Explainer: नेपाल की तबाही के बीच फिर क्यों याद आया 51 साल पुराना चीन का बानकियाओ डैम हादसा? एक रात में टूटे थे दर्जनों बांध
नेपाल में भीषण बाढ़ और ग्लेशियर से जुड़े हादसे के बाद हालात इतने गंभीर हो गए हैं कि काठमांडू ने विदेशी विशेषज्ञों से मदद लेने पर सहमति जताई है. इसी बीच 1975 के चीन के बानकियाओ डैम हादसे की चर्चा फिर तेज हो गई है, जिसमें दर्जनों बांध टूटे और हजारों से लेकर लाखों तक मौतों के अलग-अलग दावे सामने आए.
China’s 1975 Banqiao Dam Disaster
China’s 1975 Banqiao Dam Disaster: नेपाल में आई विनाशकारी बाढ़ के बीच अब राहत और बचाव अभियान में विदेशी मदद का रास्ता भी खुल गया है. शुरुआत में नेपाल ने भारत, चीन और दूसरे देशों की विशेषज्ञ सर्च एंड रेस्क्यू टीमों को अपने यहां आने की अनुमति नहीं दी थी, लेकिन हालात बिगड़ने और बड़ी संख्या में विदेशी नागरिकों के लापता होने के बाद काठमांडू ने अपना रुख बदल दिया है. अब नेपाल सीमित संख्या में विदेशी विशेषज्ञों को उन इलाकों में काम करने की अनुमति दे रहा है, जहां स्थानीय स्तर पर विशेष तकनीकी मदद की जरूरत है।
भारत ने नेपाल की जरूरत के मुताबिक टनल रेस्क्यू टीम भेजने की तैयारी शुरू कर दी है. इससे पहले स्थिति का जायजा लेने के लिए एक रिकॉनिसेंस यानी रेकी टीम भेजी जा रही है, जो मौके पर जाकर बताएगी कि किस तरह के उपकरण और विशेषज्ञता की जरूरत है. भारत ने मेडिकल टीम भी भेजी है और बेली ब्रिज उपलब्ध कराने की पेशकश की है, ताकि बाढ़ से टूटे संपर्क मार्गों को जल्द बहाल किया जा सके.
नेपाल ने विदेशी मदद लेने का फैसला क्यों बदला?
- दरअसल, नेपाल सरकार पर अंतरराष्ट्रीय स्तर से लगातार दबाव बढ़ रहा था. बाढ़ से प्रभावित इलाकों में कई देशों के नागरिक लापता हैं. इन देशों की सरकारें चाहती थीं कि उनके विशेषज्ञों को नेपाल में जाकर अपने नागरिकों की तलाश करने और राहत-बचाव अभियान में मदद करने की अनुमति दी जाए.
- नेपाल सरकार के एक वरिष्ठ अधिकारी के मुताबिक, अंतरराष्ट्रीय समुदाय की ओर से काफी दबाव आया था कि कम से कम सर्च एंड रेस्क्यू टीमों और विशेषज्ञों को आने की अनुमति दी जाए. इसके बाद नेपाल ने कुछ विशेष क्षेत्रों में सीमित संख्या में विशेषज्ञों को प्रवेश देने का फैसला किया.
- इस फैसले की एक बड़ी वजह यह भी है कि बाढ़ के बाद कई लोग हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट्स की सुरंगों में फंसे होने की आशंका है. खासकर रासुवा और नुवाकोट के इलाकों में सुरंगों के भीतर फंसे लोगों तक पहुंचना बेहद मुश्किल है. ऐसे ऑपरेशन के लिए सामान्य राहतकर्मियों के बजाय विशेष टनल-रेस्क्यू विशेषज्ञों और उपकरणों की जरूरत पड़ती है.
- नेपाल के पास डीएनए टेस्टिंग और फॉरेंसिक पहचान की क्षमता भी सीमित है. इसलिए विदेशी विशेषज्ञों की मदद से मृतकों की पहचान करने और उनके शव जल्द से जल्द परिवारों को सौंपने की कोशिश की जा रही है.
भारत ने क्या मदद भेजी?
