उत्तर प्रदेश में 2027 के विधानसभा चुनाव का बिगुल बजने से पहले ही सियासी बिसात बिछने लगी है. बीजेपी तीसरी बार लगातार सत्ता में वापसी की तैयारी कर रही है, समाजवादी पार्टी पिछड़े, दलित और अल्पसंख्यक वर्गों को साथ लाने के अपने PDA विमर्श को धार देने में जुटी है और बहुजन समाज पार्टी अपनी राजनीतिक जमीन दोबारा मजबूत करने की कोशिश में है. इसी बीच भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (CPI) के राष्ट्रीय महासचिव गिरीश चंद्र शर्मा की एक कबूलनाने ने उस सवाल को फिर सामने ला दिया है, जिसे कम्युनिस्ट राजनीति लंबे समय से पूरी तरह हल नहीं कर पाई है.

क्या केवल आर्थिक बराबरी की लड़ाई से सामाजिक सम्मान और राजनीतिक हिस्सेदारी की आकांक्षा पूरी हो सकती है? क्या यह सीपीआई नेताओं का यूटोपिया यानी भुलावे की राजनीति नहीं है. इंसान के जितना दो रोटी जीने के लिए जरूरी है, क्या उसका आत्मसम्मान उससे कम अहम है? इसके जवाब में उन्होंने जो कहा वो चौंकाने वाली है.

दरअसल, दिल्ली स्थिति सीपीआई के हेडक्वार्टर में स्टेट मिरर के साथ करीब 42 मिनट की हॉट टॉक में गिरीश चंद्र शर्मा ने पार्टी की कमजोर होती राजनीतिक जमीन पर चर्चा करते हुए कांशीराम की राजनीति का जिक्र किया. उनके बयान का सार यह था कि कम्युनिस्ट लंबे समय तक लोगों को दो वक्त की रोटी दिलाने की लड़ाई पर केंद्रित रहे, जबकि कांशीराम ने दलितों, वंचितों और पिछड़ों के बीच आत्मसम्मान और अधिकारों की चेतना को राजनीतिक आंदोलन का केंद्र बनाया. बीजेपी ने धर्म की राजनीति पर जोर दिया तो क्षेत्रीय दलों ने जातिवादी राजनीति को बढ़ावा दिया.

उन्होंने कहा कि यही वह बिंदु है, जहां से 2027 के उत्तर प्रदेश चुनाव के लिहाज से इस बातचीत का राजनीतिक महत्व बढ़ जाता है. जिस राज्य में जातीय पहचान, सामाजिक प्रतिनिधित्व, आरक्षण, आर्थिक अवसर और सत्ता में हिस्सेदारी चुनावी विमर्श के महत्वपूर्ण हिस्से हैं, वहां सीपीआई के शीर्ष नेता का यह स्वीकार करना कि रोटी के साथ आत्मसम्मान भी जरूरी है, पार्टी की पुरानी रणनीति पर सवाल खड़ा करता है.

दो रोटी की राजनीति या सम्मान की लड़ाई, कहां चूक हुई?

इंटरव्यू के दौरान स्टेट मिरर ने शर्मा से पूछा कि जिस मार्क्सवादी विचारधारा के आधार पर सीपीआई सर्वहारा - गरीबों, दलितों, पिछड़ों की सत्ता स्थापित करने और अमीरी-गरीबी की खाई मिटाने की बात करती रही, क्या उसका मूल एजेंडा सांप्रदायिकता और धर्मनिरपेक्षता की राजनीतिक बहसों में पीछे छूट गया?

इसके जवाब में सीपीआई के राष्ट्रीय महासचिव शर्मा ने कहा कि भारत में अमीरी और गरीबी के बीच की खाई को पाटना आसान नहीं है. उनके मुताबिक, जातिवाद और सांप्रदायिकता की राजनीति ने समाज को बांटने का काम किया और आर्थिक असमानता के सवाल को भी प्रभावित किया.

शर्मा ने सीपीआई के पुराने राजनीतिक दौर का जिक्र करते हुए कहा कि आजादी के बाद पार्टी ने एक समय राष्ट्रीय राजनीति में महत्वपूर्ण स्थान हासिल किया था. केरल और पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों में कम्युनिस्ट राजनीति ने सरकारें बनाईं और राष्ट्रीय स्तर पर भी उसका प्रभाव रहा. मणिपुर और त्रिपुरा में भी वाम दलों की सरकार बनी, लेकिन समय के साथ पार्टी का जनाधार कमजोर पड़ता गया.

