कभी हाथों में थीं बंदूकें, 20 साल जंगल में गुजारे, फिर थामी किताबें; अब फर्स्ट क्लास से SSC परीक्षा पास करने वाले 3 पूर्व माओवादी कौन?
कभी जंगल में हथियार लेकर रहने वाले पूर्व माओवादियों ने आज SSC की परीक्षा पास कर अपना पढ़ाई का सपना पूरा किया. जिनमें से कोई नर्स बनना चाहता है तो कोई टीचर.
Maoist passes SSC exam
(Image Source: ChatGPT )पिछले कुछ समय से हमने से देखा है कि कैसे माओवादी हो या नक्सलवादी वे सब हथियार छोड़-छोड़कर फिर सामान्य जीवन बिताने की तरफ बढ़े हैं. इसके अलावा सरकार भी इन लोगों की मदद कर रही है ताकि ये फिर से अपना नया जीवन शुरू कर सके. आज हम आपको ऐसे ही 3 माओवादियों की कहानी बताने वाले हैं, जिन्होंने किसी न किसी वजह के चलते अपने परिवार और समाज से अलग होकर हथियार उठाए थे और लंबा समय जंगलों में बिताया,
लेकिन फिर उन्होंने हथियार छोड़कर सामान्य जीवन जीते हुए फिर पढ़ने का फैसला किया, जिसके चलते आज उन्होंने फर्स्ट क्लास से SSC की परीक्षा पास की है. इन सभी की कहानी काफी भावुक कर देने वाली है. इन 3 माओवादियों में महाराष्ट्र की गीता नरोटे, अर्जुन ओयम और संतोष अचला शामिल है.
कौन हैं गीता नरोटे?
गीता धनोरा तहसील के गुरेकसा गांव की रहने वाली हैं. बचपन में वह माता-पिता और तीन बहनों के साथ रहती थीं. जब वह करीब 10 साल की थीं, तब माओवादियों ने उनके पिता की हत्या कर दी. परिवार की परिस्थितियां ऐसी बनीं कि गीता को छठी कक्षा में ही पढ़ाई छोड़नी पड़ी. करीब दो दशक तक माओवादी संगठन से जुड़ी रहने के बाद जब उन्होंने हथियार छोड़कर फिर से सामान्य जीवन जीने का फैसला किया तो उन्होंने सबसे पहले किताबें थामी और अपनी अधूरी पढ़ाई पूरी की.
अब 35 साल की उम्र में गीता ने SSC परीक्षा प्रथम श्रेणी से पास कर अपनी जिंदगी को नई दिशा दी है. वह उन 210 माओवादियों में शामिल हैं, जिन्होंने पिछले साल अक्टूबर में सरेंडर किया था. इस साल 7 पूर्व माओवादियों ने SSC परीक्षा दी, जिनमें गीता समेत तीन ने प्रथम श्रेणी हासिल की. छत्तीसगढ़ ओपन स्कूल से अगस्त में परीक्षा देने वाली गीता अब आगे HSC की पढ़ाई पूरी कर नर्स बनने की तैयारी करना चाहती हैं.
कौन है संतोष अचला?
संतोष अचला उर्फ सन्नु भी उन पूर्व माओवादियों में शामिल हैं, जिन्होंने पढ़ाई की राह दोबारा पकड़ी. 31 वर्षीय सन्नु माओवादी संगठन में ACM के साथ-साथ शिक्षक की भूमिका में भी रहे. उन्होंने बताया कि उनके पिता को संदिग्ध माओवादी के तौर पर गिरफ्तार किया गया था और कई साल जेल में रहने के बाद 2023 में न्यायिक हिरासत के दौरान उनकी मौत हो गई. उनकी मां का निधन इसी साल जून में हुआ. सन्नु ने बताया कि उन्हें मां के अंतिम संस्कार में शामिल होने की अनुमति मिली थी. उन्होंने दूसरी कक्षा के बाद ही स्कूल छोड़ दिया था.
माओवादी संगठन में रहते हुए सन्नु ने पढ़ना-लिखना सीखा. बाद में 2023 में उन्हें शिक्षक की जिम्मेदारी दी गई, जहां वह युवा कार्यकर्ताओं को बुनियादी गणित और हिंदी पढ़ाने लगे. अब सरेंडर के बाद वह भी शिक्षा के जरिए अपनी जिंदगी को नई दिशा देने की कोशिश कर रहे हैं.
कौन हैं अर्जुन ओयम?
32 वर्षीय अर्जुन ओयम ने भी माओवादी संगठन से जुड़ने के बावजूद पढ़ाई जारी रखने की कोशिश की. वह बीजापुर जिले के गंगालूर इलाके के तोड़का गांव से आते हैं. उनके मुताबिक, क्षेत्र में माओवादी प्रभाव बढ़ने के बाद शिक्षक गांव में आना बंद कर चुके थे. अर्जुन ने कहा "सलवा जुदूम के दौरान मेरा घर जला दिया गया और मेरी किताबें भी जल गईं. मैं 2010 में माओवादियों में शामिल हो गया और मुझे अभूझमाद भेज दिया गया."
माओवादी संगठन में रहते हुए अर्जुन क्षेत्रीय समिति सदस्य यानी ACM बने. उन्होंने संगठन के राजनीतिक स्कूल में पढ़ाई की और करीब एक साल तक खुद भी बच्चों को बुनियादी गणित, हिंदी और पर्यावरण जैसे विषय पढ़ाए. सरेंडर करने के बाद बीजापुर के एसपी समेत कई लोगों ने उन्हें दोबारा पढ़ाई शुरू करने के लिए प्रोत्साहित किया. पुलिसकर्मियों ने परीक्षा के लिए जरूरी जन्म प्रमाण पत्र और जाति प्रमाण पत्र बनवाने में भी उनकी मदद की.