Princess Leila Pahlavi: ईरान की वो राजकुमारी, जिसने 9 साल में देश छोड़ा और 31 में दुनिया, कहानी लीला पहलवी की
ईरान की आखिरी शाही राजकुमारी लीला पहलवी की जिंदगी सत्ता, निर्वासन और गहरे अकेलेपन की दर्दनाक कहानी है. 9 साल की उम्र में 1979 की इस्लामिक क्रांति के बाद उन्हें ईरान छोड़ना पड़ा. बचपन के महलों की दुनिया अचानक अनिश्चितता और डर में बदल गई. पिता शाह मोहम्मद रजा पहलवी की मौत ने उन्हें मानसिक रूप से तोड़ दिया. निर्वासन में पहचान के संकट, डिप्रेशन, एनोरेक्सिया और दवाओं पर निर्भरता ने उनकी जिंदगी को और मुश्किल बना दिया.
ईरान के इतिहास में पहलवी राजवंश का नाम कभी शान, ताकत और आधुनिकता का प्रतीक था. लेकिन इसी राजवंश की सबसे छोटी राजकुमारी लीला पहलवी की जिंदगी एक ऐसी त्रासदी बन गई, जिसमें महलों की चमक तो थी, पर सुकून नहीं. 9 साल की उम्र में देश छोड़ने को मजबूर हुई यह राजकुमारी 31 साल की उम्र में लंदन के एक होटल के कमरे में मृत पाई गई. उनकी कहानी सिर्फ एक राजकुमारी की नहीं, बल्कि सत्ता के पतन, निर्वासन, मानसिक पीड़ा और पहचान के टूटने की कहानी है.
लीला पहलवी का जन्म 27 मार्च 1970 को ईरान की राजधानी तेहरान में हुआ था. वह ईरान के आखिरी शाह मोहम्मद रजा पहलवी और महारानी फराह पहलवी की सबसे छोटी संतान थीं. बचपन के शुरुआती साल उन्होंने शाही महलों में बिताए, जहां सुरक्षा, अनुशासन, परंपरा और आधुनिकता का अनोखा मेल था.
शाही परिवार में लीला को एक संवेदनशील और अंतर्मुखी बच्ची माना जाता था. वह अपने माता-पिता और भाई-बहनों से बेहद जुड़ी हुई थीं. उन्हें फारसी संस्कृति, इतिहास और कला से गहरा लगाव था. निजी शिक्षक, शाही रस्में और सख्त प्रोटोकॉल - सब कुछ उनके बचपन का हिस्सा था. लेकिन यह सुरक्षित और चमकदार दुनिया बहुत जल्दी टूटने वाली थी.
1979 की क्रांति और एक बच्ची का घर छूटना
जनवरी 1979 में ईरान में इस्लामिक क्रांति ने शाह के शासन को उखाड़ फेंका. सड़कों पर “शाह मुर्दाबाद” के नारे गूंज रहे थे. हालात इतने बिगड़ चुके थे कि पहलवी परिवार को देश छोड़ना पड़ा. लीला उस वक्त सिर्फ 9 साल की थीं. ईरान छोड़ने के साथ ही लीला ने सिर्फ अपना देश ही नहीं, बल्कि अपनी पहचान, सुरक्षा और बचपन भी खो दिया. इसके बाद परिवार मिस्र, मोरक्को, बहामास, मैक्सिको, अमेरिका और पनामा जैसे देशों में भटकता रहा. हर देश में उनका ठहराव अस्थायी था. राजनीतिक दबाव, जान से मारने की धमकियां और अनिश्चित भविष्य-यह सब उनकी रोजमर्रा की जिंदगी बन चुका था. इसी दौरान शाह मोहम्मद रजा पहलवी कैंसर (लिम्फोमा) से जूझ रहे थे, जिससे परिवार पर भावनात्मक बोझ और बढ़ गया.
Image Credit: farahpahlavi.org
पिता की मौत और टूटता सहारा
27 जुलाई 1980 को मिस्र के काहिरा में शाह मोहम्मद रजा पहलवी की मौत हो गई. लीला तब महज 10 साल की थीं. पिता की मौत ने उनके जीवन में एक और गहरी दरार डाल दी. अब ईरान लौटने की आखिरी उम्मीद भी खत्म हो चुकी थी. महारानी फराह ने अंततः अमेरिका में बसने का फैसला किया. परिवार कनेक्टिकट के ग्रीनविच में रहने लगा. लीला ने न्यूयॉर्क के यूनाइटेड नेशंस इंटरनेशनल स्कूल में पढ़ाई की और बाद में राय कंट्री डे स्कूल से 1988 में ग्रेजुएशन किया. बाहर से देखने पर उनकी जिंदगी सुविधाओं से भरी लगती थी, लेकिन अंदर ही अंदर वह खुद को जड़ से कटा हुआ महसूस करती थीं.
