खिलाफ निर्णायक रुख अपनाया. इस चुनाव में लेफ्ट फ्रंट सत्ता में आया और ज्योति बसु के नेतृत्व में वामपंथ ने एक मजबूत राजनीतिक आधार स्थापित किया. यह केवल सरकार बदलने का नहीं, बल्कि जनता के भरोसे के पुनर्निर्माण का दौर था. कांग्रेस की हार के पीछे इमरजेंसी का प्रभाव, संगठनात्मक कमजोरी और नेतृत्व संकट प्रमुख कारण बने, जिसके चलते पार्टी धीरे-धीरे राज्य की राजनीति से लगभग बाहर होती चली गई.
6. क्यों कहा जाता है कांग्रेस का वनवास उन्हीं फैसलों की देन?
1977 के बाद कांग्रेस बंगाल में लंबे समय तक सत्ता से दूर रही, जो लगभग 2011 तक चला. इस अवधि में वामपंथी शासन ने गांव-गांव तक अपनी पकड़ मजबूत की, जबकि कांग्रेस गुटबाजी और कमजोर संगठन से जूझती रही. इसी संदर्भ में रामचंद्र गुहा जैसे कई इतिहासकार मानते हैं कि सिद्धार्थ शंकर राय के दौर की सख्ती, इमरजेंसी से जुड़ी छवि और जनता से बढ़ती दूरी ने कांग्रेस की राजनीतिक जमीन को कमजोर कर दिया. हालांकि, यह भी माना जाता है कि उस समय की परिस्थितियां अत्यंत जटिल थीं और राज्य को स्थिर करना भी एक बड़ी चुनौती थी, इसलिए इसे केवल एकतरफा निर्णय के रूप में नहीं देखा जा सकता.
7. क्या Ray थे कांग्रेस के ‘योगी ’ ?
आज जब लोग सिद्धार्थ शंकर राय की प्रशासनिक शैली की तुलना करते हैं, तो अक्सर उन्हें “कठोर कानून-व्यवस्था मॉडल” से जोड़ा जाता है, जिसकी झलक आज के उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की शैली में भी देखी जाती है. हालांकि, दोनों समय, संदर्भ और राजनीतिक परिस्थितियां अलग हैं, फिर भी तुलना इसलिए की जाती है क्योंकि दोनों को सख्त प्रशासन, कानून-व्यवस्था पर जोर और निर्णायक कार्रवाई के लिए जाना जाता है. राय का दौर अंततः यह संदेश छोड़ता है कि राजनीति में फैसलों से ज्यादा उनकी सार्वजनिक धारणा तय करती है कि नेता इतिहास में कैसे याद किया जाएगा. कहने का मतलब है कि बतौर सीएम सिद्धार्थ शंकर राय की कहानी केवल एक मुख्यमंत्री की नहीं, बल्कि उस पूरे राजनीतिक संक्रमण की कहानी है जिसने बंगाल को 1967 से लेकर 2011 तक बदलते सत्ता समीकरणों में बांधे रखा.