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Muslim World League क्या, कट्टरपंथ से दूरी या इमेज मेकओवर? क्यों भाईचारे की कर रहा बात

1962 में बनी सऊदी अरब की मुस्लिम वर्ल्ड लीग अब अमन और भाईचारे की बात कर रही है. क्या ये कट्टरपंथ से दूरी है या सिर्फ इमेज मेकओवर की रणनीति है?

Muslim World League क्या, कट्टरपंथ से दूरी या इमेज मेकओवर? क्यों भाईचारे की कर रहा बात
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( Image Source:  Credit : Meta AI )

इस्लाम पर बहस अब केवल धार्मिक दायरे तक सीमित नहीं है. एक तरफ कुछ ex-Muslims इस्लाम की धार्मिक मान्यताओं और मुस्लिम समाजों की सामाजिक-राजनीतिक प्रथाओं पर सार्वजनिक सवाल उठाते हैं, तो दूसरी तरफ मुस्लिम समुदायों के खिलाफ पूर्वाग्रह और Islamophobia को लेकर भी दुनिया भर में बहस चलती रहती है. इसी विरोधाभासी माहौल में मक्का स्थित Muslim World League (MWL) दुनिया से भाईचारे, धार्मिक सह-अस्तित्व और संवाद की अपील कर रही है.

दरअसल, Muslim World League संगठन हिंसा, चरमपंथ और धार्मिक नफरत के विरोध को अपनी सामुदायिक भूमिका का हिस्सा बताता है. सवाल यह है कि क्या यह केवल धार्मिक संवाद की पहल है या इस्लाम की वैश्विक छवि को लेकर मुस्लिम नेतृत्व की बदलती रणनीति भी है?

MWL दुनिया से भाईचारे की अपील क्यों कर रही है?

Muslim World League यानी MWL, जिसे अरबी में राबिता अल-आलम अल-इस्लामी कहा जाता है, मक्का स्थित अंतरराष्ट्रीय इस्लामी संगठन है. इसकी स्थापना 1962 में हुई थी. संगठन के घोषित उद्देश्यों में इस्लाम की सही छवि को सामने रखना, मुस्लिम समाजों के बीच एकता बढ़ाना और दुनिया के लोगों के बीच दोस्ती तथा सहयोग को प्रोत्साहित करना शामिल है.

हाल के वर्षों में MWL की सार्वजनिक गतिविधियों में अंतरधार्मिक संवाद, धार्मिक सह-अस्तित्व, हिंसा और चरमपंथ का विरोध प्रमुख विषय बन गए हैं. संगठन का संदेश केवल मुसलमानों की आपसी एकता तक सीमित नहीं है. वह ईसाई, यहूदी और दूसरे धार्मिक समुदायों के नेताओं के साथ संवाद और साझा कार्यक्रमों को भी आगे बढ़ा रहा है.

इसका एक महत्वपूर्ण उदाहरण 2019 का मक्का चार्टर है. इसमें अलग-अलग मुस्लिम धाराओं के विद्वानों की भागीदारी हुई थी. चार्टर में धार्मिक और सांस्कृतिक बहुलता, मानव गरिमा, सहयोग, हिंसा, आतंकवाद और चरमपंथ के विरोध तथा अलग-अलग समुदायों के शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व पर जोर दिया गया था.

क्या MWL इस्लाम की ग्लोबल इमेज मेकओवर कर रही है?

MWL की अपनी भाषा से संकेत मिलता है कि इस्लाम की वैश्विक छवि उसके लिए महत्वपूर्ण विषय है. संगठन इस्लाम को हिंसा और चरमपंथ से जोड़कर देखने वाली धारणाओं का विरोध करता है और शांति, सह-अस्तित्व तथा संवाद पर आधारित इस्लाम की व्याख्या को सामने रखता है.

इसका कारण आतंकवादी और चरमपंथी संगठनों की गतिविधियां लगातार होना भी माना जा रहा है, जिन्होंने इस्लाम के नाम का इस्तेमाल करते हुए हिंसा की है. ऐसी घटनाओं के बाद इस्लाम और आतंकवाद को जोड़कर देखने वाली धारणाएं कई समाजों में मजबूत हुईं. MWL का संदेश उसी धारणा को चुनौती देने की कोशिश करता दिखाई देता है.

