पहले राणा प्रताप और अब मोनी चक्रवर्ती, 24 घंटे में दो हिंदुओं की हत्या; बांग्लादेश में क्यों बढ़ रही टारगेट किलिंग्स?
बांग्लादेश में हिंदू अल्पसंख्यकों के खिलाफ हिंसा की घटनाएं लगातार बढ़ रही हैं. पिछले 24 घंटे में दो हिंदुओं की हत्या के साथ 18 दिनों में कुल छह टारगेट किलिंग सामने आ चुकी हैं. राजधानी ढाका के पास नरसिंगड़ी और जशोर की घटनाओं ने कानून-व्यवस्था और अल्पसंख्यक सुरक्षा पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं. भारत और अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संगठनों ने हालात पर चिंता जताई है.
पिछले कुछ हफ्तों में बांग्लादेश में अल्पसंख्यकों के खिलाफ हिंसा की घटनाओं ने एक बार फिर सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं. ताज़ा घटनाक्रम में 24 घंटे के भीतर दो हत्याओं की खबरों ने यह संकेत दिया है कि समस्या अलग-थलग अपराधों तक सीमित नहीं रही. राजधानी ढाका के निकट इलाकों में वारदातें होना यह बताता है कि हिंसा का दायरा शहरी क्षेत्रों तक फैल रहा है.
नरसिंगड़ी जिले के पलाश उपजिला में चोरसिंदूर बाज़ार की घटना ने स्थानीय समुदाय को झकझोर दिया. किराना दुकानदार मोनी चक्रवर्ती पर धारदार हथियारों से हमला किया गया और अस्पताल पहुंचने से पहले ही उनकी मौत हो गई. प्रत्यक्षदर्शियों के मुताबिक हमला अचानक था और हमलावर फरार हो गए. यह वारदात इसलिए भी चौंकाने वाली मानी जा रही है क्योंकि यह राजधानी के क़रीब हुई, जहां सुरक्षा अपेक्षाकृत सख़्त मानी जाती है.
जशोर में दूसरी हत्या
कुछ घंटे पहले जशोर जिले के मणिरामपुर उपजिला में एक कारोबारी की गोली मारकर हत्या की गई. हमलावरों का मोटरसाइकिल पर आना, पीड़ित को बाहर बुलाना और फिर सुनियोजित तरीके से वार करना ये संकेत देते हैं कि यह कोई आकस्मिक झगड़ा नहीं था. पुलिस द्वारा कारतूस बरामदगी और पोस्टमार्टम निष्कर्षों ने मामले की गंभीरता और बढ़ा दी है.
18 दिनों में छह हत्याएं
पिछले 18 दिनों में दर्ज घटनाओं की श्रृंखला बताती है कि यह हिंसा क्रमिक और लगातार है. अलग-अलग जिलों में भीड़ हिंसा, गोलीबारी और आगज़नी की घटनाएं सामने आई हैं. नागरिक समाज संगठनों का कहना है कि दिसंबर में ही कई हमले दर्ज हुए, जिनमें हत्याएं भी शामिल हैं. यह पैटर्न किसी एक क्षेत्र या एक कारण तक सीमित नहीं दिखता.
ट्रिगर पॉइंट और राजनीति
इन घटनाओं की शुरुआत दिसंबर 2025 में एक छात्र नेता की हत्या के बाद हुई व्यापक अशांति से जोड़कर देखी जा रही है. इसके बाद विरोध-प्रदर्शनों ने सांप्रदायिक रंग लिया और अल्पसंख्यक समुदाय निशाने पर आने लगा. विश्लेषकों के मुताबिक, राजनीतिक अस्थिरता और कट्टरपंथी नैरेटिव्स का संगम अक्सर ऐसे हालात पैदा करता है, जहां हिंसा “प्रतिक्रिया” बनकर फैलती है.
सरकार की चुनौती
अंतरिम प्रशासन जिसका नेतृत्व मुहम्मद यूनुस कर रहे हैं. उनपर आरोप है कि वह अल्पसंख्यकों की सुरक्षा सुनिश्चित करने में नाकाम रहा है. सरकार कुछ मामलों को आपराधिक या व्यक्तिगत विवाद बताती है, जबकि मानवाधिकार समूह इसे धार्मिक कट्टरता से प्रेरित मानते हैं. यही विरोधाभास नीति और कार्रवाई के बीच दूरी को उजागर करता है.
अंतरराष्ट्रीय प्रतिक्रिया और कूटनीतिक दबाव
इन घटनाओं पर भारत ने चिंता जताई है और अल्पसंख्यकों के खिलाफ निरंतर शत्रुता को गंभीर मुद्दा बताया है. साथ ही अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संगठनों ने कानून-व्यवस्था की गिरावट पर सवाल उठाए हैं. ऐसे बयान केवल नैतिक दबाव नहीं बनाते, बल्कि द्विपक्षीय रिश्तों और वैश्विक छवि पर भी असर डालते हैं.
सुरक्षा से आगे का सवाल
बांग्लादेश के सामने चुनौती सिर्फ अपराध नियंत्रण की नहीं, बल्कि भरोसे की बहाली की है. अल्पसंख्यक समुदायों में फैला भय सामाजिक ताने-बाने को कमजोर करता है और राजनीतिक स्थिरता को खतरे में डालता है. यदि त्वरित, निष्पक्ष जांच और सख़्त कार्रवाई नहीं हुई, तो यह संकट केवल मानवीय नहीं, बल्कि दीर्घकालिक राजनीतिक समस्या बन सकता है—जिसकी कीमत पूरे देश को चुकानी पड़ेगी.