भारत ने नेपाल के लिए राहत सामग्री की तीसरी खेप भी भेजी है. इस 10 टन की खेप में पोर्टेबल जनरेटर, डिग्निटी किट, खाने के पैकेट और पानी साफ करने वाली गोलियां शामिल हैं. इसी विमान से 11 सदस्यीय मेडिकल टीम भी नेपाल पहुंची है. इसमें डॉक्टर, पैरामेडिक्स और टनल रेस्क्यू से जुड़े विशेषज्ञ शामिल हैं. भारत की ओर से बेली ब्रिज देने की भी पेशकश की गई है. एक बेली ब्रिज पहले से ही नेपाल में मौजूद है, जिसे राहत और कनेक्टिविटी बहाल करने के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है.
26 अगस्त से अब तक भारत नेपाल को कुल 57.5 टन राहत सामग्री भेज चुका है. इसमें अस्थायी आश्रय, कंबल, हाइजीन किट, सोलर लैंप, दवाइयां, पानी निकालने वाले पंप, जनरेटर, किचन सेट और खाद्य सामग्री जैसी चीजें शामिल हैं.
नेपाल की बाढ़ ने क्यों बढ़ाई चिंता?
- नेपाल और तिब्बत सीमा के आसपास आई फ्लैश फ्लड ने भारी तबाही मचाई है. शुरुआती आकलनों के मुताबिक, यह आपदा सीमा के पास ग्लेशियर से जुड़े एक आइस-रॉक एवलांच और ग्लेशियल कोलैप्स के बाद आई तेज पानी की लहर से जुड़ी है.
- पानी के साथ भारी मात्रा में चट्टानें, मलबा और कीचड़ नीचे की ओर आया. इसकी चपेट में घर, गाड़ियां, सड़कें, पुल, बाजार, खेत और सरकारी इमारतें तक आ गईं.
- रासुवा और नुवाकोट के कई इलाके बुरी तरह प्रभावित हुए. तिमुरे और रसुवागढ़ी जैसे क्षेत्र भी इस आपदा की चपेट में आए। कई दूरदराज के गांवों का संपर्क पूरी तरह टूट गया.
- रिपोर्टों में नेपाल और तिब्बत को मिलाकर बड़ी संख्या में लोगों के लापता होने की बात सामने आई है. नेपाल की ओर से 910 और तिब्बत की ओर से 558 लोगों के लापता होने की जानकारी दी गई थी, यानी दोनों तरफ कुल संख्या करीब 1,468 तक पहुंचती है. इनमें बड़ी संख्या विदेशी नागरिकों की भी बताई गई.
एक और खतरा: बाढ़ के बाद बनी झील
- रेस्क्यू ऑपरेशन के बीच एक नया खतरा सामने आया है. नेपाल-तिब्बत सीमा के पास ग्लेशियर से गिरे मलबे के कारण एक बैरियर लेक यानी प्राकृतिक रूप से बनी झील अस्तित्व में आ गई. इसमें बड़ी मात्रा में पानी जमा हो गया था.
- शुक्रवार को इस झील से पानी बाहर निकलने यानी ओवरफ्लो होने की खबर सामने आई. चीनी सरकारी मीडिया ने भी इसकी पुष्टि की. यह खतरा इसलिए गंभीर था क्योंकि अगर झील का प्राकृतिक बांध अचानक टूटता, तो नीचे की ओर एक और विनाशकारी बाढ़ आ सकती थी.
- यह झील ग्यिरोंग पोर्ट से करीब 10 किलोमीटर दूर बताई गई. इसमें 20 लाख क्यूबिक मीटर से ज्यादा पानी जमा होने की जानकारी सामने आई.
- खतरे को देखते हुए कुछ समय के लिए इलाके में बचाव अभियान रोकना पड़ा. बाद में जब स्थिति को नियंत्रित स्तर पर माना गया, तो रेस्क्यू ऑपरेशन दोबारा शुरू किया गया.
- नेपाल ने भोतेकोशी और त्रिशूली नदियों के किनारे बसे इलाकों के लिए भी चेतावनी जारी की. लोगों और राहतकर्मियों से कहा गया कि अगर पानी का स्तर और बढ़ता है तो तुरंत सुरक्षित स्थानों की ओर चले जाएं.
- आपदा के बाद सैटेलाइट तस्वीरों में ग्लेशियर से जुड़े इलाके में दो झीलों की पहचान की गई. अधिकारियों की चिंता यह है कि जब तक इन दोनों झीलों का पानी पूरी तरह कम नहीं होता, तब तक बाढ़ का खतरा बना रह सकता है.