इस विषय को लेकर नवंबर 2023 में MWL ने जेद्दा में मीडिया की भूमिका पर अंतरराष्ट्रीय फोरम आयोजित किया था. इसमें नफरत फैलाने वाली भाषा, गलत सूचना, पूर्वाग्रह और हिंसा को बढ़ावा देने वाले मीडिया नैरेटिव पर चर्चा हुई थी. यानी संगठन अब केवल धार्मिक मंचों पर नहीं, बल्कि मीडिया और सार्वजनिक विमर्श के स्तर पर भी इस मुद्दे को उठा रहा है.

क्या मुसलमानों ने खुद अपनी गलत छवि बनाई है?

पूरे मुस्लिम समुदाय के बारे में इसका जवाब केवल हां या नहीं में देना उचित नहीं होगा. दुनिया भर में लगभग दो अरब मुसलमान अलग-अलग देशों, भाषाओं, राजनीतिक व्यवस्थाओं और सामाजिक परिस्थितियों में रहते हैं. किसी आतंकवादी संगठन, कट्टरपंथी समूह या किसी सरकार के फैसलों को सभी मुसलमानों की सामूहिक पहचान मानना फैक्ट के आधार पर सही नहीं होगा.

ऐसा इसलिए कि इसका दूसरा पहलू भी है. इस्लाम के नाम पर आतंकवादी हिंसा, कट्टरपंथ और कुछ राजनीतिक संघर्षों ने इस्लाम की सार्वजनिक छवि को प्रभावित किया है. इसलिए मुस्लिम धार्मिक संगठनों के सामने यह चुनौती भी रही है कि वे हिंसा और चरमपंथ को इस्लाम की धार्मिक पहचान से अलग कैसे की स्थिति को साफ करे.

यहीं पर आलोचना और पूर्वाग्रह के बीच फर्क करना जरूरी हो जाता है. किसी व्यक्ति का इस्लाम की धार्मिक मान्यताओं, कानूनों या सामाजिक प्रथाओं पर सवाल उठाना अपने आप Islamophobia नहीं है. इसी तरह किसी मुस्लिम व्यक्ति या समुदाय के खिलाफ उसकी धार्मिक पहचान के आधार पर सामूहिक नफरत या भेदभाव को केवल “धर्म की आलोचना” कह देना भी सही नहीं होगा.

Ex-Muslim बहस ने इस अंतर को और महत्वपूर्ण बना देती है. इस्लाम छोड़ चुके लोगों के निजी अनुभव और धार्मिक आलोचनाएं अपनी जगह हैं. दूसरी तरफ मुस्लिमों के खिलाफ सामूहिक पूर्वाग्रह और भेदभाव एक अलग सवाल है. दोनों को एक ही श्रेणी में रखना बहस को बेवजह सरल बना देना ही कहा जा सकता है.

Islamophobia को लेकर MWL इतनी मुखर क्यों?

MWL की मौजूदा सार्वजनिक भूमिका में Islamophobia का विरोध महत्वपूर्ण विषय बन चुका है. संगठन का तर्क है कि किसी धर्म या समुदाय के खिलाफ नफरत सामाजिक तनाव को बढ़ाती है. इसलिए वह धार्मिक संवाद और मुस्लिम तथा गैर-मुस्लिम समुदायों के बीच समझ बढ़ाने पर जोर देता है.

MWL महासचिव मोहम्मद बिन अब्दुलकरीम अल-ईसा के नेतृत्व में संगठन ने अंतरधार्मिक संवाद को विशेष प्राथमिकता दी है. विभिन्न देशों में धार्मिक नेताओं के साथ बैठकों और सम्मेलनों में धार्मिक सह-अस्तित्व, नफरत के विरोध और सामाजिक शांति जैसे मुद्दे उठाए जाते रहे हैं.

लेकिन Islamophobia के खिलाफ आवाज उठाने का अर्थ यह नहीं होना चाहिए कि इस्लाम या मुस्लिम संस्थाओं की आलोचना पर रोक लगे. लोकतांत्रिक समाज में धार्मिक विचारों और संस्थाओं की आलोचना की स्वतंत्रता तथा किसी समुदाय के खिलाफ धार्मिक घृणा अलग विषय हैं. MWL के संदेश को समझने के लिए यह अंतर महत्वपूर्ण है.

