घर के भेदी से सावधान रहे भारत, क्या अरुणाचल में चाल चल रहा अमेरिका, ITBP डीजी ने क्यों की बचकानी बात, मेजर जनरल GD बख्शी ने चेताया
जीडी बख्शी ने अमेरिका-इजरायल और ईरान के बीच बढ़ते तनाव पर चिंता जताते हुए कहा कि ईरान की जवाबी क्षमता को कम करके नहीं आंकना चाहिए. उन्होंने भारत को अमेरिकी दबाव से सतर्क रहने की सलाह दी. वहीं, अरुणाचल प्रदेश में भारत और चीन की सेनाओं के बीच आमने-सामने आने की घटनाओं को लेकर उन्होंने बड़ी बात कही.
GD Bakshi Exclusive Interview: अमेरिका और इजरायल की ओर से ईरान पर नए हमले की आशंकाओं के बीच मेजर जनरल (रिटायर्ड) जी.डी. बख्शी ने पश्चिम एशिया के तनाव, परमाणु युद्ध के खतरे और भारत की विदेश नीति को लेकर कई तीखे बयान दिए हैं. State Mirror Hindi के साथ खास बातचीत में उन्होंने कहा कि ईरान को बार-बार धमकाने के बावजूद उसे निर्णायक रूप से कमजोर कर पाना आसान नहीं है. उन्होंने अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू की रणनीति पर सवाल उठाते हुए कहा कि ईरान अब जवाबी कार्रवाई की नीति पर चल रहा है.
बख्शी ने भारत को भी आगाह किया कि उसे अमेरिका के रणनीतिक दबाव में आकर चीन या पाकिस्तान के साथ टकराव की दिशा में नहीं बढ़ना चाहिए. उनके मुताबिक, भारत को अपने राष्ट्रीय हितों के आधार पर फैसले लेने चाहिए, न कि किसी दूसरे देश के इशारों पर.
जीडी बख्शी ने ईरान-अमेरिका तनाव को लेकर क्या-क्या कहा? 10 Points
1. ईरान पर हमले की धमकियों को जी.डी. बख्शी क्यों मानते हैं बेअसर?
जीडी बख्शी ने कहा कि ईरान को लेकर अमेरिका और इजरायल की ओर से सख्त बयान पहले भी दिए जाते रहे हैं, लेकिन धमकियों से ईरान की प्रतिरोधक क्षमता खत्म नहीं हुई है. उन्होंने कहा कि ईरान की मिसाइल क्षमता का बड़ा हिस्सा अब भी बचा हुआ है, जिससे वह जवाबी कार्रवाई करने की स्थिति में है. नंगा नहायेगा क्या निचोड़ेगा क्या... आजतक कुछ खास नहीं कर पाए तो अब क्या कर लेंगे. ईरान की सिर्फ तीस प्रतिशत मिसाइल खत्म हुई है, 70 प्रतिशत बची हुई है. बख्शी ने तर्क दिया कि किसी देश को सिर्फ हवाई हमलों से पूरी तरह निष्क्रिय कर देना आसान नहीं होता. इसके लिए उसकी सैन्य संरचना, हथियारों के भंडार, कमांड सिस्टम और जवाबी हमला करने की क्षमता को लंबे समय तक कमजोर करना पड़ता है.
2. क्या अमेरिका ईरान पर परमाणु हमला कर सकता है?
बख्शी ने परमाणु हथियारों के इस्तेमाल की आशंका पर भी बात की. उनका कहना है कि अगर परमाणु हथियारों का इस्तेमाल इतना आसान होता, तो अमेरिका पहले ही ऐसा कदम उठा चुका होता. आज 9 देशों के पास परमाणु ताकत है. सबसे ज्यादा तो रूस के पास है. इस दौरान उन्होंने उत्तर कोरिया के नेता किम जोंग उन से जुड़े एक कथित बयान का भी जिक्र किया, जिसके मुताबिक अमेरिका द्वारा ईरान पर परमाणु हमला किए जाने की स्थिति में उत्तर कोरिया ईरान की मदद कर सकता है. उन्होंने यह भी चेतावनी दी कि परमाणु हमला क्षेत्रीय संघर्ष को दुनिया के लिए कहीं ज्यादा खतरनाक बना सकता है.
3. ट्रंप और नेतन्याहू की घरेलू राजनीति का युद्ध से क्या संबंध?
बख्शी ने अमेरिका और इजरायल के नेतृत्व की घरेलू राजनीतिक मजबूरियों पर भी सवाल उठाए. उन्होंने दावा किया कि चुनावी दबाव और सत्ता में बने रहने की चिंता इन नेताओं के फैसलों को प्रभावित कर सकती है. चुनावी हार की स्थिति में दोनों नेताओं को अपने-अपने देशों में गंभीर राजनीतिक और कानूनी चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है. बख्शी ने कहा कि नेतन्याहू को पता है कि अगर वो चुनाव हार गए तो उनको जेल जाना पड़ सकता है. खुद ट्रम्प ने भी कहा कि तुम मेरी वजह से बाहर हो... तो ये बात हो सकती है कि नेतन्याहू अगर हार जाते हैं तो वो जेल जा सकते हैं.
4. 'मदर ऑफ ऑल बॉम्ब्स' का उदाहरण देकर क्या समझाना चाहते हैं बख्शी?
