देश में फैल रही ‘कर्ज लेकर भूल जाने’ की बीमारी, लोन लेकर गायब होना बनता जा रहा ट्रेंड
भारत में डिजिटल लोन का चलन तेजी से बढ़ा है, लेकिन इसका सबसे बड़ा असर युवाओं पर दिख रहा है. छोटे-छोटे लोन अब कर्ज के पहाड़ में बदल रहे हैं, जिससे चेक बाउंस और NPA के मामले बढ़ रहे हैं.
Digital Loan Crisis
(Image Source: Social Media )India Digital Loan Crisis: भारत में कर्ज लेने का तरीका बदल चुका है. पहले लोग घर या कारोबार के लिए बैंक से लोन लेते थे, अब स्मार्टफोन पर एक क्लिक में पैसा मिल जाता है. यही आसान रास्ता आज बड़ी मुश्किल बनता जा रहा है. सबसे ज्यादा असर 25 से 35 साल की उम्र के युवाओं पर दिख रहा है. कई युवा अपनी मासिक कमाई से कई गुना ज्यादा कर्ज लेकर उसे चुका नहीं पा रहे हैं.
इकोनॉमिक टाइम्स की रिपोर्ट के अनुसार, आर्थिक जानकारों का कहना है कि यह पहली पीढ़ी है जो जरूरत और शौक के बीच की कमी को लोन से भर रही है. किराया, मोबाइल, ऑनलाइन शॉपिंग, घूमने-फिरने और गैजेट्स के खर्च को पूरा करने के लिए छोटे-छोटे लोन लिए जाते हैं. शुरुआत में रकम कम होती है, लेकिन धीरे-धीरे कई ऐप्स से लिया गया पैसा एक पहाड़ बन जाता है.
कर्ज लेने की आदत कैसे बन रही है?
आज लोन लेने के लिए न बैंक की लाइन में लगना पड़ता है, न किसी गारंटर की जरूरत होती है. मोबाइल ऐप पर आधार और पैन डालते ही पैसा खाते में आ जाता है. समस्या तब शुरू होती है जब एक लोन की किश्त चुकाने के लिए दूसरा लोन लिया जाता है. इसे विशेषज्ञ “घूमता हुआ कर्ज” कहते हैं. इसमें आदमी एक जगह से उधार लेकर दूसरी जगह की किस्त भरता रहता है, लेकिन मूल रकम घटती नहीं. युवा वर्ग में यह सोच भी बन गई है कि “अभी पैसा ले लेते हैं, बाद में देखेंगे.” यही सोच आगे चलकर बड़ी आर्थिक परेशानी बन जाती है.
आंकड़े क्या संकेत दे रहे हैं?
क्रेडिट एजेंसी CIBIL के अनुसार, नए कर्ज लेने वालों में जेनरेशन Z का हिस्सा करीब 40% से ज्यादा है. वहीं CRIF हाई मार्क और यूनिफाइड फिनटेक फोरम की रिपोर्ट बताती है कि फिनटेक कंपनियों से लोन लेने वालों में 26 से 35 साल के लोग सबसे आगे हैं. सबसे ज्यादा दिक्कत छोटे लोन (50 हजार रुपये से कम) में देखी जा रही है. इन लोन में लगभग एक चौथाई लोग समय पर भुगतान नहीं कर पा रहे. इसका सीधा असर उनके क्रेडिट स्कोर पर पड़ता है और भविष्य में बैंक से लोन लेना मुश्किल हो जाता है.
चेक बाउंस के मामले क्यों बढ़ रहे हैं?
कर्ज की मार सिर्फ ऐप्स तक सीमित नहीं है. चेक बाउंस के मामले भी तेजी से बढ़े हैं. देश की अदालतों में 40 लाख से ज्यादा ऐसे केस लंबित बताए जाते हैं. कानून के तहत चेक बाउंस पर दो साल तक की सजा का प्रावधान है, लेकिन फिर भी लोग जोखिम उठा रहे हैं. हाल के वर्षों में कई चर्चित मामलों ने दिखाया है कि कर्ज न चुका पाने की कीमत जेल तक हो सकती है.
बैंकों की हालत पर असर
लगातार बढ़ते डिफॉल्ट से बैंकों और एनबीएफसी पर भी दबाव बढ़ रहा है. क्रेडिट कार्ड का बकाया तेजी से बढ़ा है और बड़ी संख्या में लोग न्यूनतम भुगतान भी नहीं कर पा रहे. माइक्रो लोन सेक्टर में भी खराब कर्ज (NPA) का प्रतिशत ऊपर गया है. इसका मतलब साफ है कि जो पैसा बाजार में घूमना चाहिए, वह फंसा हुआ है.
किन राज्यों में ज्यादा संकट?
चेक बाउंस के सबसे ज्यादा मामले महाराष्ट्र में दर्ज हैं. इसके बाद गुजरात का नंबर आता है. अकेले पुणे में करोड़ों रुपये के चेक बाउंस हुए हैं. इस बढ़ते बोझ को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने मामलों के निपटारे के लिए व्हाट्सएप नोटिस और आंशिक भुगतान जैसे उपायों पर जोर दिया है.
असली वजह क्या है?
विशेषज्ञों के अनुसार, इसके तीन बड़े कारण हैं:
- खर्च बढ़ना - सोशल मीडिया और ऑनलाइन ट्रेंड से जीवनशैली महंगी हो गई है.
- आसान कर्ज - बिना पूछताछ के पैसा मिल जाना जोखिम बढ़ा रहा है.
- आर्थिक शिक्षा की कमी - युवाओं को यह नहीं सिखाया गया कि कर्ज कैसे संभालना है.
रास्ता क्या है?
समाधान सिर्फ कानून या बैंकों से नहीं आएगा. जरूरत है कि युवा अपनी आमदनी और खर्च का हिसाब रखें. छोटे लोन को आदत न बनाएं, और अगर कर्ज लेना जरूरी हो तो उसकी ईएमआई अपनी कमाई के हिसाब से तय करें. आज का सवाल सिर्फ यह नहीं है कि लोग कर्ज क्यों ले रहे हैं, बल्कि यह है कि क्या वे कर्ज को समझ भी रहे हैं? अगर यही रफ्तार रही, तो आने वाले सालों में भारत को एक ऐसी पीढ़ी मिलेगी जो कमाई से ज्यादा उधार पर जी रही होगी - और यही सबसे बड़ा खतरा है.