क्या भाईचारे का यह संदेश सिर्फ धार्मिक पहल है?

MWL की गतिविधियों को केवल धार्मिक प्रचार के नजरिए से देखना उसकी मौजूदा भूमिका की पूरी तस्वीर नहीं है. संगठन का काम धार्मिक संवाद के साथ-साथ अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं, मीडिया और विभिन्न देशों के धार्मिक नेताओं के साथ संपर्क तक फैला हुआ है.

संगठन के वर्तमान महासचिव मोहम्मद अल-ईसा के दौर में moderation, tolerance, interfaith dialogue और Islamophobia के विरोध जैसे शब्द उसके सार्वजनिक संदेश का हिस्सा है. 2019 का मक्का चार्टर भी इसी दिशा में महत्वपूर्ण दस्तावेज है.

हालांकि MWL इस पहल को सीधे “इमेज मेकओवर” कहना एक व्याख्या हो सकती है. किसी संगठन के उद्देश्य और उसके प्रभाव को अलग-अलग देखना जरूरी है. MWL यह संदेश दे सकती है कि वह इस्लाम को शांति और सह-अस्तित्व के साथ जोड़कर पेश करना चाहती है, लेकिन इससे अपने आप यह साबित नहीं होता कि दुनिया में इस्लाम को लेकर लोगों की धारणाएं बदल गई हैं.

क्या यह संदेश मुसलमानों के लिए भी है?

MWL की गतिविधियों को देखें तो संदेश केवल गैर-मुस्लिम समाजों के लिए नहीं है. संगठन मुस्लिम समाजों के भीतर भी एकता, धार्मिक संवाद और चरमपंथ से दूरी की बात करता है.

मक्का चार्टर में अलग-अलग मुस्लिम धाराओं के बीच सहयोग और व्यापक धार्मिक सह-अस्तित्व की बात की गई थी. इसका अर्थ यह है कि MWL एक तरफ गैर-मुस्लिम समाजों से मुस्लिमों के बारे में बनी धारणाओं को लेकर संवाद करना चाहती है, वहीं मुस्लिम समाजों से भी हिंसा और नफरत से दूरी बनाने का संदेश देती है.

यही इस पूरी पहल का सबसे महत्वपूर्ण पहलू है. संदेश सिर्फ यह नहीं है कि “दुनिया मुसलमानों को समझे”, बल्कि यह भी है कि मुस्लिम नेतृत्व बदलती दुनिया के साथ संवाद करे और धार्मिक पहचान को हिंसा तथा चरमपंथ से अलग कर देखे.

MWL की भाईचारे वाली अपील को कैसे समझें?

  • पहला, मुस्लिम समाजों के भीतर एकता और चरमपंथ से दूरी.
  • दूसरा, गैर-मुस्लिम समाजों के साथ धार्मिक और सांस्कृतिक संवाद.
  • तीसरा, इस्लाम को आतंकवाद और हिंसा से जोड़ने वाली धारणाओं का विरोध.

इस बहस में न तो यह कहना उचित होगा कि मुसलमानों की छवि खराब होने की पूरी जिम्मेदारी मुसलमानों की है और न यह कि मुस्लिम समाजों के भीतर कोई समस्या है ही नहीं. इसी तरह हर Ex-Muslim की आलोचना, इस्लाम की आलोचना, मुस्लिम समाजों की वास्तविक समस्याएं और Islamophobia अलग-अलग मुद्दे हैं. इन्हें अलग-अलग समझे इस्लाम-विरोधी टिप्पणी को Islamophobia कहना भी बहस को कमजोर करना माना जा सकता है.

दरअसल Ex-Muslim की आलोचना, इस्लाम की आलोचना, मुस्लिम समाजों की वास्तविक समस्याएं और Islamophobia अलग-अलग मुद्दे हैं. इन्हें अलग-अलग समझे बिना MWL की भाईचारे की अपील का मतलब भी पूरी तरह नहीं समझा जा सकता.

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