ट्रंप के मुंह पर भारत का नाम क्यों? वेनेजुएला पर हमले के बाद भी मांग रहे ‘नोबेल पीस प्राइज’, अब तेल बेचने के लिए भी नजर
अमेरिकी राष्ट्रपति Donald Trump ने वेनेजुएला में सैन्य कार्रवाई और भारत-पाकिस्तान तनाव रोकने का श्रेय लेते हुए खुद को ‘नोबेल शांति पुरस्कार’ का सबसे बड़ा हकदार बताया है. ट्रंप का दावा है कि मई 2025 में भारत और पाकिस्तान के बीच परमाणु युद्ध जैसे हालात उन्होंने टाले, जबकि भारत सरकार ने इस दावे को खारिज किया है. इसी बीच ट्रंप प्रशासन ने Venezuela के तेल को अमेरिकी नियंत्रण में वैश्विक बाजार जिसमें India भी शामिल है में बेचने का संकेत दिया है. यह कदम भू-राजनीति, ऊर्जा और नोबेल की राजनीति को एक साथ जोड़ देता है.
वेनेजुएला में अमेरिकी कार्रवाई के बाद एक बार फिर Donald Trump ने खुद को वैश्विक शांति का सबसे बड़ा चेहरा बताना शुरू कर दिया है. ट्रंप का तर्क है कि कठोर सैन्य और आर्थिक दबाव के जरिए उन्होंने दुनिया को बड़े युद्धों से बचाया. इसी दलील के आधार पर वह खुद को ‘नोबेल शांति पुरस्कार’ का सबसे प्रबल दावेदार बता रहे हैं. आलोचकों का कहना है कि यह रणनीति शांति से ज्यादा शक्ति प्रदर्शन की राजनीति है.
ट्रंप ने एक बार फिर दावा किया कि मई 2025 में जब भारत और पाकिस्तान युद्ध के कगार पर थे, तब उन्होंने “रैपिड ऑर्डर” के जरिए हालात संभाले. उनके मुताबिक, दोनों परमाणु संपन्न देशों के बीच टकराव इतना बढ़ चुका था कि लड़ाकू विमान गिर चुके थे और परमाणु संघर्ष का खतरा था. ट्रंप का कहना है कि उनके हस्तक्षेप से करोड़ों लोगों की जान बची. इसी दावे को वह अपनी ‘शांति उपलब्धियों’ का केंद्र बताते हैं.
पाकिस्तान के प्रधानमंत्री का हवाला
ट्रंप ने Shehbaz Sharif की अमेरिका यात्रा का जिक्र करते हुए कहा कि पाकिस्तानी प्रधानमंत्री ने सार्वजनिक तौर पर उनके प्रयासों की सराहना की थी. ट्रंप के मुताबिक, शरीफ ने माना कि अमेरिकी हस्तक्षेप के बिना हालात भयावह हो सकते थे. हालांकि इस बयान को लेकर दक्षिण एशिया में नई बहस छिड़ गई, क्योंकि आधिकारिक रिकॉर्ड में इस तरह की स्पष्ट स्वीकारोक्ति पर सवाल उठे.
भारत का साफ इनकार
भारत सरकार ने ट्रंप के दावों को लगातार खारिज किया है. नई दिल्ली का रुख स्पष्ट है कि युद्धविराम का फैसला भारत और पाकिस्तान के बीच सीधे सैन्य संवाद से हुआ था, खासकर DGMO स्तर की बातचीत के जरिए. भारत का कहना है कि किसी तीसरे पक्ष की मध्यस्थता नहीं थी. इस विरोधाभास ने ट्रंप के ‘नोबेल नैरेटिव’ को और विवादास्पद बना दिया है.
वेनेजुएला ऑपरेशन और ‘शांति’ का तर्क
ट्रंप प्रशासन वेनेजुएला में सैन्य और राजनीतिक हस्तक्षेप को भी शांति स्थापना के रूप में पेश कर रहा है. Nicolás Maduro की गिरफ्तारी और सत्ता परिवर्तन के बाद ट्रंप ने दावा किया कि उन्होंने क्षेत्रीय अस्थिरता का एक बड़ा स्रोत खत्म कर दिया. आलोचक इसे सीधा सत्ता हस्तांतरण बताते हैं, जबकि ट्रंप समर्थक इसे तानाशाही के खिलाफ निर्णायक कार्रवाई कहते हैं.
तेल, नियंत्रण और नई वैश्विक डील
वेनेजुएला के बाद अब ऊर्जा राजनीति केंद्र में है. ट्रंप प्रशासन ने संकेत दिए हैं कि वेनेजुएला का तेल वैश्विक बाजार में वापस लाया जाएगा, लेकिन अमेरिकी नियंत्रण के तहत. US Department of Energy के बयानों के अनुसार, तेल बिक्री से होने वाली आय वॉशिंगटन-नियंत्रित खातों में जाएगी. ट्रंप इसे अवैध नेटवर्क तोड़ने और वैश्विक ऊर्जा स्थिरता का कदम बता रहे हैं.
भारत के लिए नया विकल्प या नया दबाव?
भारत, जो दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा तेल आयातक है, इस बदले हुए समीकरण में अहम भूमिका में है. अमेरिकी ढांचे के तहत भारत को फिर से वेनेजुएला का भारी कच्चा तेल खरीदने की अनुमति मिल सकती है. इससे रूसी तेल पर निर्भरता घटाने का विकल्प खुलेगा. हालांकि विशेषज्ञ मानते हैं कि यह स्वतंत्र व्यापार नहीं, बल्कि अमेरिकी शर्तों के तहत नियंत्रित सप्लाई होगी.
नोबेल की मांग या चुनावी रणनीति?
ट्रंप का नोबेल शांति पुरस्कार का दावा अब सिर्फ सम्मान की चाह नहीं, बल्कि एक राजनीतिक संदेश बन चुका है. वे खुद को युद्ध रोकने वाला नेता बताते हैं, जबकि आलोचक उन्हें टकराव बढ़ाने वाला मानते हैं. भारत–पाकिस्तान से लेकर वेनेजुएला तक, ट्रंप की हर कार्रवाई को ‘शांति’ के फ्रेम में पेश किया जा रहा है. सवाल यही है- क्या यह वाकई शांति है, या शक्ति को शांति के नाम पर बेचने की रणनीति?





