भारत का न्यूक्लियर गेमचेंजर तैयार! क्या है FBR, जिसमें मिली भारत को बड़ी कामयाबी, सुपरपावर को भी पीछे छोड़ा
तमिलनाडु के कल्पक्कम में देश के पहले स्वदेशी फास्ट ब्रीडर रिएक्टर (FBR) ने क्रिटिकलिटी हासिल कर ली है, इसा मतलब है कि भारत न्यूक्लियर से एनर्जी बनाने के एकदम करीब है.
Tamil Nadu Nuclear Plant: भारत उन चुनिंदा देशों में शामिल है जिनके पास न्यूक्लियर टेक्नोलॉजी विकसित करने और परमाणु ऊर्जा उत्पादन का लंबा अनुभव है. इसमें प्रेसराइज्ड हेवी वाटर रिएक्टर (PHWR) तकनीक पर महारत भी शामिल है. ये ऐसे रिएक्टर होते हैं जो प्राकृतिक यूरेनियम को ईंधन के रूप में और भारी पानी (ड्यूटेरियम ऑक्साइड) को कूलेंट और मॉडरेटर के रूप में इस्तेमाल करते हैं.
इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक भारत की कुल स्थापित परमाणु ऊर्जा क्षमता 8,180 मेगावॉट इलेक्ट्रिक (MWe) है, जिसमें ज्यादातर हिस्सा PHWR रिएक्टरों का है, जबकि कुछ आयातित लाइट वाटर रिएक्टर (LWR) भी शामिल हैं.
किन तकनीकों पर काम कर रहा है भारत?
इसके अलावा दो और तकनीकों पर काम जारी है-फास्ट ब्रीडर रिएक्टर (FBR) और थोरियम आधारित परमाणु रिएक्टर. ये तीनों तकनीकें (PHWR-FBR-थोरियम रिएक्टर) मिलकर भारत के तीन फेज न्यूक्लियर एनर्जी प्रोगाम का हिस्सा हैं. इस कार्यक्रम का उद्देश्य देश में उपलब्ध थोरियम भंडार का इस्तेमाल करके बिजली उत्पादन करना है. थोरियम एक रेडियोएक्टिव मेटल है जो भारत में कुछ ही जगहों पर मिलता है.
किन जगहों पर मिलता है थोरियम?
ये भंडार केरल, तमिलनाडु, ओडिशा, आंध्र प्रदेश, महाराष्ट्र और गुजरात के समुद्री तटों की रेत में, और झारखंड व पश्चिम बंगाल की नदियों की रेत में पाए जाते हैं.
तमिलनाडु का न्यूक्लियर रिएक्टर क्यों है अहम?
भारत के इस तीन-चरणीय कार्यक्रम के दूसरे और बेहद महत्वपूर्ण चरण को बड़ा बढ़ावा तब मिला जब तमिलनाडु के कल्पक्कम में देश के पहले स्वदेशी फास्ट ब्रीडर रिएक्टर (FBR) ने क्रिटिकलिटी हासिल कर ली. क्रिटिकलिटी हासिल करने का मतलब है कि रिएक्टर में आत्मनिर्भर परमाणु विखंडन प्रक्रिया (यूरेनियम का छोटे-छोटे भागों में टूटना) शुरू हो गई है, जिससे आगे चलकर बिजली बनना मुमकिन हो पाएगा.
500 मेगावॉट क्षमता वाले इस रिएक्टर के लिए यह एक अहम पड़ाव है. इसका मतलब यह भी है कि रिएक्टर का कोर सही तरीके से काम कर रहा है और हर विखंडन प्रक्रिया से पर्याप्त न्यूट्रॉन निकल रहे हैं जो इस प्रक्रिया को लगातार जारी रख सकते हैं.
क्या होता है फास्ट ब्रीडर रिएक्टर?
फास्ट ब्रीडर रिएक्टर (FBR) एक मॉडर्न न्यूक्लियर रिएक्टर है. ये बिजली उत्पादन के दौरान इस्तेमाल किए गए ईंधन की तुलना में ज्या नया ईंधन बनाने का काम करता है. बने हुआ ईंधन आमतौर पर प्लूटोनियम होता है.
क्या बोले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी?
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इसे देश के सिविल न्यूक्लियर प्रोग्राम के लिए एक अहम कदम बताया और कहा कि यह भारत की वैज्ञानिक क्षमता और इंजीनियरिंग कौशल का उदाहरण है. उन्होंने इसे थोरियम के उपयोग की दिशा में भी एक महत्वपूर्ण उपलब्धि बताया.
2 साल पहले हासिल की थी बड़ी अचीवमेंट?
रिपोर्ट के मुताबिक, करीब दो साल पहले, मार्च 2024 में, इस रिएक्टर में ‘कोर लोडिंग’ पूरी हुई थी, जिसमें परमाणु ईंधन को रिएक्टर के अंदर डाला जाता है. यह रिएक्टर शुरुआत में यूरेनियम-प्लूटोनियम मिश्रित ऑक्साइड (MOX) ईंधन का इस्तेमाल करेगा. इसके चारों ओर यूरेनियम-238 की परत होगी, जो न्यूक्लियर ट्रांसम्यूटेशन के जरिए नए ईंधन में बदलती रहेगी, इसी वजह से इसे ‘ब्रीडर’ रिएक्टर कहा जाता है. न्यूक्लियर ट्रांसम्यूटेशन वह प्रक्रिया है जिसमें किसी तत्व या उसके समस्थानिक के प्रोटॉन या न्यूट्रॉन की संख्या बदलकर उसे दूसरे तत्व में बदला जाता है.
