मां न मरती तो इंडस्ट्री को न मिलता 'जादू' से Javed Akhtar, हनी से मजाक में, शबाना से नशे में कर बैठे थे शादी
जावेद अख्तर हिंदी सिनेमा के सबसे प्रभावशाली लेखकों और शायरों में गिने जाते हैं. मां की कम उम्र में मौत और पारिवारिक अस्थिरता ने उनके जीवन को गहराई से प्रभावित किया। 19 साल की उम्र में वे मुंबई आए, जहां फुटपाथ पर सोना, भूख सहना और बेघर रहना उनकी नियति बन गया. सलीम खान के साथ बनी सलीम-जावेद जोड़ी ने 'शोले', 'दीवार' और 'डॉन' जैसी क्लासिक फिल्में दीं और हिंदी सिनेमा का इतिहास बदल दिया.;
जावेद अख्तर (Javed Akhtar) हिंदी सिनेमा के सबसे बड़े और प्रभावशाली नामों में से एक हैं. वे शायर, गीतकार, स्क्रीनप्ले राइटर, स्क्रीनप्ले राइटर और सामाजिक विचारक के रूप में जाने जाते हैं. पद्म भूषण से सम्मानित जावेद अख्तर की जिंदगी संघर्ष, दर्द, मेहनत और आत्मनिर्भरता की मिसाल है. उनकी बायोग्राफी 'जादूनामा: जावेद अख्तर का सफर' और कई इंटरव्यू (जैसे Mojo Story, BBC आदि) से उनकी कई अनकही या कम जानी-पहचानी बातें सामने आई हैं. बचपन का नाम 'जादू' और परिवार की शुरुआत.
जावेद अख्तर का जन्म 17 जनवरी 1945 को ग्वालियर (मध्य प्रदेश) में हुआ. उनका असली नाम 'जादू' था. यह नाम उनके पिता जान निसार अख्तर (मशहूर उर्दू शायर और हिंदी फिल्मों के गीतकार) ने एक अपनी कविता की लाइन से लिया था 'लम्हा, लम्हा किसी जादू का फसाना होगा'. बाद में स्कूल के लिए नाम बदलकर जावेद रखा गया, जिसका मतलब 'हमेशा रहने वाला' है. उनकी मां सफिया अख्तर (सफिया सिराज-उल हक) उर्दू की लेखिका, टीचर और गायिका थी. जावेद का बचपन उथल-पुथल भरा रहा. जब वे सिर्फ 8 साल के थे, तभी उनकी मां की मौत हो गई. यह उनके लिए बहुत बड़ा सदमा था.
मां न मरती तो आज जावेद अख्तर न होते
Mojo Story इंटरव्यू में जावेद ने कहा था, 'जीवन एक पैकेज है, आप इसमें से चुन-चुनकर नहीं निकाल सकते. यह एक बहुत सधी हुई स्क्रिप्ट है. अगर मैं कल्पना करूं कि मेरी मां की मौत तब नहीं हुई होती जब मैं 8 साल का था... तो मेरा जीवन पूरी तरह अलग होता. कई सीन बदल जाते, कई महत्वपूर्ण पल गायब हो जाते. इसलिए मैं इसे नहीं बदलना चाहूंगा. हर अनुभव, चाहे दर्दनाक हो, ने मुझे आज का जावेद अख्तर बनाया. 'मां की मौत के बाद उनके पिता ने कुछ साल बाद दोबारा शादी कर ली. जावेद कहते हैं कि यह स्वाभाविक था, क्योंकि पिता युवा थे और अकेले रहना मुश्किल था.
