लाहौर में लश्कर के साथ खुफिया मीटिंग! कौन हैं आसिम मुनीर को आड़े हाथों लेने वाले फजलुर रहमान, जिन्हें चुप कराने की हो रही प्लानिंग?
लाहौर में लश्कर-ए-तैयबा नेताओं के साथ कथित सीक्रेट मीटिंग हुई, जिसका मुद्दा मौलाना फजलुर रहे. जानिए कौन हैं मौलाना फजलुर रहमान, उनका आसिम मुनीर से विवाद क्या है और पाकिस्तान की राजनीति में इस घटनाक्रम को क्यों अहम माना जा रहा है.
पाकिस्तान में सेना, धार्मिक संगठनों और कट्टरपंथी नेटवर्क के रिश्तों को लेकर एक बार फिर चर्चा तेज हो गई है. खुफिया सूत्रों के अनुसार, पाकिस्तान उलेमा काउंसिल के अध्यक्ष मौलाना ताहिर महमूद अशरफी ने संयुक्त राष्ट्र द्वारा प्रतिबंधित आतंकी हाफिज सईद के बेटे हाफिज तल्हा सईद से लाहौर के मरकज क़ुबा में मुलाकात की. बताया जा रहा है कि इस बैठक में लश्कर-ए-तैयबा (LeT) के नेताओं ने भी हिस्सा लिया.
सूत्रों का दावा है कि बैठक का मकसद पाकिस्तान के प्रमुख इस्लामी नेता मौलाना फजलुर रहमान के जरिए सेना प्रमुख जनरल असीम मुनीर की सुरक्षा नीतियों और शासन व्यवस्था की आलोचना के बाद आगे की रणनीति तय करना था. माना जा रहा था कि मौलाना फजलुर रहमान को पाकिस्तान हमेशा के लिए रास्ते से हटाने का प्लान कर रहा है. हालांकि, इस मीटिंग के बाद सब कुछ बदलता दिख रहा है.
मीटिंग में क्या हुई बातचीत?
रिपोर्ट के मुताबिक, बैठक में फजलुर रहमान के खिलाफ सीधी टकराव की नीति अपनाने के बजाय नरम रुख अपनाने पर जोर दिया गया. खुफिया सूत्रों का कहना है कि लश्कर-ए-तैयबा से जुड़े लोगों ने धार्मिक नेताओं से फजलुर रहमान के राजनीतिक जीवन के सकारात्मक पहलुओं का जिक्र करने को कहा, लेकिन साथ ही उन्हें राज्य संस्थाओं, खासकर सेना, के खिलाफ बयान देने से बचने की चेतावनी देने की भी बात कही गई.
सूत्रों का दावा है कि यह घटनाक्रम इस बात का संकेत है कि पाकिस्तान का सैन्य प्रतिष्ठान पारंपरिक राजनीतिक तरीकों के साथ-साथ कट्टरपंथी धार्मिक नेटवर्क का भी इस्तेमाल राजनीतिक विरोध को कंट्रोल करने के लिए कर रहा है. इस बात का सबूत लश्कर-ए-तैयबा का मीटिंग में शामिल होना है. साफ है कि मौलाना फजलुर रहमान की आवाज दबाने के लिए पाक लश्कर का इस्तेमाल करने वाला है.
मौलाना फजलुर रहमान और आसिम मुनीर के बीच क्या है विवाद?
मौलाना फजलुर रहमान और पाकिस्तान के सेना प्रमुख (फील्ड मार्शल) आसिम मुनीर के बीच टकराव लगातार गहराता जा रहा है. इस विवाद की जड़ में सेना की राजनीति में बढ़ती भूमिका, बलूचिस्तान और खैबर पख्तूनख्वा में खराब होती सुरक्षा व्यवस्था और कारगिल युद्ध के शहीदों को लेकर दिए गए बयानों जैसे कई मुद्दे शामिल हैं.
हाल के दिनों में फजलुर रहमान ने आसिम मुनीर पर सीधे निशाना साधते हुए कहा कि यदि सेना देश की राजनीति में सक्रिय भूमिका निभाना चाहती है और सरकार चलाने की जिम्मेदारी अपने हाथ में लेना चाहती है, तो उसे वर्दी छोड़कर लोकतांत्रिक प्रक्रिया के तहत चुनाव लड़ना चाहिए. उनका कहना था कि तभी यह साफ हो सकेगा कि जनता का वास्तविक समर्थन किसके साथ है और वर्दीधारी नेतृत्व को कितने वोट मिलते हैं.
कौन हैं मौलाना फजलुर रहमान?
मौलाना फजलुर रहमान पाकिस्तान के सबसे प्रभावशाली इस्लामी नेताओं में गिने जाते हैं. उनका जन्म 19 जून 1953 को डेरा इस्माइल खान के अब्दुल खेल में हुआ था. उनके पिता मुफ्ती महमूद जमीयत उलेमा-ए-इस्लाम (JUI) के संस्थापक और तत्कालीन नॉर्थ-वेस्ट फ्रंटियर प्रोविंस, जिसे अब खैबर पख्तूनख्वा कहा जाता है, के मुख्यमंत्री रह चुके थे.
