Budget 2026: भारत की अर्थव्यवस्था को पलट देने वाले 12 ऐतिहासिक केंद्रीय बजट, 1983 से 2025 तक सत्ता, सिस्टम और सुधारों की पूरी कहानी

1983-84 में प्रणब मुखर्जी के प्रदर्शन आधारित अनुदान से लेकर 1991-92 में मनमोहन सिंह के ऐतिहासिक उदारीकरण, 1997-98 के ‘ड्रीम बजट’, FRBM कानून, शिक्षा उपकर, आधार–DBT, GST और 2025-26 के नए कर सुधारों तक - बजट भारत में सुधार, संघवाद, पारदर्शिता और विकास का सबसे बड़ा औजार रहा है. टाइम्‍स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के अनुसार यह यात्रा बताती है कि बजट हमेशा सिर्फ लेखा दस्तावेज नहीं, बल्कि बदलाव का इंजन रहा है.;

( Image Source:  Sora AI )
Edited By :  प्रवीण सिंह
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केंद्रीय बजट केवल सरकार के आय-व्यय का वार्षिक ब्योरा नहीं होता, बल्कि यह देश की आर्थिक दिशा तय करने वाला रोडमैप होता है. बजट यह संकेत देता है कि सरकार किस तरह के सुधार चाहती है, अर्थव्यवस्था को किस दिशा में ले जाना चाहती है और नागरिकों, उद्योगों व निवेशकों के लिए आगे का रास्ता क्या होगा. पिछले कुछ दशकों में भारत के कई केंद्रीय बजट ऐसे रहे हैं जिन्होंने न केवल नीतियों में बदलाव किया, बल्कि पूरे संस्थागत ढांचे को नई शक्ल दी. ये बजट सुधारवादी, परिवर्तनकारी और कई मायनों में ऐतिहासिक साबित हुए.

1991-92 में मनमोहन सिंह के ऐतिहासिक बजट से लेकर पी. चिदंबरम के ‘ड्रीम बजट’, यशवंत सिन्हा और जसवंत सिंह के संस्थागत सुधारों तथा निर्मला सीतारमण के नए कर ढांचे तक - ये सभी बजट भारत की आर्थिक यात्रा के मील के पत्थर रहे हैं.

प्रदर्शन का सिद्धांत: प्रणब मुखर्जी (1983-84)

28 फरवरी 1983 को वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी ने संसद में एक “कुछ हद तक असामान्य कदम” की घोषणा की. उन्होंने राज्यों को मिलने वाले 300 करोड़ रुपये के अनुदान को जनसंख्या या राजनीतिक सौदेबाजी के बजाय प्रदर्शन आधारित मानकों से जोड़ दिया. उन्होंने कहा कि अतिरिक्त 125 करोड़ रुपये उन राज्यों को दिए जाएंगे, जो उच्च प्राथमिकता वाले क्षेत्रों में योजनाओं के क्रियान्वयन में बेहतर प्रदर्शन करेंगे. बजट दस्तावेजों में यह साफ किया गया कि राज्यों को तभी धन मिलेगा जब वे स्वीकृत योजनाओं से बेहतर लक्ष्य हासिल कर दिखाएंगे. यह आउटकम-बेस्ड फेडरलिज़्म का प्रारंभिक रूप था - उस दौर में, जब यह शब्द नीति विमर्श में भी नहीं था.

इसी बजट में कॉरपोरेट मुनाफे पर न्यूनतम कर (Minimum Tax) की अवधारणा पेश की गई. मुखर्जी ने कहा कि कर छूट और प्रोत्साहन कंपनियों के मुनाफे के 70% से अधिक को नहीं निगल सकते, ताकि कम से कम 30% मुनाफे पर कर जरूर लगे. हालांकि उस समय इस बजट पर ज्यादा ध्यान नहीं दिया गया, लेकिन प्रदर्शन आधारित आवंटन और न्यूनतम कर जैसे सिद्धांत आगे चलकर भारत की कर और वित्तीय सुधार नीति की नींव बने.

कर क्रांति: वी.पी. सिंह (1985-86)

16 फरवरी 1985 को पेश बजट में वी.पी. सिंह ने व्यक्तिगत आयकर प्रणाली को “उल्टा असर डालने वाली” बताया. उन्होंने करमुक्त सीमा को 15,000 से बढ़ाकर 18,000 रुपये कर दिया, जिससे करीब 10 लाख करदाता कर दायरे से बाहर हो गए. आयकर स्लैब की संख्या आठ से घटाकर चार कर दी गई और अधिकतम कर दर 61.875% से घटाकर 50% कर दी गई. कॉरपोरेट कर में भी न्यूनतम कर की अवधारणा को अपनाया गया. औद्योगिक आधुनिकीकरण के लिए मशीनरी पर मूल्यह्रास (Depreciation) की दर 10% से बढ़ाकर 15% की गई, जबकि ऊर्जा बचत उपकरणों पर 100% मूल्यह्रास की अनुमति दी गई. इसी बजट में औद्योगिक लाइसेंस प्रणाली को ढीला करने की प्रक्रिया शुरू हुई.

