लोकतंत्र में नागरिक को सम्मान देने के लिए अब शायद नई शब्दावली की जरूरत पड़ गई है- महिला है तो मां कहिए, देवी कहिए, युवा है तो Gen Z कहिए और सवाल पूछे तो पहले उसे समझाइए कि वह आखिर सवाल क्यों पूछ रही है. जंतर-मंतर पर एसआईआर के खिलाफ प्रदर्शन के दौरान अहाना ने इसी रवैये पर तंज कसा. पुलिस हिरासत से पहले उन्होंने महिलाओं के साथ कार्रवाई के तरीके पर सवाल उठाया और कहा- “हमें नॉर्मल सिटीजन रहने दो.” यानी सम्मान भाषणों में नहीं, व्यवहार में चाहिए. अहाना का सवाल सीधा था- अगर नागरिक को अधिकार दिए हैं तो फिर उसके सवाल सुनने में इतनी परेशानी क्यों?

मां-देवी बनाने से पहले नागरिक समझिए, अहाना का असली सवाल क्या है?

जंतर-मंतर पर एसआईआर के खिलाफ प्रदर्शन के दौरान दिल्ली विश्वविद्यालय से जुड़ी और सिविल सर्विस परीक्षा की तैयारी कर रही अहाना पुलिस हिरासत में लिए जाने से पहले जिस अंदाज में बोलीं, उसमें गुस्सा भी था और व्यवस्था पर सीधा तंज भी. अहाना का सवाल था कि महिलाओं के सम्मान की बात करने वाले सिस्टम का व्यवहार सड़क पर कैसा है? वह कहती हैं- “हमें नॉर्मल सिटीजन रहने दो.” यानी महिला को सम्मान देने के नाम पर उसे मां या देवी का दर्जा देने से पहले यह तय होना चाहिए कि उसे एक सामान्य नागरिक की तरह अधिकार और गरिमा मिल रही है या नहीं. जंतर-मंतर की भीड़ में उनका यह सवाल इसलिए अलग सुनाई दिया क्योंकि इसमें नारा कम और व्यवस्था के सामने आईना ज्यादा था.

हर महिला को मां या देवी बनाने की जरूरत क्यों?

अहाना ने महिलाओं के संदर्भ में इस्तेमाल होने वाली प्रतीकात्मक भाषा पर सवाल उठाया. उनका कहना था कि महिलाओं को मां या देवी बताने से पहले उन्हें सामान्य नागरिक के रूप में सम्मान दिया जाए. उनका तंज था कि अगर महिला के सम्मान की बात करनी है तो उसके लिए बड़े-बड़े विशेषण गढ़ने की जरूरत नहीं है. उसे बस वैसा ही व्यवहार चाहिए, जैसा किसी नागरिक के साथ होना चाहिए. यानी भाषण में ‘मदर ऑफ डेमोक्रेसी’ और सड़क पर महिला प्रदर्शनकारी के साथ व्यवहार के बीच की दूरी को अहाना ने अपने सवालों से निशाना बनाया.

हिरासत में लेना है तो महिला को इस तरह क्यों ले जाते हैं?

अहाना की नाराजगी पुलिस की कार्रवाई को लेकर भी थी. उन्होंने सवाल उठाया कि यदि किसी प्रदर्शनकारी को हिरासत में लेना कानून-व्यवस्था की जरूरत है, तो कार्रवाई का तरीका भी गरिमापूर्ण होना चाहिए. महिलाओं को जिस तरीके से पुलिस ले जा रही थी, उस पर उन्होंने आपत्ति जताई. उनका सवाल सीधा था- हिरासत में लेना है तो आराम से ले जाइए, ऐसा व्यवहार क्यों जिसमें महिला की गरिमा ही सवालों के घेरे में आ जाए?

यही वह जगह है जहां लोकतंत्र की बड़ी-बड़ी बातें जमीन के छोटे से नजारे से टकराती हैं. संविधान नागरिकों को अधिकार देता है, सरकारें नागरिक सम्मान की बात करती हैं और पुलिस कानून-व्यवस्था की जिम्मेदारी निभाती है. लेकिन किसी प्रदर्शनकारी महिला को हिरासत में लेते समय व्यवहार कैसा है, यही तय करता है कि कागज पर लिखी गरिमा जमीन पर कितनी दिखाई देती है.

एक्टिविस्ट के बाद अब जेन जी से परेशानी क्यों?

अहाना ने अपने बयान में जेन जी का भी जिक्र किया. उनका कहना था कि पहले एक्टिविस्टों को लेकर असहजता दिखाई देती थी और अब नई पीढ़ी भी सवाल पूछ रही है. उन्होंने कहा कि “हम जेन जी हैं, जेन जी जाग गया है.” उनके मुताबिक नई पीढ़ी को सवाल पूछने के लिए परेशान करने के बजाय सम्मान दिया जाना चाहिए.

