GPS Jamming से ‘गुमनाम युद्ध’ में बदला मिडिल ईस्ट वार! ईरान कैसे US-Israel से लड़ रहा पर्दे के पीछे की जंग
मिडिल ईस्ट में GPS Jamming नया हथियार बन चुका है. जानें कैसे ईरान इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर के जरिए जहाज, ड्रोन और मिसाइल की लोकेशन को कर रहा भ्रमित.
मिडिल ईस्ट में बढ़ते सैन्य तनाव के बीच एक ऐसी तकनीक की चर्चा तेजी से हो रही है जो बिना गोली चलाए भी दुश्मन की सैन्य क्षमता को कमजोर कर रही है. वो तकनीक है GPS जैमिंग. आधुनिक युद्ध में यह इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर का महत्वपूर्ण हिस्सा बन चुकी है. यह सामने से दिखाई नहीं देता, बल्कि परदे के पीछे ो अपना काम करता है. जीपीएस जैमिंग का असर ईरान अमेरिका और इजरायल युद्ध शुरू होने के बाद से ही शुरू हो गया था. युद्ध शुरू होने के 24 घंटे के बाद ही 1100 जहाजों को आवागमन प्रभावित हुआ था. वो अपने सही लोकेशन को ट्रैक नहीं कर पा रहे थे. दरअसल, जीपीएस जैमिंग की मदद से मिसाइल, ड्रोन, जहाज और विमानों की नेविगेशन प्रणाली को भ्रमित या निष्क्रिय किया जा सकता है. आइए, समझते हैं कि GPS जामिंग क्या है और यह युद्ध में कैसे इस्तेमाल होती है.
GPS जैमिंग क्या होती है?
GPS जैमिंग एक इलेक्ट्रॉनिक तकनीक है जिसमें शक्तिशाली रेडियो सिग्नल भेजकर ग्लोबल पोजिशनिंग सिस्टम (GPS) के सिग्नल को बाधित कर दिया जाता है. इससे GPS आधारित उपकरण सही लोकेशन नहीं पकड़ पाते.
क्या सिर्फ GPS जैमिंग ही होती है या स्पूफिंग भी?
आधुनिक इलेक्ट्रॉनिक युद्ध में सिर्फ GPS जामिंग ही नहीं, बल्कि GPS स्पूफिंग भी एक महत्वपूर्ण तकनीक मानी जाती है. दोनों का उद्देश्य दुश्मन की नेविगेशन प्रणाली को प्रभावित करना होता है, लेकिन इनका तरीका अलग होता है. जामिंग में असली GPS सिग्नल को ब्लॉक या कमजोर कर दिया जाता है, जबकि स्पूफिंग में नकली GPS सिग्नल भेजकर किसी सिस्टम को गलत लोकेशन पर विश्वास करने के लिए मजबूर किया जाता है.
GPS स्पूफिंग ज्यादा खतरनाक क्यों मानी जाती है?
GPS स्पूफिंग को कई विशेषज्ञ जामिंग से भी अधिक खतरनाक मानते हैं, क्योंकि इसमें उपकरण को यह पता ही नहीं चलता कि उसे धोखा दिया जा रहा है. उदाहरण के तौर पर, अगर किसी जहाज, ड्रोन या विमान के GPS रिसीवर को नकली सिग्नल मिलते हैं, तो वह अपनी वास्तविक स्थिति से अलग किसी दूसरी जगह को अपनी लोकेशन समझने लगता है. इससे नेविगेशन सिस्टम पूरी तरह भ्रमित हो सकता है.
मिडिल ईस्ट में जहाजों की लोकेशन अचानक गलत क्यों दिखने लगती है?
मिडिल ईस्ट में हाल के वर्षों में कई बार ऐसी घटनाएं सामने आई हैं, जब जहाजों की लोकेशन अचानक गलत दिखाई देने लगी. विशेषज्ञों के अनुसार, यह अक्सर GPS स्पूफिंग की वजह से होता है. कुछ मामलों में जहाजों की लोकेशन मैप पर सैकड़ों किलोमीटर दूर या जमीन के बीचों-बीच दिखाई देने लगी. ऐसे में जहाजों की सुरक्षा और समुद्री यातायात पर गंभीर असर पड़ सकता है.
