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नेली नरसंहार के वक्त कौन थे CEC? आर.के. त्रिवेदी के उस फैसले से मचा था बवाल, फिर आया ऐतिहासिक 'असम अकॉर्ड'

नेली नरसंहार के वक्त कौन थे CEC आर.के. त्रिवेदी? जानिए 1983 के असम चुनाव पर विवाद, मतदाता सूची का मुद्दा और 15 अगस्त 1985 को हुए ऐतिहासिक असम समझौते की कहानी.

नेली नरसंहार के वक्त कौन थे CEC? आर.के. त्रिवेदी के उस फैसले से मचा था बवाल, फिर आया ऐतिहासिक असम अकॉर्ड
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बात उस समय की है जब 1983 में असम की धरती पर चुनाव कराने का फैसला एक बड़े विवाद की वजह बना. उस वक्त देश के मुख्य चुनाव आयुक्त आर.के. त्रिवेदी थे. विदेशी नागरिकों के नाम मतदाता सूची से हटाने की मांग को लेकर आंदोलन तेज था और चुनाव के विरोध के बीच फरवरी में नेली नरसंहार ने पूरे देश को झकझोर दिया. सवाल उठा कि ऐसे तनावपूर्ण माहौल में चुनाव कराना कितना उचित था? त्रिवेदी ने संवैधानिक परिस्थितियों का हवाला देकर फैसले का बचाव किया. इसके करीब ढाई साल बाद, 15 अगस्त 1985 को ऐतिहासिक असम समझौते पर हस्ताक्षर हुए, जिसने इस लंबे विवाद के समाधान का रास्ता खोला.

कौन थे आर.के. त्रिवेदी और उनका प्रशासनिक सफर कैसा रहा?

मुख्य चुनाव आयुक्त बनने से पहले आर.के. त्रिवेदी भारतीय प्रशासनिक सेवा के वरिष्ठ अधिकारी के रूप में काम कर चुके थे. उन्होंने केंद्र और उत्तर प्रदेश सरकार में विभिन्न प्रशासनिक जिम्मेदारियां निभाईं. वह भारत सरकार के कार्मिक एवं प्रशासनिक सुधार विभाग में सचिव रहे और 1980 से 1982 तक केंद्रीय सतर्कता आयुक्त के पद पर कार्य किया. उनके प्रशासनिक अनुभव को देखते हुए 18 जून 1982 को उन्हें मुख्य चुनाव आयुक्त बनाया गया. इस पद से सेवानिवृत्त होने के बाद वह गुजरात के राज्यपाल नियुक्त हुए और 1986 से 1990 तक इस जिम्मेदारी पर रहे. उन्हें पद्म भूषण से भी सम्मानित किया गया. 19 नवंबर 2015 को उनका निधन हो गया.

असम में विदेशी नागरिकों और मतदाता सूची को लेकर विवाद क्यों हुआ?

1970 के दशक के अंतिम वर्षों और 1980 के दशक की शुरुआत में असम में विदेशी नागरिकों, विशेषकर बांग्लादेश से आए कथित अवैध प्रवासियों, का मुद्दा एक बड़े राजनीतिक आंदोलन में बदल गया था. ऑल असम स्टूडेंट्स यूनियन (आसू) और दूसरे आंदोलनकारी संगठनों की मांग थी कि मतदाता सूचियों से विदेशी नागरिकों के नाम हटाए जाएं और अवैध प्रवासियों की पहचान कर उनके खिलाफ कार्रवाई की जाए.

आंदोलनकारियों का तर्क था कि मतदाता सूची में विदेशी नागरिकों के नाम रहने से चुनावी प्रतिनिधित्व और लोकतांत्रिक प्रक्रिया प्रभावित हो सकती है. इस विवाद के बीच आर.के. त्रिवेदी ने मुख्य चुनाव आयुक्त का पद संभाला. उनके सामने एक तरफ चुनाव कराने की संवैधानिक जिम्मेदारी थी, तो दूसरी तरफ मतदाता सूची की वैधता और राज्य में बिगड़ते हालात की चुनौती थी.

