ईरान-अमेरिका टकराव में असली खिलाड़ी कौन? पर्दे के पीछे बैठे 5 देश
ईरान-अमेरिका टकराव के पीछे कौन हैं असली खिलाड़ी? जानिए इजरायल, रूस, चीन, सऊदी अरब और तुर्की की रणनीति, हित और इस संघर्ष पर उनका प्रभाव.
पिछले पांच महीने से ईरान और अमेरिका का टकराव सिर्फ दो देशों के बीच की लड़ाई नहीं है. अब इसके पीछे कई क्षेत्रीय और वैश्विक शक्तियां अपने-अपने रणनीतिक हित साध रही हैं. कोई सुरक्षा चाहता है, कोई ऊर्जा बाजार पर प्रभाव बनाए रखना चाहता है, तो कोई पश्चिमी दबाव को संतुलित करने की कोशिश में है. इसलिए, हर सैन्य तनाव के पीछे एक बड़ा भू-राजनीतिक (जियो पॉलिटिकल) खेल चल रहा है.
इजरायल की पहली प्राथमिकता सुरक्षा क्यों?
इजरायल के लिए ईरान सिर्फ एक प्रतिद्वंद्वी नहीं, बल्कि अस्तित्व से जुड़ा सुरक्षा खतरा है. ईरान 1979 की इस्लामी क्रांति के बाद से इजरायल को मान्यता नहीं देता. अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (IAEA) लगातार ईरान के संवर्धित यूरेनियम भंडार पर चिंता जताती रही है. इजरायल का दावा है कि यदि ईरान परमाणु हथियार क्षमता के करीब पहुंचता है तो पूरे क्षेत्र का शक्ति संतुलन बदल जाएगा. इसी कारण इजरायल वर्षों से अमेरिकी प्रशासन पर कड़े प्रतिबंध, सैन्य दबाव और ईरान समर्थित नेटवर्क-हिजबुल्लाह, हमास तथा अन्य समूहों- के खिलाफ कार्रवाई का समर्थन करता रहा है. यही वजह है कि वॉशिंगटन की ईरान नीति में इजरायल का प्रभाव सबसे अहम कारकों में गिना जाता है.
इजरायल अमेरिका का सबसे करीबी सुरक्षा साझेदार है. खुफिया सूचनाएं साझा करना, ईरान के परमाणु कार्यक्रम पर लगातार निगरानी, अमेरिकी नीति निर्माताओं पर कूटनीतिक प्रभाव और क्षेत्रीय सुरक्षा गठजोड़ के जरिए वह बिना सीधे युद्ध का हिस्सा बने अमेरिका की रणनीति को प्रभावित करता है.
सऊदी अरब क्यों चाहता है रीजनल पावर बैलेंस?
सऊदी अरब और ईरान के बीच प्रतिस्पर्धा केवल धार्मिक नहीं, बल्कि पश्चिम एशिया के नेतृत्व की भी है. यमन, सीरिया, लेबनान और इराक में दोनों अलग-अलग पक्षों का समर्थन करते रहे हैं. मार्च 2023 में चीन की मध्यस्थता से दोनों देशों ने संबंध बहाल किए, लेकिन रणनीतिक अविश्वास बना हुआ है. रियाद नहीं चाहता कि ईरान की मिसाइल या परमाणु क्षमता इतनी बढ़ जाए कि खाड़ी क्षेत्र का शक्ति संतुलन बदल जाए. दूसरी ओर, सऊदी अरब तेल बाजार में स्थिरता भी चाहता है ताकि उसकी आर्थिक परिवर्तन योजना ‘विजन 2030’ प्रभावित न हो.
सऊदी अरब अमेरिका का प्रमुख रक्षा साझेदार है. वह तेल उत्पादन, खाड़ी सुरक्षा, अरब देशों की सामूहिक कूटनीति और अमेरिकी सैन्य सहयोग के जरिए ऐसा संतुलन बनाए रखने की कोशिश करता है, जिससे ईरान की शक्ति सीमित रहे लेकिन व्यापक युद्ध भी न छिड़े.
चीन की चिंता एनर्जी और ट्रेड क्यों?
चीन दुनिया का सबसे बड़ा ऊर्जा आयातक है और ईरान उसके लिए महत्वपूर्ण तेल स्रोतों में शामिल है. दोनों देशों ने 25 वर्षीय रणनीतिक सहयोग समझौता किया है, जिसमें ऊर्जा, बुनियादी ढांचा और निवेश शामिल हैं. पश्चिमी प्रतिबंधों के बावजूद चीन ने विभिन्न माध्यमों से ईरानी तेल खरीद जारी रखी है. यदि होर्मुज जलडमरूमध्य बाधित होता है तो वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति और चीन की अर्थव्यवस्था दोनों प्रभावित होंगी. इसलिए बीजिंग सैन्य टकराव की बजाय स्थिरता और बातचीत को प्राथमिकता देता है.
चीन ईरान को आर्थिक सहारा देता है, संयुक्त राष्ट्र में संतुलित रुख अपनाता है, क्षेत्रीय मध्यस्थता करता है और ऊर्जा व्यापार के जरिए तेहरान को पूरी तरह अलग-थलग पड़ने से बचाए रखता है.
रूस का स्ट्रेटजिक गेम
यूक्रेन युद्ध के बाद रूस और ईरान की रणनीतिक साझेदारी और गहरी हुई है. दोनों पश्चिमी प्रतिबंधों का सामना कर रहे हैं और रक्षा, ऊर्जा तथा तकनीकी क्षेत्रों में सहयोग बढ़ा रहे हैं. रूस के लिए पश्चिम एशिया ऐसा क्षेत्र है जहां अमेरिकी प्रभाव को चुनौती दी जा सकती है. साथ ही, यदि क्षेत्रीय तनाव से तेल की कीमतें बढ़ती हैं तो रूस को अतिरिक्त राजस्व मिलता है. हालांकि मॉस्को ऐसा युद्ध भी नहीं चाहता जो पूरे क्षेत्र को अस्थिर कर दे और उसके अपने हितों को नुकसान पहुंचाए.
रूस संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में कूटनीतिक समर्थन देता है, हथियार और तकनीकी सहयोग बढ़ाता है, ऊर्जा समन्वय करता है और अमेरिका के प्रभाव को संतुलित करने के लिए ईरान के साथ रणनीतिक साझेदारी बनाए रखता है.
तुर्की क्यों अपना रहा बैलेंस्ड पॉलिसी?
तुर्की नाटो का सदस्य है, लेकिन उसने कई मुद्दों पर अमेरिका से अलग नीति अपनाई है. वहीं ईरान के साथ व्यापार, सीमा सुरक्षा और क्षेत्रीय संवाद भी बनाए रखता है. सीरिया, इराक और दक्षिण काकेशस में अंकारा अपने प्रभाव का विस्तार चाहता है. यदि ईरान-अमेरिका युद्ध बढ़ता है तो शरणार्थी संकट, व्यापार मार्ग और तुर्की की सुरक्षा सीधे प्रभावित होगी. इसलिए उसकी प्राथमिकता किसी एक पक्ष के साथ पूरी तरह खड़े होने की बजाय क्षेत्रीय स्थिरता बनाए रखना है.
तुर्की दोनों पक्षों से संवाद बनाए रखता है, नाटो और क्षेत्रीय मंचों के बीच सेतु का काम करता है, व्यापारिक संपर्क जारी रखता है और संकट के दौरान मध्यस्थ की भूमिका निभाने की कोशिश करता है.




