मिडिल ईस्ट वार ने बदला खेल: अब पोर्ट नहीं, बॉर्डर से बिक रहा गेहूं, सबसे ज्यादा फायदे में किस राज्य के किसान?
मिडिल ईस्ट युद्ध ने वैश्विक सप्लाई चेन को प्रभावित कर गेहूं व्यापार का रास्ता बदल दिया है. अब बिहार और यूपी के किसान बॉर्डर के जरिए नेपाल-बांग्लादेश में ज्यादा दाम पर गेहूं बेच रहे हैं.
ईरान अमेरिका और इजरायल के बीच 20 दिन से जारी युद्ध ने पूरी दुनिया को पूरी तरह से प्रभावित किया है. पेट्रोल और डीजल की बात छोड़िए, अब तो गेहूं उत्पादक किसानों को उसे बेचने के लिए बाजार भी नए ढूंढने पड़ रहे हैं. कहने का मतलब यह है कि मिडिल ईस्ट में जारी युद्ध ने वैश्विक व्यापार के समीकरण बदल दिए हैं. इसका असर अब भारत के खेतों तक दिखने लगा है. खासतौर पर गेहूं के कारोबार में एक बड़ा बदलाव सामने आया है. मिंट की रिपोर्ट के अनुसार, जहां पहले निर्यात का बड़ा हिस्सा समुद्री रास्तों से होता था, अब वही व्यापार तेजी से जमीनी बॉर्डर की ओर शिफ्ट हो रहा है. इसका सबसे ज्यादा फायदा बिहार Bihar और Uttar Pradesh के किसानों को मिल रहा है. दोनों राज्यों के किसानों ने अब नेपाल और बांग्लादेश जैसे पड़ोसी देशों में बेहतर दाम पर गेहूं बेचना शुरू कर दिया है.
मिडिल ईस्ट युद्ध ने सच में बदल दिया गेहूं व्यापार का रास्ता?
पश्चिम एशिया में युद्ध और उससे जुड़े तनाव ने वैश्विक सप्लाई चेन को प्रभावित किया है. लाल सागर के रास्ते शिपिंग महंगी और अनिश्चित हो गई है, जिससे समुद्री व्यापार की लागत बढ़ी है. इसका असर यह हुआ कि भारत के निर्यातक अब वैकल्पिक रास्तों की तलाश में हैं. ऐसे में Bangladesh और Nepal जैसे नजदीकी देशों के लिए सड़क और रेल मार्ग ज्यादा भरोसेमंद विकल्प बनकर उभरे हैं.
क्यों बिहार और यूपी के किसान सबसे ज्यादा फायदे में?
इस बदलते ट्रेंड का सबसे बड़ा फायदा पूर्वी भारत के राज्यों खासकर बिहार और उत्तर प्रदेश को मिला है. इसकी सबसे बड़ी वजह उनकी भौगोलिक स्थिति है. ये राज्य सीधे तौर पर बांग्लादेश और नेपाल की सीमा से जुड़े हैं, जिससे ट्रांसपोर्टेशन लागत कम हो जाती है और माल जल्दी पहुंचता है.
देश में गेहूं उत्पादन के मामले में आंकड़ों पर नजर डालें तो उत्तर प्रदेश सबसे बड़ा गेहूं उत्पादक राज्य है, जहां हर साल करीब 36 मिलियन टन गेहूं पैदा होता है, जो देश का लगभग 30% है. वहीं, बिहार करीब 8 मिलियन टन उत्पादन के साथ छठे स्थान पर है और कुल उत्पादन में करीब 6% की हिस्सेदारी रखता है. ऐसे में जब निर्यात के नए रास्ते खुलते हैं, तो इन राज्यों के किसानों को सीधा लाभ मिलता है.
एक्सपोर्ट प्रीमियम क्या, किसानों को कितना हो रहा फायदा?