1983 के असम विधानसभा चुनाव कराने का फैसला विवादों में क्यों आया?

फरवरी 1983 में असम विधानसभा चुनाव कराने के फैसले ने विवाद को और गहरा कर दिया. आसू और अन्य आंदोलनकारी संगठनों ने चुनाव का विरोध किया. उनका कहना था कि जब तक मतदाता सूचियों का संशोधन करके कथित विदेशी नागरिकों के नाम नहीं हटाए जाते, तब तक चुनाव नहीं कराए जाने चाहिए. इसके विपरीत, चुनाव कराने के पक्ष में विधानसभा के कार्यकाल और संवैधानिक व्यवस्था से जुड़ी समय-सीमा का तर्क दिया गया. राज्य में व्यापक विरोध और तनाव के बावजूद मतदान कराने के निर्णय की विपक्षी नेताओं और नागरिक अधिकार कार्यकर्ताओं ने आलोचना की.

उनके अनुसार, हिंसा और बहिष्कार के माहौल में स्वतंत्र एवं निष्पक्ष चुनाव कराना बेहद कठिन था. इस तरह असम का चुनाव केवल राजनीतिक मुकाबला नहीं रहा, बल्कि निर्वाचन आयोग की भूमिका और संवैधानिक दायित्वों के बीच संतुलन का भी सवाल बन गया.

नेली नरसंहार क्या था और इसका 1983 के चुनाव से क्या संबंध था?

फरवरी 1983 में असम के नेली इलाके में बड़े पैमाने पर हिंसा हुई, जिसे नेली नरसंहार के नाम से जाना जाता है. यह घटना असम आंदोलन, विदेशी नागरिकों के मुद्दे और विधानसभा चुनाव के विरोध के बीच बने तनावपूर्ण माहौल के दौरान हुई. इस हिंसा में बड़ी संख्या में लोगों की जान गई और इसे असम के आधुनिक इतिहास की सबसे भयावह घटनाओं में गिना जाता है. चुनाव के बहिष्कार और राज्य में फैले तनाव के बावजूद मतदान की प्रक्रिया आगे बढ़ने से चुनाव कराने के निर्णय पर सवाल और तीखे हुए.

त्रिवेदी ने असम में चुनाव कराने के फैसले का बचाव कैसे किया?

फरवरी 1983 में इंडिया टुडे को दिए एक साक्षात्कार में त्रिवेदी ने चुनाव कराने के पीछे संवैधानिक पहलुओं का जिक्र करते हुए कहा था कि, 'विधानसभा का कार्यकाल समाप्त होने वाला था और राष्ट्रपति शासन से जुड़ी व्यवस्थाओं को भी ध्यान में रखना था. मतदाता सूचियों का व्यापक पुनरीक्षण करने के लिए उपलब्ध समय सीमित था. उनका तर्क था कि चुनाव को अनिश्चितकाल तक टालना आसान विकल्प नहीं था, क्योंकि इसके लिए वैकल्पिक संवैधानिक और कानूनी व्यवस्था की जरूरत पड़ती.'

उन्होंने यह भी कहा था कि मतदाता सूची तैयार करने वाले अधिकारी किसी व्यक्ति की नागरिकता का अंतिम निर्णय नहीं कर सकते. यह जिम्मेदारी संबंधित कानूनों के तहत अधिकृत संस्थाओं की होती है. उनके इन तर्कों के बावजूद चुनाव कराने के फैसले की आलोचना जारी रही.

असम में 1983 का चुनाव किस मतदाता सूची के आधार पर हुआ था?

