भारत के एक और पड़ोसी देश में Fuel Crisis, ऑफिस से लेकर स्कूलों तक के लिए उठाया गया ये कदम; इतना महंगा मिल रहा पेट्रोल
नेपाल में अब शनिवार और रविवार को छुट्टी रहेगी. सरकार ने पेट्रोल के 202 रुपये प्रति लीटर पहुंचने के बाद यह फैसला लिया.
नेपाल में फ्यूल क्राइसिस के बीच सरकार का बड़ा फैसला
Nepal Fuel Crisis: भारत के पड़ोसी देश नेपाल में बढ़ते ईंधन संकट के बीच सरकार ने बड़ा फैसला लिया है, अब सरकारी कार्यालयों और शैक्षणिक संस्थानों में दो दिन का वीकेंड लागू किया जाएगा. सोमवार से शनिवार और रविवार दोनों दिन छुट्टी रहेगी. यह घोषणा सरकार के प्रवक्ता और शिक्षा, विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी, युवा एवं खेल मंत्री Sasmit Pokharel ने कैबिनेट बैठक के बाद की. उन्होंने बताया कि पेट्रोलियम सप्लाई में जारी बाधाओं को देखते हुए यह फैसला लिया गया है.
सरकार के मुताबिक, ईरान और इजरायल-अमेरिका के बीच जारी जंग ने वैश्विक तेल आपूर्ति को प्रभावित किया है, जिसका असर नेपाल पर भी पड़ा है, जहां पेट्रोल की कीमत 202 नेपाली रुपये प्रति लीटर तक पहुंच गई है. ईंधन की कमी और बढ़ती कीमतों के कारण सरकार ने कार्यालयों और स्कूलों में कामकाजी दिनों को कम करने का निर्णय लिया.
नए समय के अनुसार कब खुलेंगे सरकारी कार्यालय?
- शनिवार और रविवार - छुट्टी
- सोमवार से शुक्रवार - कामकाजी दिन
- सरकारी कार्यालय समय- सुबह 9 बजे से शाम 5 बजे तक
नया नियम शैक्षणिक संस्थानों पर भी लागू होगा . हालांकि आवश्यक सेवाओं पर इसका असर नहीं पड़ेगा.
पेट्रोल-डीजल गाड़ियों को इलेक्ट्रिक में बदलने की तैयारी
कैबिनेट बैठक में एक और बड़ा फैसला लिया गया. सरकार पेट्रोल और डीजल से चलने वाले वाहनों को इलेक्ट्रिक वाहनों में बदलने के लिए कानूनी ढांचा तैयार करेगी. इसका उद्देश्य ईंधन पर निर्भरता कम करना और भविष्य में संकट से बचना है.
बढ़ती कीमतों से आम लोग परेशान
नेपाल में पेट्रोल की कीमत 202 रुपये प्रति लीटर पहुंचने के बाद आम लोगों पर आर्थिक दबाव बढ़ गया है. ईंधन की कमी के कारण परिवहन, स्कूल और सरकारी सेवाओं पर भी असर पड़ रहा है.
दुनिया में क्यों छाया पेट्रोल डीजल और गैस का संकट?
- मध्य पूर्व (Middle East) में तनाव: ईरान, इजरायल और पड़ोसी देशों के बीच बढ़ते तनाव ने तेल की सप्लाई चेन को बुरी तरह प्रभावित किया है. हॉर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz), जहां से दुनिया का लगभग 20% कच्चा तेल गुजरता है, वहां असुरक्षा के कारण शिपिंग कंपनियों ने अपने मार्ग बदल दिए हैं, जिससे लागत और समय दोनों बढ़ गए हैं.
- रूस-यूक्रेन युद्ध का लंबा खींचना: रूस पर लगे कड़े प्रतिबंधों और यूक्रेन द्वारा रूसी तेल रिफाइनरियों पर किए गए ड्रोन हमलों ने वैश्विक बाजार में डीजल की भारी कमी पैदा कर दी है. यूरोप अब भी रूसी गैस के विकल्पों की तलाश में संघर्ष कर रहा है, जिससे प्राकृतिक गैस (LNG) की कीमतें आसमान छू रही हैं.
- OPEC+ द्वारा उत्पादन में कटौती: सऊदी अरब और रूस के नेतृत्व वाले OPEC+ देशों ने कच्चे तेल की कीमतों को ऊंचा बनाए रखने के लिए उत्पादन में लगातार कटौती जारी रखी है. मांग के मुकाबले सप्लाई कम होने से अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल (Brent Crude) की कीमतें $100 प्रति बैरल के करीब पहुंच गई हैं.
- रिफाइनिंग क्षमता में कमी: दुनिया भर में पुरानी रिफाइनरियां बंद हो रही हैं और नई रिफाइनरियों के निर्माण में निवेश कम हुआ है (ग्रीन एनर्जी की ओर झुकाव के कारण). इस वजह से कच्चे तेल से पेट्रोल और डीजल बनाने की क्षमता मांग के अनुरूप नहीं बढ़ पा रही है.
- डॉलर की मजबूती और मुद्रास्फीति: अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल का व्यापार डॉलर में होता है. डॉलर के मजबूत होने से भारत जैसे देशों के लिए तेल आयात करना और भी महंगा हो गया है, जिसका सीधा असर आम जनता की जेब पर पेट्रोल-डीजल की बढ़ी हुई कीमतों के रूप में पड़ रहा है.
- जलवायु परिवर्तन और पॉलिसी परिवर्तन: कई विकसित देश 'नेट जीरो' लक्ष्य की ओर बढ़ रहे हैं, जिससे जीवाश्म ईंधन (Fossil Fuels) के नए प्रोजेक्ट्स में फंडिंग कम हो गई है. यह ट्रांजिशन फेज ऊर्जा की कमी और कीमतों में अस्थिरता पैदा कर रहा है.