यह पूछे जाने पर सवाल यह है कि मजदूरों, किसानों युवाओं और गरीबों के अधिकारों की लड़ाई को अपनी राजनीति का आधार बनाने वाली पार्टी जनता के बीच अपनी पुरानी पकड़ क्यों नहीं बचा सकी? क्या आर्थिक असमानता का मुद्दा उठाना पर्याप्त था या समाज के भीतर मौजूद जातिगत भेदभाव, सम्मान और प्रतिनिधित्व की मांगों को भी उतनी ही राजनीतिक जगह देने की जरूरत थी?

क्या कांशीराम ने समझाया कि रोटी के साथ सम्मान भी जरूरी?

सीपीआई की कमजोरी की वजह पूछने पर शर्मा ने अपनी पार्टी की रणनीति की एक अहम सीमा स्वीकार की. उनके मुताबिक, कम्युनिस्ट राजनीति लंबे समय तक दो रोटी दिलाने की थ्योरी पर काम करती रही, जबकि बहुजन आंदोलन के संस्थापक कांशीराम ने दलितों, कमजोर वर्गों और पिछड़ों के बीच आत्मसम्मान की लड़ाई को प्रमुखता दी.

यही अंतर कम्युनिस्ट और बहुजन और क्षेत्रीय पार्टियों की राजनीति की प्राथमिकताओं को समझने की एक अहम कड़ी है. कम्युनिस्ट आंदोलन का पारंपरिक जोर क्लास स्ट्रगल यानी वर्ग संघर्ष, मजदूर-किसान एकता और आर्थिक संसाधनों के समान बंटवारे पर रहा. दूसरी ओर, कांशीराम की राजनीति ने जातिगत भेदभाव, सामाजिक प्रतिष्ठा, राजनीतिक प्रतिनिधित्व और सत्ता में हिस्सेदारी के सवालों को केंद्र में रखा.

कांशीराम का संदेश केवल आर्थिक राहत तक सीमित नहीं था. उनका जोर इस बात पर भी था कि जिन समुदायों को लंबे समय तक सामाजिक और राजनीतिक व्यवस्था में हाशिये पर रखा गया, वे अपनी स्वतंत्र राजनीतिक आवाज तैयार करें और सत्ता में अपनी हिस्सेदारी सुनिश्चित करें.

शर्मा के कबूलनामे का महत्व इसी में है. यदि जनता के लिए रोजी-रोटी जरूरी है, तो अपने अधिकारों के लिए आवाज उठाने, सामाजिक अपमान से मुक्ति पाने और निर्णय लेने वाली संस्थाओं में प्रतिनिधित्व हासिल करने की आकांक्षा भी उतनी ही महत्वपूर्ण है.

2027 में PDA की राजनीति के बीच CPI के लिए क्या चुनौती?

उत्तर प्रदेश में 2027 का चुनाव इस बहस को और महत्वपूर्ण बना सकता है. समाजवादी पार्टी अपने PDA यानी पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक विमर्श को राजनीतिक आधार बनाने में जुटी है. बीजेपी भी अपने संगठन, सहयोगी दलों और सामाजिक संपर्क अभियानों के जरिए चुनावी जमीन मजबूत कर रही है. वहीं, बहुजन समाज पार्टी की राजनीति का केंद्र दलित प्रतिनिधित्व और स्वतंत्र राजनीतिक पहचान का सवाल बना हुआ है.

ऐसे माहौल में सीपीआई के सामने चुनौती केवल लोगों तक अपनी बातों को पहुंचाने की नहीं, बल्कि उसे राज्य की जमीनी सामाजिक आकांक्षाओं से जोड़ने की भी है.

वर्ष 2022 के विधानसभा चुनाव में बीजेपी ने 255 सीटें जीती थीं, जबकि समाजवादी पार्टी को 111 सीटें मिली थीं. बहुजन समाज पार्टी केवल एक सीट पर सिमट गई थी और कांग्रेस को दो सीटें मिली थीं. ये आंकड़े बताते हैं कि उत्तर प्रदेश की राजनीति में अलग-अलग दलों के सामाजिक आधार और चुनावी प्रभाव में बड़ा अंतर है.