- नेपाल सीमित सैटेलाइट इमेज उपलब्ध होने के बावजूद लगातार स्थिति पर नजर रख रहा है. इसके अलावा नीचे की ओर कैमरे और सेंसर लगाने की योजना भी बनाई जा रही है, खासकर तिमुरे जैसे इलाकों में.
- त्रिशूली और देवघाट हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट्स सहित कई पावर इंफ्रास्ट्रक्चर भी प्रभावित हुए हैं. त्रिशूली-I प्रोजेक्ट के इलाके में नेपाल की सेना ने सुरंग के भीतर फंसे करीब 350 कर्मचारियों और मजदूरों को बचाया. हालांकि, रिपोर्टों के मुताबिक 100 से ज्यादा लोगों के अब भी फंसे होने की आशंका बनी हुई है.
- नेपाल के डिजास्टर मैनेजमेंट से जुड़े अधिकारियों के मुताबिक, करीब 800 लोगों को हेलीकॉप्टर से और लगभग 700 लोगों को जमीन के रास्ते सुरक्षित निकाला गया.
- प्रभावित लोगों तक हेलीकॉप्टर से राहत सामग्री पहुंचाने का काम भी जारी है.
भारतीय नागरिकों के लिए भी बड़ा रेस्क्यू ऑपरेशन
इस आपदा के बीच भारत सरकार भी लगातार अपने नागरिकों की स्थिति पर नजर रख रही है. विदेश मंत्रालय के मुताबिक, कम से कम 21 भारतीय नागरिकों को सुरक्षित निकालकर दिल्ली वापस लाया गया है. वहीं करीब 320 भारतीय नागरिक और भारतीय मूल के लगभग 100 लोग अब भी संपर्क से बाहर बताए गए हैं. चीन की तरफ फंसे करीब 400 भारतीय नागरिकों के सुरक्षित होने की जानकारी दी गई है. वहीं 93 भारतीय नागरिक तिब्बत से नेपाल की ओर पहुंच चुके हैं.
आंध्र प्रदेश के 28 तीर्थयात्री भी इस संकट के बीच सुरक्षित बताए गए. ये लोग 21 अगस्त को कैलाश मानसरोवर यात्रा के लिए नेपाल पहुंचे थे। बाढ़ प्रभावित इलाके के पास उन्होंने मुश्किल हालात में रास्ता पार किया, लेकिन सभी सुरक्षित रहे. इन तीर्थयात्रियों के शुक्रवार को नेपाल से दिल्ली लौटने और फिर अलग-अलग उड़ानों से विशाखापत्तनम, हैदराबाद और आंध्र प्रदेश के दूसरे शहरों में जाने की उम्मीद थी।
लेकिन नेपाल की इस त्रासदी ने चीन के 1975 के बानकियाओ डैम हादसे की याद क्यों दिला दी?
नेपाल में इस समय जिस तरह ग्लेशियर, प्राकृतिक जल अवरोध, अचानक बढ़ता पानी और बाढ़ का खतरा सामने आया है, उसने दुनिया को करीब 51 साल पुराने चीन के एक बेहद विनाशकारी हादसे की याद दिला दी है.
साल था 1975... चीन के हेनान प्रांत में बानकियाओ डैम को उस दौर में लगभग अटूट माना जाता था. इसे चीन की उस महत्वाकांक्षी योजना का हिस्सा बनाया गया था, जिसके तहत नदियों को नियंत्रित करने, बाढ़ रोकने, सिंचाई और बिजली उत्पादन के लिए बड़े पैमाने पर बांध और जलाशय बनाए जा रहे थे.
लेकिन 8 अगस्त 1975 की आधी रात के बाद जो हुआ, उसने चीन के इतिहास की सबसे भयावह प्राकृतिक-तकनीकी आपदाओं में से एक को जन्म दिया. बानकियाओ डैम टूट गया... इसके बाद पानी की ऐसी दीवार निकली, जिसने देखते ही देखते नीचे के गांवों और इलाकों को अपनी चपेट में ले लिया.