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लेकिन उनकी सौतेली मां के साथ रिश्ते अच्छे नहीं बने. इस वजह से वे पिता के साथ नहीं रह सके. जावेद ने बताया, 'मेरी सौतेली मां के साथ मेरे रिश्ते अच्छे नहीं थे, इसलिए हम साथ नहीं रह सकते थे. मुंबई आने के बाद भी मैं पिता के घर मेहमान की तरह मिलने जाता था.' बचपन के ज्यादातर साल वे नाना-नानी के साथ, फिर मौसी या अन्य रिश्तेदारों के साथ बिताए. पिता एक महान कवि थे, लेकिन अभिभावक के रूप में असफल रहे. जावेद कहते हैं, 'वे अच्छे कवि थे, लेकिन जीवन की अन्य भूमिकाओं में असफल रहे. कभी-कभी बड़े लोग जिम्मेदारी नहीं निभा पाते.'
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फुटपाथ, भूख और सपनों का टूटना
19 साल की उम्र में (1964 में) जावेद मुंबई आए उनका सपना था फिल्म डायरेक्टर बनना. वे गुरु दत्त या राज कपूर के असिस्टेंट बनना चाहते थे. लेकिन जब वह , 4 अक्टूबर 1964 को मुंबई आए और 10 अक्टूबर को गुरु दत्त की मौत हो गई और उनका सपना टूट गया. जावेद साहब ने याद किया था, 'मैंने सोचा था कि स्नातक होने के बाद मैं फिल्म इंडस्ट्री में जाऊंगा और कुछ सालों के लिए गुरु दत्त के साथ काम करूंगा, और फिर निर्देशक बनूंगा. जब आप 18 साल के होते हैं, तो चीजें सरल और आसान होती हैं, इसलिए मैंने यही तय किया था.
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यह बहुत दुर्भाग्यपूर्ण है कि मैं 4 अक्टूबर 1964 को मुंबई आया और उनका 10 अक्टूबर को निधन हो गया, इसलिए मैं उन्हें कभी देख नहीं पाया.' जावेद का असली संघर्ष यहीं से शुरू हुआ. जेब में सिर्फ 27 पैसे थे कई साल तक वे बेघर रहे फुटपाथ पर, पेड़ के नीचे, स्टूडियो के कॉरिडोर में सोए. कपड़े खत्म हो गए, कई दिन भूखे रहे. वे कहते हैं, 'भूख और नींद की कमी इंसान पर गहरा असर छोड़ती है, जो कभी नहीं भूलता. कभी-कभी असिस्टेंट बनने के चक्कर में बड़े एक्टर्स के जूते उठाने पड़ते थे. लेकिन हार नहीं मानी वह गुरु दत्त के बहुत बड़े फैन थे.
सलीम-जावेद जोड़ी
1971 से शुरूआत और बड़ी सफलता मिली. सलीम खान और जावेद की मुलाकात 1966 में फिल्म 'सरहदी लूटेरा' के सेट पर हुई. सलीम एक्टर थे (प्रिंस सलीम कहलाते थे), जावेद क्लैपर बॉय और असिस्टेंट डायलॉग राइटर थे. डायरेक्टर को डायलॉग राइटर चाहिए था, तो जावेद ने काम पकड़ा इसी से दोस्ती हुई. 1971 में दोनों ने मिलकर पहली बार स्क्रिप्ट लिखी. उनकी पहली फिल्म 'अधिकार' (Adhikar, 1971) थी, लेकिन नाम क्रेडिट नहीं मिला. उसी साल 'अंदाज़' (Andaz, 1971) लिखी राजेश खन्ना वाली, हिट हुई. फिर 'हाथी मेरे साथी' (1971) राजेश खन्ना की सुपरहिट, सबसे ज्यादा कमाई वाली फिल्म.