सैन्य हथियारों को भटकाने में स्पूफिंग कैसे काम करती है?
सैन्य दृष्टि से देखें तो स्पूफिंग का इस्तेमाल दुश्मन के हथियारों को भटकाने के लिए किया जा सकता है. उदाहरण के तौर पर, अगर किसी ड्रोन या क्रूज मिसाइल को नकली GPS सिग्नल मिल जाए, तो वह अपने वास्तविक लक्ष्य से हटकर किसी दूसरी दिशा में जा सकती है. इससे हमले की सटीकता कम हो जाती है और कई बार हथियार लक्ष्य तक पहुंच ही नहीं पाते.
ड्रोन युद्ध में GPS स्पूफिंग की भूमिका क्यों बढ़ गई है?
ड्रोन युद्ध के दौर में यह तकनीक और भी महत्वपूर्ण हो गई है. आजकल निगरानी ड्रोन, हमला करने वाले ड्रोन और स्वायत्त हथियारों का बड़ा हिस्सा GPS आधारित नेविगेशन पर निर्भर करता है. अगर दुश्मन उनके GPS सिग्नल को जाम या स्पूफ कर दे, तो पूरा मिशन प्रभावित हो सकता है. यही कारण है कि कई देशों ने इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर सिस्टम पर भारी निवेश शुरू कर दिया है.
ईरान ने इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर में कैसे बढ़ाई अपनी क्षमता?
मिडिल ईस्ट के संदर्भ में विशेषज्ञों का मानना है कि ईरान ने पिछले वर्षों में इलेक्ट्रॉनिक युद्ध क्षमताओं को काफी विकसित किया है. इसमें GPS जामिंग, स्पूफिंग और रेडियो सिग्नल इंटरफेरेंस जैसी तकनीकें शामिल हैं. इनका उपयोग सीधे युद्ध के बजाय “शैडो वॉर” यानी परदे के पीछे चल रहे संघर्ष में किया जा सकता है. इससे दुश्मन की सैन्य गतिविधियों को बाधित किया जा सकता है, जबकि खुला सैन्य टकराव टाला जा सकता है.
क्या आम नागरिक भी इससे प्रभावित हो सकते हैं?
हालांकि, इस तकनीक का असर सिर्फ सैन्य क्षेत्र तक सीमित नहीं रहता. कई बार नागरिक विमानन और समुद्री यातायात भी इससे प्रभावित हो सकते हैं. कुछ एयरलाइनों और जहाजों ने मिडिल ईस्ट के कुछ हिस्सों में नेविगेशन सिस्टम में गड़बड़ी की शिकायत भी की है. ऐसे मामलों में पायलट और जहाज चालक GPS के साथ-साथ अन्य नेविगेशन सिस्टम का भी इस्तेमाल करते हैं.
GPS जैमिंग और स्पूफिंग से बचाव कैसे किया जाता है?
इसी खतरे को देखते हुए कई देशों ने एंटी-जाम और एंटी-स्पूफिंग तकनीकों पर काम शुरू किया है. आधुनिक सैन्य प्लेटफॉर्म अब मल्टी-सैटेलाइट सिस्टम, इनर्शियल नेविगेशन सिस्टम (INS) और सुरक्षित सैन्य GPS सिग्नल का उपयोग करते हैं. इससे अगर GPS सिग्नल में गड़बड़ी हो जाए, तो भी नेविगेशन पूरी तरह बंद नहीं होता.
भविष्य के युद्ध में यह तकनीक कितनी महत्वपूर्ण होगी?
कुल मिलाकर, GPS जामिंग और स्पूफिंग दोनों ही आधुनिक युद्ध के ऐसे उपकरण बन चुके हैं, जो बिना सीधे हमले के भी दुश्मन की सैन्य क्षमता को प्रभावित कर सकते हैं. मिडिल ईस्ट जैसे संवेदनशील क्षेत्रों में इन तकनीकों का इस्तेमाल यह दिखाता है कि भविष्य के युद्ध सिर्फ मिसाइल और टैंकों से नहीं, बल्कि इलेक्ट्रॉनिक और साइबर तकनीकों के जरिए भी लड़े जाएंगे.