2024 के लोकसभा चुनाव में उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी ने 37 और कांग्रेस ने छह सीटें जीतीं. इस परिणाम ने विपक्षी गठबंधन के लिए नई संभावनाएं पैदा कीं, लेकिन लोकसभा और विधानसभा चुनावों के समीकरण एक जैसे नहीं होते. 2027 में उम्मीदवारों का चयन, स्थानीय संगठन, जातीय समीकरण और क्षेत्रीय मुद्दे भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे.

100 साल पुरानी CPI, लेकिन यूपी में चुनावी जमीन कहां?

भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी अपनी स्थापना 26 दिसंबर 1925 को कानपुर में हुए सम्मेलन से जोड़ती है. वर्ष 2025 में पार्टी ने अपने सौ साल पूरे किए. भारतीय कम्युनिस्ट आंदोलन की शुरुआती ऐतिहासिक कड़ियां 1920 में ताशकंद में हुए संगठनात्मक प्रयासों से भी जुड़ी हैं, लेकिन सीपीआई की आधिकारिक स्थापना के लिए 1925 की तारीख महत्वपूर्ण है.

इतिहास में पार्टी का स्थान रहा है, लेकिन उत्तर प्रदेश में उसकी चुनावी स्थिति लगातार कमजोर बनी हुई है. 1996 के विधानसभा चुनाव में सीपीआई ने एक सीट जीती थी. उसके बाद 2002, 2007, 2012, 2017 और 2022 के चुनावों में पार्टी विधानसभा में कोई सीट नहीं जीत सकी.

2022 के विधानसभा चुनाव में सीपीआई ने 35 सीटों पर उम्मीदवार उतारे, लेकिन किसी को जीत नहीं मिली. ये आंकड़े उस अंतर को दिखाते हैं जो पार्टी के ऐतिहासिक परिचय और मौजूदा चुनावी प्रभाव के बीच मौजूद है. सौ साल पुरानी पार्टी होने का अपना महत्व है, लेकिन लोकतांत्रिक राजनीति में इतिहास अपने आप वर्तमान जनसमर्थन में नहीं बदलता.

2027 का चुनाव CPI के लिए इसी चुनौती की एक और परीक्षा होगा. हालांकि, अभी यह कहना जल्दबाजी होगी कि पार्टी अपनी रणनीति में कितना बदलाव करेगी या उसे चुनाव में कितना लाभ मिलेगा.

हिंदू धर्म से नहीं, धर्म के नाम पर राजनीति का विरोध: शर्मा

स्टेट मिरर के साथ इंटरव्यू में शर्मा से यह भी पूछा गया कि बहुसंख्यक हिंदू आबादी वाले देश में सीपीआई को लेकर यह धारणा क्यों बनी कि वह हिंदू धर्म और उसकी संस्कृति की उपेक्षा करती है. इसके जवाब में शर्मा ने कहा कि उनकी पार्टी ने हिंदू धर्म या उसकी संस्कृति का विरोध नहीं किया है. उनका विरोध धर्म के आधार पर राजनीति करने से है.

शर्मा ने बेरोजगारी, महंगाई, सभी के लिए शिक्षा, दलितों और मजदूरों के अधिकार तथा सामाजिक-आर्थिक असमानता को पार्टी के प्रमुख मुद्दों में गिनाया. उन्होंने मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग और विशेष गहन पुनरीक्षण यानी SIR का विरोध करने की बात भी कही. उनके मुताबिक, एक नवंबर को दिल्ली के रामलीला मैदान में प्रस्तावित इंडिया गठबंधन की महारैली में इन मुद्दों को उठाया जाएगा. उनका कहना था कि यह केवल कांग्रेस की रैली नहीं, बल्कि इंडिया गठबंधन में शामिल दलों का साझा आयोजन है.

कांशीराम की याद, क्या CPI बदलेगी अपनी राजनीति?

गिरीश चंद्र शर्मा की बात का सबसे अहम पहलू यह है कि उन्होंने आर्थिक न्याय की लड़ाई के साथ आत्मसम्मान और सामाजिक अधिकारों की जरूरत जरूरी माना है. शर्मा का यह मानना सीपीआई की उस चुनौती की ओर इशारा करती है, जिसका सामना कम्युनिस्ट आंदोलन लंबे समय से करता रहा है. उनके इस कबूलनामे ने एक बुनियादी बहस जरूर खोल दी है. जनता को केवल रोटी देने का वादा पर्याप्त नहीं, उसे सम्मान, अधिकार और बराबरी का भरोसा भी चाहिए.