'आयरन डैम' को माना जाता था लगभग अटूट
बानकियाओ डैम का निर्माण 1951-52 के दौरान हेनान प्रांत की रू नदी पर किया गया था. इसका उद्देश्य बाढ़ नियंत्रण, सिंचाई और बिजली उत्पादन था. चीन में कम्युनिस्ट शासन की शुरुआती वर्षों में नदियों और पानी पर नियंत्रण स्थापित करना सरकार की बड़ी प्राथमिकताओं में शामिल था. माओ जेदोंग के दौर में यह अभियान और तेज हुआ.
बानकियाओ की संरचना में कुछ वर्षों बाद दरारों और गेट से जुड़ी समस्याएं सामने आईं. 1955-56 में सोवियत इंजीनियरों की सलाह से इसकी मरम्मत और मजबूती की गई. इसके बाद इसे इतना मजबूत माना जाने लगा कि इसे 'आयरन डैम' यानी लोहे जैसा मजबूत बांध कहा जाता था... लेकिन अगस्त 1975 में यही बांध एक बेहद बड़े जलप्रलय के सामने टिक नहीं पाया.
असली वजह बना टाइफून नीना
इस हादसे के पीछे सिर्फ बांध की कमजोरी नहीं थी... सबसे बड़ा प्राकृतिक ट्रिगर था टाइफून नीना... यह तूफान जुलाई 1975 के आखिर में फिलीपीन सागर के ऊपर बना था। इसके बाद यह ताइवान से होते हुए चीन के फुजियान प्रांत तक पहुंचा.
जमीन के अंदर आते ही तूफान कमजोर हुआ, लेकिन उसकी नमी मध्य चीन के ऊपर फंस गई. मौसम की दूसरी प्रणालियों के साथ मिलकर इसने हेनान में बेहद भारी बारिश करा दी. इतनी बारिश हुई कि कुछ इलाकों में तीन दिनों के भीतर एक साल से भी ज्यादा की सामान्य बारिश हो गई.
2017 में प्रकाशित Journal of Hydrometeorology के एक अध्ययन के मुताबिक, तूफान के केंद्र के पास एक दिन में 1,000 मिलीमीटर से ज्यादा बारिश दर्ज की गई. लिनझुआंग में 5 से 7 अगस्त के बीच तीन दिनों में 1,605 मिलीमीटर बारिश हुई.
बानकियाओ डैम के आसपास तीन दिनों में करीब 1,422 मिलीमीटर बारिश दर्ज की गई, जिसमें अकेले 7 अगस्त को 784 मिलीमीटर पानी गिरा. लिनझुआंग में सिर्फ छह घंटे के भीतर 830 मिलीमीटर बारिश दर्ज की गई थी.
बांध में पानी आने की रफ्तार बेहद खतरनाक थी
इतनी बारिश के कारण बानकियाओ जलाशय में पानी आने की रफ्तार बहुत ज्यादा हो गई. Princeton और Tsinghua विश्वविद्यालयों के शोधकर्ताओं से जुड़े अध्ययन के मुताबिक, पानी जलाशय में करीब 13,000 क्यूबिक मीटर प्रति सेकंड की अधिकतम दर से पहुंच रहा था. इसके मुकाबले बांध की स्पिलवे क्षमता लगभग 1,700 क्यूबिक मीटर प्रति सेकंड बताई गई.
यानी जलाशय में पानी जिस रफ्तार से भर रहा था, उसकी तुलना में उसे बाहर निकालने की क्षमता कई गुना कम थी. यही अंतर धीरे-धीरे उस आपदा की तरफ ले गया, जिसने पूरे इलाके को हिला दिया.
चेतावनी थी, लेकिन फैसला लेने में देरी हुई
इस हादसे में सिर्फ बारिश जिम्मेदार नहीं थी. विशेषज्ञों ने बाद में खराब योजना, कमजोर चेतावनी व्यवस्था, संचार व्यवस्था की विफलता और अधिकारियों की निर्णय लेने में देरी को भी बड़ी वजह माना. उस समय बांध के गेट खोलने को लेकर भी स्पष्ट आदेश नहीं था. एक तकनीशियन हु डेफेंग ने बाद में बताया कि नियमों के मुताबिक पानी छोड़ा जाना चाहिए था, लेकिन ऊपर से स्पष्ट निर्देश नहीं मिल रहे थे.