फजलुर रहमान ने शुरुआती धार्मिक शिक्षा स्थानीय मदरसों में प्राप्त की और बाद में अकोड़ा खट्टक स्थित दारुल उलूम हक्कानिया सहित कई प्रमुख इस्लामी शिक्षण संस्थानों में पढ़ाई की. वर्ष 1980 में पिता के निधन के बाद उन्होंने कम उम्र में ही जमीयत उलेमा-ए-इस्लाम की कमान संभाल ली.
जब फजलुर रहमान ने मिलिट्री शासन का किया विरोध..
1980 के दशक के मध्य में जमीयत उलेमा-ए-इस्लाम दो धड़ों में बंट गई. एक धड़ा फजलुर रहमान के नेतृत्व में JUI-F और दूसरा सामी-उल-हक के नेतृत्व में JUI-S के नाम से जाना गया. यह विभाजन तत्कालीन सैन्य शासक जनरल जिया-उल-हक के प्रति अलग-अलग राजनीतिक रुख के कारण हुआ. फजलुर रहमान का गुट सैन्य शासन का विरोध करने वाले 'मूवमेंट फॉर द रिस्टोरेशन ऑफ डेमोक्रेसी (MRD)' में शामिल हुआ और इस दौरान उन्हें गिरफ्तार भी किया गया.
पहली बार कब जीता चुनाव?
वर्ष 1988 में वह पहली बार डेरा इस्माइल खान से पाकिस्तान की नेशनल असेंबली के लिए चुने गए. इसके बाद वह कई बार संसद सदस्य बने. 2024 के आम चुनाव में उनकी पार्टी JUI-F ने 11 सीटें जीतीं और वह बलूचिस्तान की नई सीट NA-265 से सांसद चुने गए. उनकी पार्टी का सबसे मजबूत आधार खैबर पख्तूनख्वा और बलूचिस्तान के पश्तून बहुल इलाके हैं, जहां उसके मदरसों और धार्मिक संस्थानों का व्यापक नेटवर्क मौजूद है.
क्या तालिबान के हैं समर्थक?
फजलुर रहमान लंबे समय से अफगान तालिबान के समर्थक माने जाते हैं. उनकी पार्टी JUI-F ने 1990 के दशक से तालिबान को वैचारिक समर्थन दिया है और कई तालिबान नेताओं ने JUI से जुड़े मदरसों में शिक्षा प्राप्त की है. उन्होंने 2001 में अमेरिका के अफगानिस्तान पर हमले का समर्थन करने वाली तत्कालीन राष्ट्रपति परवेज मुशर्रफ की नीति का विरोध किया और पाकिस्तान में अमेरिका विरोधी तथा तालिबान समर्थक रैलियों का नेतृत्व किया.
2021 में तालिबान की अफगानिस्तान में वापसी के बाद उन्होंने कई बार अंतरराष्ट्रीय समुदाय से इस्लामिक अमीरात ऑफ अफगानिस्तान को मान्यता देने की मांग की. मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, वह तालिबान के सर्वोच्च नेता हिबतुल्लाह अखुंदजादा सहित कई वरिष्ठ नेताओं से मुलाकात कर चुके हैं और पाकिस्तान से काबुल के साथ संबंध मजबूत करने की अपील भी करते रहे हैं.
हालांकि पाकिस्तान और अफगानिस्तान के संबंध इस समय बेहद तनावपूर्ण हैं, फिर भी फजलुर रहमान लगातार दोनों देशों के बीच बातचीत और कूटनीतिक समाधान की वकालत करते रहे हैं.
क्या पाकिस्तान में लाना चाहते हैं पूरी तरह से शरिया?
फजलुर रहमान पाकिस्तान में शरिया कानून के व्यापक लागू किए जाने के समर्थक रहे हैं. वर्ष 2004 से 2007 के बीच जब उनकी पार्टी खैबर पख्तूनख्वा की सरकार में शामिल थी, तब उसने इस्लामी नैतिक नियमों को लागू करने के उद्देश्य से हसबा बिल का समर्थन किया था.
हालांकि बाद में पाकिस्तान के सुप्रीम कोर्ट ने इस विधेयक को असंवैधानिक घोषित कर दिया. इसके साथ ही फजलुर रहमान यह भी कहते रहे हैं कि शरिया लागू करने के लिए सशस्त्र संघर्ष का रास्ता इस्लाम के सिद्धांतों के खिलाफ है और इससे कट्टरपंथ और हिंसा को बढ़ावा मिलता है.
पाकिस्तानी सेना की करते हैं आलोचना?
पिछले वर्ष दिसंबर में उन्होंने पाकिस्तान द्वारा तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (TTP) जैसे आतंकी संगठनों के खिलाफ अफगानिस्तान के भीतर की गई सैन्य कार्रवाई की भी आलोचना की थी. ऐसे में ताहिर महमूद अशरफी और हाफिज तल्हा सईद की कथित बैठक को पाकिस्तान की आंतरिक राजनीति और सेना की रणनीति के संदर्भ में महत्वपूर्ण माना जा रहा है. हालांकि इन दावों पर पाकिस्तान सरकार या संबंधित पक्षों की ओर से आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है.