किस फेज में क्या होगा?
यह तीन फेज का प्रोग्राम है. जिसका पहला चरण PHWR रिएक्टरों और उनके ईंधन चक्र से जुड़ा है, जो अभी चल रहा है. भारत-अमेरिका सिविल न्यूक्लियर समझौते के बाद भारत को अपने रिएक्टरों के लिए यूरेनियम खरीदने का रास्ता मिला, जिससे इस कार्यक्रम की गति बढ़ी है.
दूसरे फेज में फास्ट ब्रीडर रिएक्टर बड़े पैमाने पर लगाए जाएंगे. इन रिएक्टरों की खासियत है कि ये जितना ईंधन इस्तेमाल करते हैं, उससे ज्यादा नया ईंधन पैदा कर सकते हैं. भारत के संदर्भ में यह बहुत जरूरी है क्योंकि इससे ऊर्जा उत्पादन की क्षमता तेजी से बढ़ाई जा सकती है. FBR के जरिए प्राकृतिक यूरेनियम से 60 गुना ज्यादा ऊर्जा हासिल करने की संभावना होती है.
ये रिएक्टर पहले चरण में बने प्लूटोनियम के भंडार को बढ़ाने में भी मदद करते हैं, जिससे तीसरे चरण में यूरेनियम-233 का उत्पादन किया जा सके. इसके लिए FBR में थोरियम का उपयोग किया जाएगा, जिसे बदलकर यूरेनियम-233 बनाया जाएगा. जब यह पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध हो जाएगा, तब तीसरे चरण की शुरुआत होगी.
कब की थी भारत ने इस प्रोग्राम की शुरुआत?
भारत ने 1985 में 13.5 मेगावॉट के फास्ट ब्रीडर टेस्ट रिएक्टर (FBTR) से इस कार्यक्रम की शुरुआत की थी. अब 500 मेगावॉट का पहला स्वदेशी पावर रिएक्टर कल्पक्कम में तैयार हो चुका है. इसके अलावा, फास्ट रिएक्टर फ्यूल साइकिल फैसिलिटी (FRFCF) भी वहीं बन रही है. भविष्य में 600 मेगावॉट के छह और फास्ट ब्रीडर रिएक्टर बनाने की योजना है. इनमें से दो कल्पक्कम के पास बनाए जाएंगे, जबकि चार के लिए दूसरी जगह तय की जाएगी.
इस परियोजना को सरकारों ने लगातार समर्थन दिया है ताकि भारत पूरे न्यूक्लियर फ्यूल चक्र में आत्मनिर्भर बन सके. 2003 में अटल बिहारी वाजपेयी के प्रधानमंत्री रहते BHAVINI नाम की कंपनी बनाई गई थी, जिसका काम इस उन्नत रिएक्टर का निर्माण और संचालन करना है. हालांकि यह परियोजना तकनीकी चुनौतियों के कारण तय समय से काफी देर से पूरी हो रही है.
इसके पूरी तरह से चालू होने से भारत को क्या होगा फायदा?
जब यह पूरी तरह चालू हो जाएगा, तब भारत रूस के बाद ऐसा दूसरा देश होगा जिसके पास कमर्शियल लेवल पर फास्ट ब्रीडर रिएक्टर होगा. चीन भी इस क्षेत्र में काम कर रहा है, जबकि जापान, फ्रांस और अमेरिका ने सुरक्षा कारणों से अपने कार्यक्रम बंद कर दिए थे.
क्या है भारत का टारगेट?
न्यूक्लियर एनर्जी विभाग का टारगेट 2032 तक देश की कुल ऊर्जा में परमाणु ऊर्जा का हिस्सा बढ़ाकर 22,400 मेगावॉट करना है. इसके लिए 10 नए PHWR रिएक्टर ‘फ्लीट मोड’ में बनाए जा रहे हैं, जिसमें एक प्लांट को पांच साल में पूरा करने का लक्ष्य है.
क्या है क्लोज्ड फ्यूल साइकिल, जिसपर भारत कर रहा है काम?
भारत का यह पूरा कार्यक्रम ‘क्लोज्ड फ्यूल साइकिल’ पर आधारित है, जिसमें इस्तेमाल हो चुके ईंधन को फिर से प्रोसेस कर उपयोगी तत्व जैसे प्लूटोनियम-239 और यूरेनियम-233 को अलग किया जाता है. थोरियम को सीधे इस्तेमाल नहीं किया जा सकता, इसे पहले यूरेनियम-233 में बदलना पड़ता है. इसी तरह यूरेनियम-238 को भी प्लूटोनियम-239 में बदलना पड़ता है. यही प्रक्रिया इस तीन-चरणीय कार्यक्रम का आधार है.