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राजेश खन्ना ने उन्हें पहला बड़ा मौका दिया 1971 से 1982 तक (करीब 11-12 साल) वे साथ रहे और कुल 24 फिल्में लिखीं, जिनमें से 20-22 सुपरहिट रहीं. उनकी मशहूर फिल्में: ज़ंजीर (1973) अमिताभ बच्चन को 'एंग्री यंग मैन' बनाया, 'शोले' (1975) बॉलीवुड की सबसे बड़ी क्लासिक, 'दीवार' (1975), 'डॉन' (1978), 'त्रिशूल', 'मुकद्दर का सिकंदर', 'यादों की बारात', 'क्रांति' आदि. 1982 में अलग हुए वजह थकान, रिश्ते में दूरी और नए दोस्त बनना था. कोई बड़ा झगड़ा नहीं, बस धीरे-धीरे रिश्ता कमजोर पड़ गया. अलग होने के बाद भी कुछ पुरानी स्क्रिप्ट्स (जैसे मिस्टर इंडिया, 1987) रिलीज हुईं.
हनी ईरानी मजाक और शबाना से नशे कर बैठे थे शादी
जावेद अख्तर की पहली पत्नी हनी ईरानी थीं, जो पूर्व चाइल्ड एक्ट्रेस और अब सफल स्क्रीनराइटर हैं जैसे 'लम्हे', 'कभी ख़ुशी कभी ग़म' में योगदान रहा. दोनों की मुलाकात 'सीता और गीता' (1972) के सेट पर हुई थी. जावेद ने हनी को ताश खेलते हुए मजाक में प्रपोज किया था 'अगर अच्छा पत्ता आया तो शादी कर लेंगे' और पत्ता अच्छा आया. 1972 में दोनों ने शादी कर ली दोनों का बर्थडे भी एक ही है एक दिन होता 17 जनवरी.
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इस शादी से दो बच्चे हुए बेटी जोया अख्तर जो फिल्ममेकर है और बेटा फरहान अख्तर जो प्रोफेशनली एक्टर, डायरेक्टर है. शादी करीब 5 साल चली, लेकिन मिड-1970 से जावेद की शबाना आजमी से नजदीकियां बढ़ने लगीं, जिससे रिश्ते में तनाव आया. जावेद ने खुद स्वीकार किया है कि उनकी शराब की लत और गैर-जिम्मेदाराना व्यवहार भी इसका बड़ा कारण था. उन्होंने कहा कि अगर वो शराबी न होते, तो शायद शादी न टूटती. तलाक 1984-1985 के आसपास हुआ. जावेद ने कई इंटरव्यू में कहा कि पहली शादी टूटने का उन्हें गहरा अफसोस है और वे हनी के प्रति गिल्ट महसूस करते हैं.
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जावेद ने शबाना आजमी से 1984 में शादी की ये एक लव मैरिज थी, लेकिन काफी कंट्रोवर्शियल रही क्योंकि जावेद तब भी हनी से शादीशुदा थे. वहीं एक इंटरव्यू में सिंगर एक्टर अनु कपूर ने खुलासा किया था कि निकाह नशे की हालत में हुआ और खुद अनु जैसे दोस्तों ने मौलवी बुलाया था. शबाना के माता-पिता (कैफी आज़मी और शौकत आज़मी) शुरू में विरोध में थे, क्योंकि जावेद पहले से शादीशुदा और दो बच्चों के पिता थे. कई लोगों ने शबाना को 'होम ब्रेकर' कहा, खासकर क्योंकि वो फेमिनिस्ट आइकन मानी जाती थी. शबाना ने कहा कि उन्होंने हनी के 'हक' पर कदम रखा, लेकिन उन्होंने कभी जस्टिफाई नहीं किया चुप्पी साधी. हनी ने बच्चों के दिमाग में जहर नहीं भरा, जिससे शबाना और बच्चों (जोया-फरहान) का रिश्ता अच्छा बना. दोनों के कोई बच्चे नहीं हैं (मेडिकल कारणों से). शबाना ने जोया-फरहान को अपना सपोर्ट सिस्टम बनाया. 40 साल के बाद भी शादी बरकरार है. जावेद कहते हैं कि वो 'हार्डली मैरिड' हैं.