Lata Mangeshkar: चाइल्ड एक्ट्रेस से बनी सिंगर, घर के खाने में मिलता रहा जहर; परिवार पर कुर्बान अधूरा इश्क

लता मंगेशकर की जिंदगी सिर्फ संगीत की साधना नहीं, बल्कि संघर्ष, जिम्मेदारियों और एक अधूरी प्रेम कहानी की दास्तां है. उनकी आवाज आज भी जिंदा है और उनकी कहानी करोड़ों लोगों को प्रेरणा देती है.;

( Image Source:  Instagram: amrutachaghanu )
Edited By :  रूपाली राय
Updated On : 6 Feb 2026 6:20 AM IST

भारतीय संगीत की दुनिया में लता मंगेशकर (Lata Mangeshkar) का नाम एक ऐसी धुन की तरह गूंजता है, जो कभी थमती नहीं. 'नाइटिंगेल ऑफ इंडिया' के नाम से मशहूर लता दीदी ने अपनी मधुर आवाज से न सिर्फ लाखों दिलों को छुआ, बल्कि भारतीय सिनेमा को एक नई ऊंचाई दी. उन्होंने 36 से ज्यादा भाषाओं में हजारों गाने गाए, जो आज भी लोगों की जुबान पर चढ़े रहते हैं. लेकिन उनकी जिंदगी की कहानी सिर्फ गानों तक सीमित नहीं है. यह एक ऐसी अनकही दास्तां है, जिसमें बचपन की मासूम शरारतें, परिवार की जिम्मेदारियां, संगीत की साधना और एक अधूरी प्रेम कहानी शामिल है. 6 फरवरी 2022 को उनने निधन ने सभी को एक गहरा सदमा दिया आज उन्हें गए चार साल हो गए. आइए, हम उनकी जिंदगी के उन पन्नों को पलटते हैं, जो कम ही लोगों को पता हैं. 

लता मंगेशकर का जन्म 28 सितंबर 1929 को इंदौर में हुआ था, जो उस समय ब्रिटिश इंडिया का हिस्सा था. उनका असली नाम हेमा मंगेशकर था, लेकिन पिता दीनानाथ मंगेशकर ने उन्हें लता नाम दिया. दीनानाथ एक प्रसिद्ध क्लासिकल सिंगर, थिएटर आर्टिस्ट और नाटककार थे, जो मराठी और कोंकणी संगीत में माहिर थे. उनकी मां शेवंती एक गुजराती परिवार से थी. लता सबसे बड़ी थीं, और उनके चार भाई-बहन थे- मीना, आशा भोंसले, उषा और हृदयनाथ. सभी भाई-बहनों में संगीत की प्रतिभा थी, लेकिन लता की आवाज में एक जादू था जो सबसे अलग था. 

बचपन की शरारतें और संगीत से पहला रिश्ता

बचपन में लता बेहद शरारती और चंचल थी. उनकी बहन मीना बताती हैं कि लता दीदी टायर में बैठकर सड़क पर घूमतीं, पेड़ों पर चढ़तीं, पड़ोसियों के बाग से अमरूद चुरातीं और कभी-कभी लाठी लेकर दूसरों को डराती. लेकिन घर में संगीत का माहौल था. पिता दीनानाथ घर पर ही रियाज करते, और लता पांच साल की उम्र से ही उनके साथ संगीत सीखने लगी. एक बार जब पिता राग पुरिया धनाश्री सिखा रहे थे, तो वे बाहर गए और लता ने एक छात्र की गलती सुधार दी. पिता ने लौटकर आए तो उनकी तारीफ की और कहा कि वह घर की अच्छी सिंगर हैं. लता स्कूल सिर्फ एक दिन गईं. पहले दिन उन्होंने क्लास में गाना सिखाना शुरू कर दिया, और जब टीचर ने मना किया तो वे अपनी बहन आशा को साथ ले आईं. स्कूल ने मना किया तो वे कभी नहीं लौटीं. घर पर ही शिक्षा ग्रहण की.

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फिल्मों में एक्टिंग से सिंगिंग तक

लेकिन यह खुशहाल बचपन ज्यादा दिनों तक नहीं चला. 1942 में, जब लता सिर्फ 13 साल की थीं, उनके पिता दीनानाथ की हृदय रोग से मौत हो गई और परिवार पर संकट आ गया. कोई कमाने वाला नहीं था. लता ने कहा कि वे एक दिन में 13 से 22 साल की हो गईं. उन्होंने परिवार की जिम्मेदारी संभाली. पिता के दोस्त और एक्टर मास्टर विनायक ने मदद की. उन्होंने लता को मराठी फिल्मों में छोटे रोल दिए. लता ने 'पाहिली मंगलागौर' (1942) में एक्टिंग किया और पहला गाना गाया- 'नटली चैत्राची नवलाई'. लेकिन उनका पहला गाना 'किटी हसाल' (1942) के लिए रिकॉर्ड किया गया, जो बाद में कट गया. हिंदी में पहला गाना 'गजाभाऊ' (1943) का 'माता एक सपूत की दुनिया बदल दे तू' था. 