संस्थागत निर्माता: राजीव गांधी (1987-88)

28 फरवरी 1987 को पेश बजट में राजीव गांधी का फोकस केवल वित्तीय नहीं, बल्कि संस्थागत निर्माण पर था. शिक्षा के लिए आवंटन 352 करोड़ से बढ़ाकर 800 करोड़ रुपये किया गया. इसी सोच से आगे चलकर भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड (SEBI) को वैधानिक शक्तियां मिलीं. साथ ही, यूनिट ट्रस्ट ऑफ इंडिया के एकाधिकार को तोड़ते हुए एसबीआई को म्यूचुअल फंड शुरू करने की अनुमति दी गई, जिससे प्रतिस्पर्धी पूंजी बाजार की नींव पड़ी.

संकट का सुधारक: मनमोहन सिंह (1991-92)

24 जुलाई 1991 को पेश बजट ने भारत की आर्थिक नीति को पूरी तरह बदल दिया. भुगतान संतुलन संकट के बीच मनमोहन सिंह ने कहा कि अत्यधिक केंद्रीकरण और नौकरशाही ने अर्थव्यवस्था को कमजोर बना दिया है. विदेशी मुद्रा भंडार केवल दो हफ्ते के आयात के बराबर रह गया था. औद्योगिक लाइसेंसिंग खत्म की गई, व्यापार नीति बदली गई और सार्वजनिक उपक्रमों में विनिवेश की शुरुआत हुई. विदेशी निवेश को संदेह की बजाय अवसर के रूप में देखा गया. उन्होंने कहा - “कोई भी शक्ति उस विचार को नहीं रोक सकती, जिसका समय आ चुका हो.”

इंफ्रास्‍ट्रक्‍चर वित्तपोषक: पी. चिदंबरम (1996-97)

22 जुलाई 1996 को पेश बजट में चिदंबरम ने कहा कि अवसंरचना के लिए 15-20 साल के दीर्घकालिक वित्त की जरूरत है. इसी से IDFC की स्थापना हुई. साथ ही, NHAI की पूंजी बढ़ाई गई और विनिवेश आयोग बनाया गया.

‘ड्रीम बजट’: पी. चिदंबरम (1997-98)

28 फरवरी 1997 को पेश बजट को ‘ड्रीम बजट’ कहा गया. आयकर दरें 15-30-40% से घटाकर 10-20-30% कर दी गईं. कंपनियों अधिनियम में बड़े सुधार किए गए और आईटी सेक्टर को भविष्य की ताकत के रूप में पहचाना गया.

विनिवेश के शिल्पकार: यशवंत सिन्हा (1999-2000)

27 फरवरी 1999 को पेश बजट में सार्वजनिक उपक्रमों के निजीकरण और प्रतिस्पर्धा आधारित सुधारों की स्पष्ट रणनीति रखी गई. 10,000 करोड़ रुपये जुटाने का लक्ष्य रखा गया. इसी से आगे चलकर Competition Act, 2002 बना.

राजकोषीय अनुशासन: जसवंत सिंह (2003-04)

28 फरवरी 2003 को पेश बजट ने FRBM Act की नींव रखी. घाटा सीमित करने, पारदर्शिता और जवाबदेही को कानूनी रूप दिया गया. एक-पन्ने का आयकर रिटर्न और कर निरीक्षण में सुधार इसी बजट की देन हैं.

कर को दिखने योग्य बनाना: पी. चिदंबरम (2004-05)

8 जुलाई 2004 को 2% शिक्षा उपकर लगाया गया, जिससे कर और सामाजिक निवेश के बीच सीधा संबंध दिखा.

तकनीक का आधार: प्रणब मुखर्जी (2009-12)

इन बजटों के दौरान आधार और प्रत्यक्ष लाभ अंतरण (DBT) की नींव पड़ी, जिसने आगे चलकर JAM ट्रिनिटी को संभव बनाया.

कर एकीकरण: अरुण जेटली (2017-18)

GST परिषद के जरिए केंद्र–राज्य सहमति से कर नीति बनाई गई - यह भारतीय संघवाद में एक ऐतिहासिक प्रयोग था.

इंफ्रास्‍ट्रक्‍चर और नया कर ढांचा: निर्मला सीतारमण (2020-21)

नेशनल इंफ्रास्ट्रक्चर पाइपलाइन, एसेट मोनेटाइजेशन और नया आयकर ढांचा पेश किया गया.

कर सुधार: निर्मला सीतारमण (2025-26)

12 लाख रुपये तक आय को कर मुक्त किया गया, जन विश्वास बिल 2.0, नया आयकर बिल और अनुपालन सरल करने की दिशा में बड़े कदम उठाए गए.

एक विकसित होती राह

चार दशक पहले शुरू हुए प्रदर्शन आधारित अनुदान से लेकर आज के अनुपालन सरलीकरण तक - भारत का बजट केवल लेखा दस्तावेज नहीं, बल्कि संस्थागत परिवर्तन का औजार रहा है. आने वाले समय में डिजिटल टैक्स, जलवायु वित्त और जनसांख्यिकीय बदलावों जैसी चुनौतियों के बीच बजट को फिर से सुधार और विकास का लंगर बनना होगा.

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