गेहूं कारोबारियों के मुताबिक, बॉर्डर के जरिए हो रहे इस व्यापार में किसानों को घरेलू मंडी के मुकाबले 5 से 10 फीसदी तक ज्यादा दाम मिल सकता है. इंडिया पल्स एंड ग्रेंस एसोसिएशन के चेयरमैन बिमल कोठारी के अनुसार, अंतरराष्ट्रीय कीमतों में बढ़ोतरी और सप्लाई में बाधा के चलते यह प्रीमियम संभव हुआ है. उनका कहना है कि रूस-यूक्रेन युद्ध और मिडिल ईस्ट तनाव ने वैश्विक गेहूं आपूर्ति को प्रभावित किया है, जिससे कीमतों में उछाल आया है. इसका फायदा भारत के पूर्वी राज्यों को मिल रहा है.
क्या समुद्री राज्यों के मुकाबले पूर्वी राज्यों को मिली बढ़त?
लॉजिस्टिक्स के नजरिए से देखें तो पूर्वी राज्यों को स्पष्ट बढ़त मिली है. बिनोद आनंद के मुताबिक, पंजाब और हरियाणा जैसे राज्यों से गेहूं को पोर्ट तक ले जाने में भारी खर्च आता है. जबकि बिहार और यूपी से बांग्लादेश तक सड़क या रेल से सप्लाई करना सस्ता और तेज है. यही कारण है कि एक्सपोर्टर अब पूर्वी भारत से खरीद को प्राथमिकता दे रहे हैं. इससे स्थानीय किसानों को नए बाजार मिल रहे हैं और उनकी आय बढ़ने की संभावना भी.
क्या बांग्लादेश और नेपाल बड़े बाजार बन रहे हैं?
बांग्लादेश इस क्षेत्र का सबसे बड़ा गेहूं आयातक देश है, जहां सालाना करीब 7 मिलियन टन की खपत है और इसमें से 6 मिलियन टन आयात के जरिए पूरा होता है. वहीं नेपाल में करीब 2 मिलियन टन की खपत है, जिसमें 1 से 1.5 मिलियन टन आयात किया जाता है. ऐसे में भारत के लिए ये दोनों देश बड़े अवसर बनकर उभर रहे हैं. खासतौर पर पूर्वी यूपी और बिहार के किसान, जो इन बाजारों के करीब हैं, उन्हें सीधा फायदा मिल रहा है.
क्या भारत की ग्लोबल गेहूं मार्केट में वापसी आसान होगी?
ऐसा कहना अभी मुश्किल है. एक तरफ भारत ने करीब चार साल बाद गेहूं निर्यात फिर से शुरू किया है और इस साल उत्पादन 120 मिलियन टन के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंचने का अनुमान है. दूसरी तरफ वैश्विक अस्थिरता, खासकर मिडिल ईस्ट और ब्लैक सी क्षेत्र में तनाव, भारत की वापसी को चुनौतीपूर्ण बना रहे हैं. Global Trade Research Initiative की रिपोर्ट के अनुसार, खाड़ी क्षेत्र में जारी तनाव के कारण भारत के करीब 11.8 बिलियन डॉलर के कृषि निर्यात पर जोखिम बना हुआ है.
क्या हीटवेव से किसानों की उम्मीदों पर असर पड़ेगा?
मौजूदा हालात किसानों के पक्ष में दिख रहे हैं. गेहूं कारोबारियों के मुताबिक अगर हीटवेव की स्थिति बनी रहती है, तो इससे गेहूं की पैदावार प्रभावित हो सकती है. इससे सप्लाई घटेगी और कीमतों पर असर पड़ सकता है.
अब आगे क्या?
मिडिल ईस्ट युद्ध ने जहां वैश्विक व्यापार को झटका दिया है, वहीं भारत के पूर्वी राज्यों के लिए यह एक अवसर बनकर उभरा है. बॉर्डर ट्रेड के बढ़ते ट्रेंड ने बिहार और उत्तर प्रदेश के किसानों को नई ताकत दी है. अब देखना यह होगा कि यह बदलाव अस्थायी रहता है या भारत के गेहूं निर्यात का नया मॉडल बन जाता है. फिलहाल इतना तय है कि इस “युद्ध के खेल” में सबसे बड़ा फायदा सीमावर्ती राज्यों के किसानों को मिल रहा है.