'भीख मांगते हुए हमें शर्म आती है', PM शहबाज ने माना पाकिस्तान के लिए ऐसा करना हमारी मजबूरी
पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ का यह कबूलनामा किसी भी देश से लोन मांगने पर सिर शर्म से झुक जाता है. यह एक बयान नहीं, बल्कि उस सच्चाई का आईना है जिसे पाकिस्तान सालों से छिपाने की कोशिश करता रहा है. कर्ज के सहारे चलती अर्थव्यवस्था ने देश को ऐसी स्थिति में ला खड़ा किया है, जहां आत्म-सम्मान और आर्थिक जरूरतों के बीच टकराव साफ दिख रहा है.
पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था एक बार फिर दुनिया के सामने बेनकाब हो गई है. विदेशी कर्ज पर जिंदा मुल्क के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने ऐसा बयान दिया है, जिसने न सिर्फ पाकिस्तान की आर्थिक बदहाली को उजागर किया, बल्कि सत्ता के गलियारों में चल रही असहज सच्चाई को भी सामने रख दिया है. पीएम का यह बयान शुक्रवार रात इस्लामाबाद में टॉप पाकिस्तानी एक्सपोर्टर्स को संबोधित करते वक्त सामने आया.
उन्होंने कार्यक्रम में देश की अर्थव्यवस्था के कारण अपनी सरकार को जिस स्थिति में फैसले लेने पड़े, उसका जिक्र किया. शहबाज शरीफ ने कहा, "जब फील्ड मार्शल आसिम मुनीर और मैं, दुनिया भर में पैसे मांगने जाते हैं तो हमें शर्म आती है. लोन लेना हमारे आत्म-सम्मान पर बहुत बड़ा बोझ है. शर्म से हमारा सिर झुक जाता है."
प्रधानमंत्री शहबाज ने ने साफ शब्दों में माना कि जब उन्हें दूसरे देशों या अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं से लोन मांगना पड़ता है. यह सिर्फ देश की आर्थिक कमजोरी नहीं, बल्कि एक संप्रभु राष्ट्र के आत्म-सम्मान पर बोझ है. सवाल यह है कि आखिर पाकिस्तान को बार-बार कर्ज की भीख क्यों मांगनी पड़ रही है?
लोन मांगने पर क्यों झुक जाता है सिर? पीएम शहबाज का खुला बयान
प्रधानमंत्री ने अपने बयान में स्वीकार किया कि पाकिस्तान की सरकारें दशकों से कर्ज के सहारे चल रही हैं. उन्होंने कहा कि लोन मांगना किसी भी स्वाभिमानी देश के लिए अपमानजनक है. हर बार जब कर्ज के लिए हाथ फैलाना पड़ता है, तो यह राष्ट्रीय आत्म-सम्मान को ठेस पहुंचाता है.
विदेशी मुद्रा भंडार बढ़ा, लेकिन किस कीमत पर?
शहबाज शरीफ का यह बयान उस समय आई है, जब पाकिस्तान देश को स्थिर करने के लिए कड़ी नीतियां लागू करने के बाद आर्थिक विकास को समर्थन देने की योजना के लिए अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) के साथ बातचीत कर रहा है. आने वाले दिनों में विदेशी मुद्रा भंडार 20 बिलियन डॉलर तक पहुंच जाएगा.
उन्होंने कहा कि उनकी सरकार ने केंद्रीय बैंक और वित्त मंत्रालय को पूंजी तक पहुंच में सुधार करके औद्योगिक विकास का समर्थन करने का निर्देश दिया है. शरीफ ने शुक्रवार को कहा, "गवर्नर को बिजनेस लीडर्स की बात सुननी होगी और साहसिक फैसले लेने होंगे."
पाकिस्तान को हाल ही में IMF से अपने चल रहे लोन कार्यक्रम और एक अलग जलवायु-संबंधी वित्तपोषण योजना के हिस्से के रूप में $1.2 बिलियन मिले हैं. इस फंडिंग से पाकिस्तान को कर्ज चुकाने और अपने विदेशी मुद्रा भंडार को बढ़ाने में मदद मिली है.
ऐसा न किया तो आने वाली पीढ़ियां कीमत चुकाएंगी
पाकिस्तान को इस 'कर्ज के चक्र' से बाहर निकलना होगा, वरना आने वाली पीढ़ियां भी इसकी कीमत चुकाएंगी. पाक पीएम का यह बयान IMF, विश्व बैंक और मित्र देशों पर बढ़ती निर्भरता की खुली स्वीकारोक्ति माना जा रहा है.
आत्म-सम्मान बनाम आर्थिक मजबूरी कैसे?
- पाकिस्तान की आर्थिक हालत ऐसी हो चुकी है कि लोन अब विकल्प नहीं, बल्कि मजबूरी बन गया है. इसके पीछे कई कारण हैं.
- खाली होता विदेशी मुद्रा भंडार. पाकिस्तान के पास आयात का खर्च उठाने तक के पैसे नहीं हैं.
- पाकिस्तान का व्यापार घाटा लगातार बढ़ रहा है. निर्यात कमजोर है और आयात महंगा हो गया है.
- पाक में राजनीतिक अस्थिरता की वजह से बार-बार सरकारें बदलने से नीतियां टिकाऊ नहीं होती.
- जिस आतंक को पाकिस्तान ने पाला, उसे जिंदा रखने और सुरक्षा पर उसे भारी खर्च करना पड़ता है. विकास पर निवेश घटता गया.
- IMF पर निर्भरता ने पाकिस्तान को कंगाल बना दिया हे. शर्तों वाले कर्ज से आम जनता पर महंगाई की मार पड़ी है.
- देश को चलाने के लिए पाक पीएम और आर्मी चीफ मुनीर को कभी IMF, कभी चीन और कभी खाड़ी देशों के दरवाजे पर दस्तक देना पड़ता है.