इसमें तंज साफ था- जिस पीढ़ी को लोकतंत्र, अधिकार और संविधान पढ़ाया जाता है, जब वही पीढ़ी उन अधिकारों का सवाल लेकर सड़क पर आती है तो उसे समस्या की तरह क्यों देखा जाए? अहाना के मुताबिक युवा अगर अपने देश और व्यवस्था से सवाल कर रहे हैं तो इसका जवाब सम्मान के साथ दिया जाना चाहिए, डर या दबाव के साथ नहीं.

अंबेडकर-पटेल-गांधी के नाम पर अहाना ने क्यों उठाए सवाल?

अहाना ने अपने बयान में डॉ. भीमराव अंबेडकर, सरदार पटेल और महात्मा गांधी का उल्लेख करते हुए शिक्षा और लोकतांत्रिक मूल्यों पर सवाल उठाए. उन्होंने कहा कि अगर नई पीढ़ी को अंबेडकर और संविधान की भूमिका ही ठीक से नहीं समझाई जाएगी तो फिर लोकतंत्र की बुनियाद समझाने का दावा कैसे किया जाएगा? उनका सवाल यही है कि जिन महापुरुषों के नाम सत्ता और राजनीति में बार-बार लिए जाते हैं, उनके विचारों और लोकतांत्रिक मूल्यों को व्यवहार में कितना उतारा जा रहा है. नाम लेना आसान है, लेकिन उनके बताए रास्ते पर चलने का दावा तब कसौटी पर आता है जब सामने कोई असहमत नागरिक खड़ा हो.

क्या संविधान अच्छा हो, लेकिन चलाने वाले खराब हों तो?

अहाना ने भगत सिंह के नाम से जोड़ी जाने वाली उस चिंता का भी हवाला दिया जिसमें व्यवस्था को चलाने वाले लोगों की भूमिका पर सवाल उठता है. उनके बयान का संकेत था कि केवल संविधान का अच्छा होना पर्याप्त नहीं है. उसे लागू करने वाली संस्थाएं और लोग भी उतने ही महत्वपूर्ण हैं. यही बात उनके पूरे बयान को एक अलग धार देती है. वह सरकार के भाषणों और जमीन पर नागरिक के अनुभव के बीच का फर्क दिखाने की कोशिश करती हैं. एक तरफ लोकतंत्र को ‘मदर ऑफ डेमोक्रेसी’ कहा जाता है, दूसरी तरफ उसी लोकतंत्र में एक युवा महिला सड़क पर खड़े होकर पूछ रही है- मुझे मां या देवी मत बनाइए, पहले एक सामान्य नागरिक की तरह रहने दीजिए.

अहाना का सबसे बड़ा तंज आखिर किस पर था?

अहाना की बात का सार किसी एक राजनीतिक दल या एक पुलिस कार्रवाई तक सीमित नहीं दिखता. उनका निशाना उस सोच पर था जिसमें नागरिक को उसके सवालों से नहीं, उसकी पहचान से देखा जाता है. महिला है तो मां या देवी, युवा है तो जेन जी, प्रदर्शनकारी है तो उपद्रवी, लेकिन इन सबके पीछे मौजूद सामान्य नागरिक कहां है?

जंतर-मंतर पर उनका सवाल शायद इसी जगह सबसे ज्यादा चुभता है. लोकतंत्र में नागरिक को सम्मान देने के लिए उसे आसमान पर बैठाने की जरूरत नहीं होती. उसे बस जमीन पर खड़े होकर सवाल पूछने का अधिकार चाहिए. और जब कोई युवा महिला यही कहती है- “हमें नॉर्मल ही रहने दो”, तो यह वाक्य केवल पुलिस कार्रवाई पर टिप्पणी नहीं रह जाता, बल्कि उस लोकतांत्रिक व्यवस्था से सवाल बन जाता है जो नागरिक को सम्मान देने की बात तो करती है, मगर नागरिक के सवाल सुनने की परीक्षा हर बार पास नहीं कर पाती.

क्या अहाना ने वही सवाल दोहराया?

राहुल गांधी के 19 सितंबर के इंदौर स्थित ‘छात्रों की गूंज’ कार्यक्रम में भी केंद्र में छात्र और उनके सवाल थे। राहुल गांधी ने कहा था कि सिस्टम छात्रों से इसलिए परेशान है क्योंकि वे सवाल पूछते हैं। जंतर-मंतर पर अहाना की बात को इसी संदर्भ में पढ़ें तो उनकी आपत्ति भी सवाल पूछने के अधिकार और नागरिक सम्मान के इर्द-गिर्द घूमती दिखती है। फर्क इतना है कि इंदौर में सवाल शिक्षा, हॉस्टल और छात्रों की समस्याओं को लेकर उठे, जबकि अहाना ने महिला प्रदर्शनकारियों के साथ पुलिस के व्यवहार पर सवाल किया। राहुल गांधी ने इंदौर की एक छात्रा की हॉस्टल संबंधी परेशानी को भी सार्वजनिक रूप से उठाया था। अहाना का “हमें नॉर्मल सिटीजन रहने दो” वाला तंज इसी बड़ी बहस में एक अलग सवाल जोड़ता है- सवाल पूछने वाली छात्रा को पहले नागरिक समझेंगे या सिर्फ किसी प्रतीक में बदल देंगे?