1983 के असम विधानसभा चुनाव में 1979 की मतदाता सूचियों का इस्तेमाल किया गया था. इन सूचियों में कथित विदेशी नागरिकों के नाम शामिल होने का आरोप असम आंदोलन की प्रमुख वजहों में से एक था. चुनाव के बाद मतदाता सूची की वैधता को लेकर कानूनी चुनौती भी दी गई. सितंबर 1984 में सर्वोच्च न्यायालय ने संबंधित याचिकाएं खारिज कर दीं, लेकिन इस फैसले से विदेशी नागरिकों और मतदाता सूची का राजनीतिक विवाद समाप्त नहीं हुआ. इस घटनाक्रम ने चुनाव आयोग की भूमिका को लेकर एक व्यापक सवाल खड़ा किया कि संवैधानिक समय-सीमा के भीतर चुनाव कराना और प्रतिकूल परिस्थितियों में निष्पक्ष मतदान सुनिश्चित करना, दोनों उद्देश्यों के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए.

असम समझौता कब हुआ और इसमें क्या तय किया गया?

असम आंदोलन और चुनाव के बाद बने गतिरोध को सुलझाने के लिए केंद्र सरकार और आंदोलनकारी संगठनों के बीच लंबी बातचीत हुई. इसका परिणाम 15 अगस्त 1985 को ऐतिहासिक असम समझौते के रूप में सामने आया. समझौते में 1 जनवरी 1966 से 24 मार्च 1971 के बीच असम आए लोगों की पहचान और उनसे संबंधित मतदाता सूची के प्रावधानों के लिए ढांचा तय किया गया.

इसका उद्देश्य विदेशी नागरिकों की पहचान से जुड़े विवाद का समाधान निकालना और असम में राजनीतिक स्थिरता बहाल करने का रास्ता तैयार करना था. समझौते के बाद असम में विधानसभा चुनाव दिसंबर 1985 में कराए गए. इस तरह त्रिवेदी के कार्यकाल का अंतिम वर्ष असम के लंबे आंदोलन से जुड़े विवाद के राजनीतिक समाधान और चुनावी प्रक्रिया की बहाली के लिए महत्वपूर्ण रहा.

त्रिवेदी के कार्यकाल में कौन-कौन से प्रमुख चुनाव हुए?

आर.के. त्रिवेदी के कार्यकाल में राष्ट्रपति चुनाव, विभिन्न राज्यों के विधानसभा चुनाव और लोकसभा चुनाव हुए. वर्ष 1982 के राष्ट्रपति चुनाव में ज्ञानी जैल सिंह निर्वाचित हुए और उन्होंने 25 जुलाई 1982 को राष्ट्रपति पद की शपथ ली. वर्ष 1983 में आंध्र प्रदेश, कर्नाटक, त्रिपुरा और अन्य राज्यों में विधानसभा चुनाव कराए गए. इसी साल असम के विधानसभा चुनाव ने उनके कार्यकाल को विवादों के केंद्र में ला दिया.

इसके बाद 1984 में लोकसभा चुनाव हुए. 31 अक्टूबर 1984 को तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या के बाद राजीव गांधी के नेतृत्व में चुनाव कराए गए और कांग्रेस को भारी बहुमत मिला. हालांकि, असम और पंजाब की लोकसभा सीटों पर मतदान दिसंबर 1984 में नहीं हो सका और वहां मतदान 1985 में कराया गया. इसलिए 1984 के आम चुनाव की पूरी प्रक्रिया को समझते समय इन दोनों राज्यों की अलग समय-सारणी को ध्यान में रखना जरूरी है.

त्रिवेदी ने चुनाव आयोग में सुधार के लिए क्या सुझाव दिए थे?

आर.के. त्रिवेदी ने चुनाव आयोग की संस्थागत स्वतंत्रता और प्रशासनिक क्षमता बढ़ाने से जुड़े कई सुझाव दिए थे. उनका जोर आयोग को अधिक प्रशासनिक स्वतंत्रता देने, चुनावी प्रक्रिया में पारदर्शिता बढ़ाने और राजनीतिक दलों की जवाबदेही मजबूत करने पर था. उन्होंने आयोग के लिए अलग सचिवालय और राज्यों में स्वतंत्र प्रशासनिक तंत्र की जरूरत पर जोर दिया. इन प्रस्तावों के पीछे विचार यह था कि चुनाव आयोग को अपने नियमित कामकाज के लिए सरकार पर प्रशासनिक निर्भरता कम करनी चाहिए.