समस्या यह भी थी कि उस समय टेलीफोन और रेडियो संपर्क लगातार बाधित हो रहे थे. कई संदेश लोगों के जरिए पहुंचाने पड़ रहे थे, लेकिन तेज बारिश और बाढ़ के कारण संदेश पहुंचाने वाले लोग भी खतरे में थे. कुछ जगह सिग्नल फ्लेयर्स को भी सही तरीके से नहीं समझा गया. यानी खतरे की जानकारी होने के बावजूद उसे बड़े पैमाने पर लोगों तक समय रहते पहुंचाना संभव नहीं हो पाया.
आधी रात को टूटा बानकियाओ
- 7 अगस्त की रात तक पानी बानकियाओ की सुरक्षा दीवार तक पहुंच चुका था. आधी रात के बाद पानी ऊपर से बहने लगा और बांध की संरचना टूट गई.
- प्रत्यक्षदर्शी चेन बिन ने उस पल को याद करते हुए बताया था कि ऐसा लगा जैसे आसमान और धरती दोनों टूट रहे हों.
- बांध टूटने के बाद करीब 70.1 करोड़ क्यूबिक मीटर पानी छह घंटे के भीतर बाहर निकल गया. बाढ़ की चौड़ाई कई जगह 10 से 15 किलोमीटर तक बताई गई और पानी बेहद तेज गति से नीचे की ओर बढ़ा.
- इससे कुछ ही दूरी पर स्थित शिमांतान डैम भी टूट गया. इसके बाद एक के बाद एक कई जलाशयों के फेल होने की स्थिति बनी. इसी वजह से यह हादसा केवल एक बांध टूटने तक सीमित नहीं रहा.
एक रात में दर्जनों बांधों के टूटने की कहानी
इस आपदा में कितने बांध या जलाशय टूटे, इसको लेकर स्रोतों में कुछ अंतर मिलता है. सबसे ज्यादा उद्धृत आंकड़ा 62 का है. कई स्रोत बानकियाओ और शिमांतान सहित कुल 62 बांधों के फेल होने की बात करते हैं. वहीं कुछ अध्ययनों में दो बड़े बांधों के साथ 62 छोटे जलाशयों के टूटने का उल्लेख मिलता है.
कुछ बांधों को बाढ़ का दबाव दूसरी जगह कम करने और अन्य जलाशयों को बचाने के लिए जानबूझकर भी खोला या तोड़ा गया था. इस वजह से अलग-अलग रिकॉर्ड में संख्या को लेकर अंतर दिखाई देता है. लेकिन एक बात स्पष्ट है-एक बेहद बड़े क्षेत्र में बांधों और जलाशयों की श्रृंखलाबद्ध विफलता ने तबाही को कई गुना बढ़ा दिया था.
बाढ़ के बाद शुरू हुआ दूसरा संकट- भूख और बीमारी
पहली बाढ़ के बाद भी मुश्किल खत्म नहीं हुई थी. रेलवे लाइनें टूट गईं. सड़कें बह गईं. संचार व्यवस्था ठप हो गई। लाखों लोग पानी से घिरे रह गए. कई इलाकों में राहत पहुंचने में कई दिन लग गए. रिपोर्टों के मुताबिक, 13 अगस्त तक करीब 20 लाख लोग अभी भी बाढ़ के बीच फंसे हुए थे. कई जगह लोगों के पास खाने के लिए बहुत कम सामान बचा था. कुछ लोगों ने पत्तियां और कीड़े तक खाने की कोशिश की.
गंदा पानी, तेज गर्मी, मरे हुए लोगों के शव और स्वास्थ्य सेवाओं की कमी के कारण बीमारियां तेजी से फैलने लगीं. इस तरह शुरुआती बाढ़ से बचने वाले कई लोगों की बाद में भूख और बीमारी के कारण मौत हुई. इसी वजह से बानकियाओ हादसे की कुल मौतों का आंकड़ा आज भी विवादित है.
कितने लोगों की मौत हुई थी?
- बानकियाओ हादसे में मौतों को लेकर अलग-अलग स्रोत अलग-अलग आंकड़े देते हैं. 2017 के Princeton-Tsinghua अध्ययन के मुताबिक, सीधे बाढ़ के कारण करीब 26,000 लोगों की मौत हुई थी. इसके बाद भूख और बीमारी से लगभग एक लाख अतिरिक्त मौतों का अनुमान लगाया गया.