पहचान का संकट और निर्वासन का दर्द
लीला फारसी, अंग्रेजी और फ्रेंच भाषा में पारंगत थीं. वह अमेरिका और पेरिस के बीच समय बिताने लगीं. लेकिन वह न पूरी तरह ईरानी रहीं, न ही पश्चिमी समाज में खुद को पूरी तरह स्वीकार कर पाईं. करीबी लोगों के मुताबिक, लीला अक्सर कहती थीं कि वह “कहीं की नहीं रहीं.” एक ऐसी राजकुमारी, जिसे सिंहासन नहीं चाहिए था, लेकिन अतीत का बोझ भी छोड़ नहीं पा रही थीं. वह अपने भाई रेजा पहलवी की तरह राजनीतिक भूमिका में नहीं आना चाहती थीं और मीडिया की नजरों से दूर रहना पसंद करती थीं.
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बीमारी, अवसाद और एनोरेक्सिया से जंग
युवा उम्र में लीला गंभीर स्वास्थ्य समस्याओं से घिर गईं. उन्हें क्रॉनिक फटीग सिंड्रोम, डिप्रेशन और गंभीर एनोरेक्सिया (भोजन से जुड़ा मानसिक रोग) हो गया. उनका वजन खतरनाक स्तर तक गिर गया था. इलाज अमेरिका और ब्रिटेन में चला, लेकिन मानसिक पीड़ा कम नहीं हुई. नींद न आना, घबराहट और अकेलापन उनकी जिंदगी का हिस्सा बन गया. इसी दौरान उन्हें नींद की गोलियों और प्रिस्क्रिप्शन दवाओं पर निर्भरता हो गई. परिवार के मुताबिक, यह नशा नहीं बल्कि दर्द से राहत पाने की कोशिश थी.
मॉडलिंग, खूबसूरती और अकेलापन
लीला ने कुछ समय के लिए पेरिस में मॉडलिंग भी की. उनकी खूबसूरती, सादगी और शालीनता की काफी चर्चा हुई. लेकिन यह दुनिया भी उन्हें सुकून नहीं दे सकी. वह भीड़ में रहकर भी अकेली थीं. शाही विरासत का बोझ, टूटा हुआ अतीत और अनिश्चित भविष्य-इन सबके बीच लीला खुद को खोती चली गईं. महारानी फराह लगातार बेटी की देखभाल में लगी रहीं और उम्मीद करती रहीं कि समय के साथ हालात सुधरेंगे.
लंदन के होटल में मौत
10 जून 2001 को लंदन के लियोनार्ड होटल के एक कमरे में लीला पहलवी मृत पाई गईं. वह 31 साल की थीं. जांच में सामने आया कि उनकी मौत प्रिस्क्रिप्शन बार्बिट्यूरेट दवाओं की अधिक मात्रा से हुई थी. उनके शरीर में कोकीन के अंश भी मिले. कोरोनर कोर्ट ने इसे “संभावित आत्महत्या” करार दिया. हालांकि कोई सुसाइड नोट नहीं मिला, लेकिन लंबे समय से चली आ रही मानसिक परेशानियों ने इस निष्कर्ष को मजबूती दी.
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मौत भी निर्वासन में
लीला पहलवी को पेरिस में दफनाया गया. वह अपने वतन ईरान वापस कभी नहीं जा सकीं - न जिंदगी में, न मौत के बाद. यह तथ्य उनकी पूरी जिंदगी की सबसे बड़ी त्रासदी का प्रतीक बन गया. 2011 में उनके भाई प्रिंस अली रेजा की भी आत्महत्या हो गई, जिसने महारानी फराह के दर्द को और गहरा कर दिया.
एक राजकुमारी, जो सुकून नहीं पा सकी
लीला पहलवी की कहानी यह दिखाती है कि सत्ता, दौलत और शाही पहचान भी इंसान को मानसिक पीड़ा से नहीं बचा सकती. उनका जीवन निर्वासन की उस कीमत को दर्शाता है, जो अक्सर इतिहास की किताबों में नहीं लिखी जाती. ईरान की इस राजकुमारी की जिंदगी एक सवाल छोड़ जाती है - क्या एक इंसान बिना जड़ों के, बिना पहचान के, वाकई जी सकता है? लीला की कहानी शायद इसी सवाल का सबसे दुखद जवाब है.