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फिल्मों में एक्टिंग से सिंगिंग तक

लता को एक्टिंग पसंद नहीं थी. एक बार डायरेक्टर ने उनके बाल काट दिए और आइब्रो पतली कर दीं, तो वे रोते हुए मां के पास गईं और बोलीं, 'देखो, मेरा क्या हाल कर दिया!' लेकिन पैसों की जरूरत थी, इसलिए सहन किया. 1945 में वे मुंबई आ गईं. वहां उन्होंने उस्ताद अमान अली खान से हिंदुस्तानी क्लासिकल म्यूजिक सीखा. शुरुआत में संघर्ष बहुत था. उस समय नूर जहां और शमशाद बेगम जैसी सिंगर्स का बोलबाला था. लता की पतली, ऊंची आवाज को लोग पसंद नहीं करते थे. कई म्यूजिक डायरेक्टर्स ने रिजेक्ट किया. लेकिन मास्टर गुलाम हैदर ने उनकी प्रतिभा पहचानी. उन्होंने 1948 की फिल्म 'मजबूर' में 'दिल मेरा तोड़ा, मुझे कहीं का न छोड़ा' गवाया. फिर 1949 की 'महल' का 'आयेगा आनेवाला' गाना, जो मधुबाला पर फिल्माया गया, ने उन्हें स्टार बना दिया. यह गाना प्लेबैक सिंगिंग की मिसाल बना.

'ऐ मेरे वतन के लोगों' और नेहरू की आंखों के आंसू

इसके बाद लता का करियर आसमान छूने लगा. उन्होंने एस.डी. बर्मन, नौशाद, मदन मोहन, सी. रामचंद्र जैसे कंपोजर्स के साथ काम किया. 'अंदाज' (1949) का 'उठाए जा उनके सितम' हिट हुआ. वे हर साल सैकड़ों गाने गाती. 1963 में 'ऐ मेरे वतन के लोगों' गाने ने पंडित जवाहरलाल नेहरू को रुला दिया. उन्होंने 20 से ज्यादा भाषाओं में गाया, लेकिन मुख्य रूप से हिंदी, मराठी और बंगाली में. लता की आवाज इतनी परफेक्ट थी कि वे रिकॉर्डिंग के दौरान जूते उतारकर गातीं, और कभी अपने गानें सुनती तक नहीं थी. उन्हें लगता था अगर वह अपने गानें सुनेंगी तो गलतियां मिलेंगी. लेकिन शुरुआती दिनों में उन्हें उर्दू डिक्शन की समस्या हुई. दिलीप कुमार ने उनकी हिंदी पर टिप्पणी की, तो उन्होंने टीचर रखा और 'प्यार किया तो डरना क्या' जैसे गाने दिए.

लता मंगेशकर की अधूरी प्रेम कहानी का सच

लता की जिंदगी में संगीत के अलावा एक अधूरी प्रेम कहानी भी है, जो उन्होंने कभी खुलकर नहीं बताई. 1960 में वे राज सिंह डुंगरपुर से मिली. राज राजस्थान के डुंगरपुर रॉयल फैमिली के छोटे बेटे थे, क्रिकेटर और बाद में BCCI के प्रेसिडेंट. वे लता के भाई हृदयनाथ के दोस्त थे. दोनों में गहरा लगाव हुआ. राज लता को 'मिठू' बुलाते थे. वे शादी करना चाहते थे, लेकिन राज के पिता महारावल लक्ष्मण सिंह जी ने मना कर दिया क्योंकि लता रॉयल फैमिली से नहीं थीं. परिवार का दबाव इतना था कि शादी नहीं हो सकी. लता ने कहा कि 'कुछ बातें सिर्फ दिल के लिए होती हैं.' राज ने भी कभी शादी नहीं की और जीवनभर लता के दोस्त रहे. लता ने परिवार की जिम्मेदारी और करियर को प्राथमिकता दी. पिता की मौत के बाद वे मां और भाई-बहनों की देखभाल में लगी रही. उन्होंने कभी शादी नहीं की, क्योंकि वे मानती थीं कि शादी से उनका ध्यान बंट जाएगा. लेकिन इस प्रेम ने उनकी जिंदगी को एक गहराई दी, जो उनके गानों की उदासी में झलकती है. 

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जहर भी न छीन सकी आवाज 

लता की जिंदगी में कई चुनौतियां आई. 1962 में उन्हें जहर दिया गया, जिससे वे तीन महीने बीमार रही. कुक पर शक था, लेकिन कुछ साबित नहीं हुआ. इस घटना का जिक्र ब्रिटिश ऑथर नसरीन मुन्नी कबीर ने अपने किताब 'Lata Mangeshkar... in Her Own Voice' में किया है. जब अचानक लता को पेट में दर्द हुआ और उन्हें हरे रंग की उल्टियां होने लगी कुछ ही देर में बॉडी हिलने लगी वह चलने-फिरने में असमर्थ थी. डॉक्टर उनके लिए एक्स-रे मशीन घर पर लाए. जांच में खुलासा हुआ की लता को काफी समय से स्लो पॉइजन दिया जा रहा था. इस बात खुलासा होते ही उनका नौकर घर छोड़कर चला गया. लता 3 महीने तक बीमार रही. एक बार मोहम्मद रफी से रॉयल्टी के मुद्दे पर झगड़ा हुआ, और उन्होंने डुएट गाने बंद कर दिए, लेकिन बाद में सुलझ गया. लता ने भारत रत्न, पद्म विभूषण जैसे सम्मान पाए. वे राजनीति में भी आईं, राज्यसभा सदस्य बनीं. लेकिन वे हमेशा सादगी से रही. लता मंगेशकर 6 फरवरी 2022 को 92 साल की उम्र में दुनिया से विदा हुईं. लेकिन उनकी आवाज अमर है. उनकी अनकही कहानी आज भी प्रेरणा देती है कि सपने पूरे करने के लिए कभी-कभी कुछ अधूरा छोड़ना पड़ता है. 

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