- वहीं, 1995 में Human Rights Watch की रिपोर्ट में आठ चीनी विशेषज्ञों द्वारा दिए गए करीब 2.3 लाख मौतों के अनुमान का उल्लेख किया गया था.
- कुछ अन्य आकलनों में मौतों की संख्या 30,000 से 40,000 के बीच बताई गई, जबकि शुरुआती स्थानीय पार्टी रिकॉर्ड में करीब 85,600 मौतों का आंकड़ा सामने आया था. इसलिए 2.3 लाख का आंकड़ा निर्विवाद आधिकारिक आंकड़ा नहीं है.
- बानकियाओ हादसे में वास्तविक मौतों की संख्या आज भी ऐतिहासिक विवाद का विषय है, लेकिन चाहे कोई भी आंकड़ा माना जाए, यह स्पष्ट है कि यह दुनिया की सबसे गंभीर बांध और बाढ़ आपदाओं में से एक थी.
करीब एक करोड़ लोग प्रभावित हुए
इस आपदा ने सिर्फ जानें नहीं लीं, बल्कि करोड़ों लोगों के जीवन को प्रभावित किया. करीब एक करोड़ लोग प्रभावित या बेघर हुए बताए जाते हैं. गांव, कस्बे, सड़कें, रेलवे लाइनें और खेती की जमीन पानी में डूब गईं. कई इलाकों में लोग कई दिनों तक चारों तरफ पानी के बीच फंसे रहे.
राहत और मेडिकल टीमें पहुंचीं, लेकिन कई जगह उनके पास भी पर्याप्त दवाइयां और संसाधन नहीं थे.
चीन में इस हादसे की खबर दुनिया तक इतनी देर से क्यों पहुंची?
- बानकियाओ हादसे का एक और विवादित पहलू केवल बांध का टूटना नहीं, बल्कि इसके बाद की सूचना व्यवस्था थी.
- 1975 में चीन सांस्कृतिक क्रांति के अंतिम दौर से गुजर रहा था. मीडिया और सार्वजनिक सूचना पर सरकार का कड़ा नियंत्रण था. बांध टूटने और बड़े पैमाने पर हुई मौतों की खबर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर तुरंत सामने नहीं आई.
- बाद के वर्षों में सामने आए विवरणों में कहा गया कि उस समय मीडिया में राहत कार्यों से जुड़ी खबरें तो दिखाई गईं, लेकिन बांधों की विफलता और उसके वास्तविक मानवीय नुकसान की पूरी तस्वीर सामने नहीं आई.
- एक पूर्व अधिकारी चेन झिकाई ने बाद में बताया कि उस व्यवस्था में बुरी खबरों को सार्वजनिक न करना आम बात थी.
- Human Rights Watch की 1995 की रिपोर्ट ने भी इस आपदा को लंबे समय तक व्यापक रूप से रिपोर्ट न किए जाने का उल्लेख किया. कई विवरणों के मुताबिक, हादसे की पूरी भयावहता दुनिया के सामने काफी वर्षों बाद आई.
- यही कारण है कि बानकियाओ आज केवल एक इंजीनियरिंग फेलियर की कहानी नहीं है. यह आपदा प्रबंधन में पारदर्शिता और समय पर चेतावनी की जरूरत का भी उदाहरण बन चुकी है.
बानकियाओ से नेपाल तक क्या सबक निकलता है?
- नेपाल में हुई मौजूदा आपदा का कारण बानकियाओ से बिल्कुल अलग है. बानकियाओ में एक अत्यधिक बारिश और बांध प्रणाली की विफलता ने तबाही मचाई थी, जबकि नेपाल में शुरुआती वैज्ञानिक आकलन ग्लेशियल कोलैप्स और आइस-रॉक एवलांच से पैदा हुए अचानक जलप्रवाह की ओर इशारा करते हैं.
- फिर भी दोनों घटनाओं में एक महत्वपूर्ण समानता है- पानी से जुड़ी आपदा में शुरुआती चेतावनी, सही जानकारी, वैज्ञानिक निगरानी और तेज रेस्क्यू कितना जरूरी है.