बख्शी ने अमेरिका के सबसे शक्तिशाली गैर-परमाणु बमों में से एक, GBU-43/B MOAB, का उदाहरण दिया. अमेरिका ने अप्रैल 2017 में अफगानिस्तान में इस बम का इस्तेमाल इस्लामिक स्टेट के एक ठिकाने के खिलाफ किया था. उनका तर्क है कि किसी अत्यंत शक्तिशाली हथियार का इस्तेमाल भी अपने आप किसी संघर्ष का स्थायी समाधान नहीं बनता. उन्होंने अफगानिस्तान में अमेरिका की लंबी सैन्य मौजूदगी और अंततः 2021 में उसकी वापसी का हवाला देते हुए कहा कि सैन्य ताकत के बावजूद राजनीतिक लक्ष्य हासिल करना अलग चुनौती है.
5. ईरान की 'टिट फॉर टैट' नीति का क्या मतलब है?
बख्शी के बयान के मुताबिक, ईरान अब हमलों का जवाब देने की नीति अपना रहा है. उन्होंने चेतावनी दी कि संघर्ष बढ़ने पर इसका असर केवल ईरान और इजरायल तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि पूरे पश्चिम एशिया में अस्थिरता बढ़ सकती है. इस तरह के संघर्ष में मिसाइल हमलों, समुद्री रास्तों में व्यवधान, ऊर्जा आपूर्ति पर असर और क्षेत्र में मौजूद सैन्य ठिकानों की सुरक्षा जैसे मुद्दे महत्वपूर्ण हो जाते हैं. ईरान की ओर से इंटरनेट केबल और डेटा सेंटरों को निशाना बनाने की संभावित क्षमता का जिक्र भी बख्शी ने किया, लेकिन इस तरह की कार्रवाई की वास्तविक संभावना और प्रभाव का स्वतंत्र आकलन जरूरी है. अगर संघर्ष व्यापक हुआ, तो इसका असर तेल की कीमतों, अंतरराष्ट्रीय व्यापार, डिजिटल नेटवर्क और वैश्विक अर्थव्यवस्था तक पहुंच सकता है.
6. रूस क्या ईरान के समर्थन में बड़ा कदम उठा सकता है?
बख्शी ने रूस की भूमिका पर भी चिंता जताई. उनका अनुमान है कि अगर अमेरिका ईरान पर परमाणु हमला करता है, तो रूस किसी दूसरे मोर्चे पर जवाबी कदम उठा सकता है. उन्होंने यूक्रेन की राजधानी कीव पर संभावित हमले का जिक्र किया.
7. भारत को चीन और पाकिस्तान के मामले में क्या सलाह दे रहे हैं बख्शी?
बख्शी के बयान का एक प्रमुख हिस्सा भारत की विदेश और सुरक्षा नीति से जुड़ा है. उन्होंने आरोप लगाया कि अमेरिका अपने रणनीतिक हितों के लिए भारत को चीन के साथ और पाकिस्तान को भारत के खिलाफ इस्तेमाल करने की कोशिश कर सकता है. उनका कहना है कि भारत को ऐसी किसी रणनीति का हिस्सा बनने से बचना चाहिए, जिसमें उसे अपने हितों के बजाय किसी दूसरे देश के हितों के लिए टकराव बढ़ाना पड़े. बख्सी ने पाकिस्तान की सैन्य और रणनीतिक भूमिका का जिक्र करते हुए आरोप लगाया कि अमेरिका और चीन दोनों इस क्षेत्र में अपने-अपने हितों के लिए पाकिस्तान का इस्तेमाल करते हैं.
8. अरुणाचल प्रदेश में चीन के साथ 'फेस-ऑफ' पर क्या बोले बख्शी?
बख्शी ने अरुणाचल प्रदेश में भारत और चीन की सेनाओं के बीच आमने-सामने आने की घटनाओं को लेकर भी टिप्पणी की. उनका कहना है कि सीमा पर पेट्रोलिंग के दौरान सैनिकों का आमना-सामना होना और वास्तविक हिंसक झड़प होना दो अलग-अलग स्थितियां हैं. उन्होंने इस बात पर आपत्ति जताई कि सीमा से जुड़ी खबरों को बिना पर्याप्त जानकारी के बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया जाए. उनके मुताबिक, सेना के परिचालन से जुड़े मामलों में तथ्यों और आधिकारिक जानकारी के आधार पर ही निष्कर्ष निकालना चाहिए.
बख्शी ने कहा कि घर के भेदी है हमारे यहां, जो लोग अरुणाचल में फालतू की लड़ाई में जनता को भड़काता है. यह सब एक साजिश के तहत है. उन्होंने कहा कि चीन की सेना और सरकार में थोड़ा मतभेद चलता रहता है. जब कोई नया कमांडर आता है तो वो थोड़ा उचकता है.
भारत के लिए रणनीतिक स्वतंत्रता क्यों अहम है?
जी.डी. बख्शी के बयान का केंद्रीय संदेश है कि भारत को पश्चिम एशिया के तनाव और बड़ी शक्तियों की प्रतिस्पर्धा के बीच अपने राष्ट्रीय हितों को प्राथमिकता देनी चाहिए. उनके मुताबिक, अमेरिका-इजरायल और ईरान के बीच संघर्ष बढ़ने की स्थिति में इसके प्रभाव क्षेत्रीय सीमाओं से बाहर जा सकते हैं.
कुल मिलाकर, भारत के लिए चुनौती किसी एक शक्ति के साथ खड़े होने या दूसरे से दूरी बनाने भर की नहीं है. उसे अपनी सुरक्षा जरूरतों, आर्थिक हितों, कूटनीतिक संबंधों और रणनीतिक स्वायत्तता के बीच संतुलन बनाना होगा.