सियासी दलों के वित्तीय हिसाब-किताब पर त्रिवेदी का क्या रुख था?

त्रिवेदी ने राजनीतिक दलों के वित्तीय प्रबंधन में जवाबदेही बढ़ाने के लिए नियमित लेखा-जोखा रखने और खातों की जांच कराने जैसे उपायों का समर्थन किया था. उनका उद्देश्य राजनीतिक दलों की आय और खर्च का व्यवस्थित रिकॉर्ड तैयार करना तथा उनकी वित्तीय गतिविधियों में पारदर्शिता बढ़ाना था. यह सुझाव चुनाव सुधार की उस बहस से जुड़ा था, जिसमें राजनीतिक दलों की जवाबदेही और चुनावी व्यवस्था की विश्वसनीयता को महत्वपूर्ण माना जाता है. उनके प्रस्तावों और बाद में लागू हुए कानूनों के बीच अंतर करना जरूरी है, क्योंकि इन सभी सुझावों को उनके कार्यकाल में पूरी तरह लागू नहीं किया गया था.

गढ़वाल उपचुनाव और असम चुनाव में त्रिवेदी के फैसले अलग क्यों थे?

त्रिवेदी के कार्यकाल में गढ़वाल लोकसभा उपचुनाव और असम विधानसभा चुनाव के फैसलों की तुलना भी की गई. गढ़वाल उपचुनाव के दौरान बाहरी पुलिस की तैनाती और मतदाताओं को डराने-धमकाने की शिकायतों के संदर्भ में चुनाव रद्द करने का फैसला लिया गया था. इसके विपरीत, असम में गंभीर तनाव और विरोध के बावजूद चुनाव कराने का रास्ता चुना गया. त्रिवेदी ने दोनों परिस्थितियों के बीच अंतर बताते हुए कहा था कि गढ़वाल में चुनाव टालने के लिए समय उपलब्ध था, जबकि असम में विधानसभा का कार्यकाल समाप्त होने के कारण संवैधानिक समय-सीमा की चुनौती अधिक गंभीर थी.

त्रिवेदी का कार्यकाल भारतीय चुनावी इतिहास में क्यों याद किया जाता है?

  • आर.के. त्रिवेदी का कार्यकाल दो प्रमुख पहलुओं के कारण याद किया जाता है.
  • पहला, चुनाव आयोग की स्वतंत्रता, राजनीतिक दलों के वित्तीय हिसाब-किताब और चुनावी अनियमितताओं पर नियंत्रण से जुड़े सुधारों के उनके सुझाव.
  • दूसरा, 1983 में असम विधानसभा चुनाव कराने का विवादास्पद फैसला, जो नेली नरसंहार के दौर और मतदाता सूची से जुड़े संघर्ष की पृष्ठभूमि में आया. उनके समर्थकों ने चुनाव कराने के निर्णय को संवैधानिक समय-सीमा की बाध्यता के संदर्भ में देखा, जबकि आलोचकों ने हिंसा और विरोध के माहौल में निष्पक्ष चुनाव की संभावना पर सवाल उठाए.

असम अकॉर्ड क्या है?

असम समझौता 15 अगस्त 1985 को केंद्र सरकार और असम आंदोलन के नेताओं के बीच हुआ था. इसका उद्देश्य असम में विदेशी नागरिकों की पहचान और प्रवासन से जुड़े विवाद को सुलझाना था. समझौते में 1 जनवरी 1966 से 24 मार्च 1971 के बीच आए लोगों की पहचान और नागरिकता संबंधी प्रावधान तय किए गए.

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