- हिमालयी क्षेत्र में ग्लेशियर तेजी से बदल रहे हैं. ग्लेशियल झीलें बन सकती हैं, प्राकृतिक बांध टूट सकते हैं और अचानक पानी का विशाल प्रवाह नीचे की बस्तियों को प्रभावित कर सकता है. इसीलिए सैटेलाइट निगरानी, सेंसर, कैमरे, शुरुआती चेतावनी सिस्टम और सीमापार सूचना साझा करना बेहद महत्वपूर्ण हो जाता है.
- नेपाल की मौजूदा त्रासदी में भी यही चुनौती सामने आई है. एक तरफ बचाव दल मलबे और सुरंगों में फंसे लोगों को खोज रहे हैं, तो दूसरी तरफ नई बनी झील और बढ़ते पानी का खतरा रेस्क्यू ऑपरेशन को मुश्किल बना रहा है.
चीन के बड़े बांधों को लेकर भी उठते रहे हैं सवाल
- बानकियाओ की याद इसलिए भी चर्चा में आती है क्योंकि चीन के बड़े बांधों और जल परियोजनाओं को लेकर लंबे समय से पर्यावरणीय जोखिम, भूकंपीय क्षेत्र और सूचना पारदर्शिता जैसे सवाल उठते रहे हैं. विशेष रूप से थ्री गॉर्जेस डैम को लेकर भी अलग-अलग विशेषज्ञों ने समय-समय पर सुरक्षा और पर्यावरण से जुड़े सवाल उठाए हैं.
- नेपाल की ताजा आपदा के बाद भारत में भी कुछ विशेषज्ञों ने तिब्बत के मेडोग इलाके में बन रहे विशाल हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट को लेकर चिंता जताई है. यह इलाका भूकंपीय रूप से संवेदनशील क्षेत्र में आता है और भारत के अरुणाचल प्रदेश के करीब है.
- हालांकि, मौजूदा नेपाल बाढ़ को चीन की किसी परियोजना से जोड़ने के लिए अभी ठोस और निर्णायक वैज्ञानिक प्रमाण सामने आना जरूरी है. मौजूदा उपलब्ध आकलन ग्लेशियल या आइस-रॉक घटना को प्रमुख ट्रिगर मानते हैं.
असली सवाल सिर्फ बांध या ग्लेशियर का नहीं
नेपाल की मौजूदा आपदा और 1975 के बानकियाओ हादसे को साथ देखने पर सबसे बड़ा सवाल यह सामने आता है कि
- जब किसी क्षेत्र में पानी, ग्लेशियर, बांध या प्राकृतिक जल अवरोध से जुड़ा बड़ा खतरा पैदा हो तो सरकारें कितनी जल्दी लोगों को चेतावनी देती हैं?
- क्या नीचे रहने वाले लोगों को समय रहते खतरे की जानकारी मिलती है?
- क्या पड़ोसी देशों के साथ रियल-टाइम डेटा साझा किया जाता है?
- क्या सैटेलाइट, सेंसर और शुरुआती चेतावनी सिस्टम पर्याप्त हैं?
- और सबसे महत्वपूर्ण- क्या किसी आपदा से जुड़ी जरूरी जानकारी लोगों और दूसरे देशों से पूरी पारदर्शिता के साथ साझा की जाती है?
बानकियाओ हादसे ने दिखाया कि एक प्राकृतिक आपदा अपने आप में जितनी खतरनाक होती है, खराब प्लानिंग, कमजोर चेतावनी व्यवस्था, संचार की विफलता और सूचना छिपाने से उसका नुकसान कई गुना बढ़ सकता है.
नेपाल की मौजूदा त्रासदी एक बार फिर यही याद दिला रही है कि हिमालय जैसे संवेदनशील क्षेत्र में आपदा को रोकना हमेशा संभव नहीं होता, लेकिन उसकी कीमत कम करने के लिए समय पर चेतावनी, वैज्ञानिक निगरानी, अंतरराष्ट्रीय सहयोग और तेज बचाव व्यवस्था बेहद जरूरी है.
और शायद यही बानकियाओ की सबसे बड़ी सीख है- प्रकृति कब अपना रुख बदलेगी, यह हमेशा हमारे हाथ में नहीं होता; लेकिन खतरे की जानकारी मिलने के बाद हम कितनी तेजी और पारदर्शिता से कार्रवाई करते हैं, यह हमारे हाथ में जरूर है.




