EXCLUSIVE: ईरान में लगी 'मुल्लाओं देश छोड़ो' की आग जिद्दी खामेनेई को निपटा देगी, अमेरिका-इजराइल की खामोशी भी खतरनाक!
ईरान में Gen Z का गुस्सा अब खतरनाक मोड़ पर पहुंच चुका है. “मुल्ला देश छोड़ो” के नारों के साथ सड़कों पर उतरे युवाओं ने खामेनेई सरकार की नींव हिला दी है. रिटायर्ड लेफ्टिनेंट कर्नल जे.एस. सोढ़ी के मुताबिक, कट्टरपंथी नेतृत्व, गिरती अर्थव्यवस्था और बेरोजगारी ने हालात विस्फोटक बना दिए हैं, जिसका फायदा अमेरिका और इजराइल को घर बैठे मिल रहा है.
“सिर्फ ईरान ही क्यों, पाकिस्तान और बांग्लादेश भी इसी की तरह बिना रीढ़ के जिद्दी इस्लामिक देश हैं. जिसके कट्टरपंथी और चरमपंथी नेता इस्लाम के नाम पर स्वार्थ की रोटियां सेंक कर सिर्फ और सिर्फ अपनी और अपनी औलादों की जेबें भरकर, देश के वजूद की बिसात पर हार का जुंआ जान-बूझकर खेल रहे हैं. देखते जाइए वह दिन दूर नहीं जब ईरान में सड़कों पर उतरा गुस्साया हुआ Gen Z, आने वाले वक्त में श्रीलंका, नेपाल और बांग्लादेश से भी ज्यादा खतरनाक साबित हो जाएगा.
अब तक कट्टरपंथी के पुरोधा और घोर चरमपंथी ईरानी सुप्रीमो अयातुल्ला अली खामेनेई को गुमान था कि उसने जून 2022 में 12 दिन तक इजराइल और अमेरिका से सीधी टक्कर में भी शिकस्त नहीं खाई. तब फिर ऐसे में दुनिया अब कैसे उसे हरा देगी. जिद्दी ईरानी सुप्रीम कमांडर खामेनेई की यही कम-अक्ली उन्हें अपने देश की बर्बादी की ओर धकेल चुकी है. अब अमेरिका और इजराइल अगर ईरान की जड़ें अंदर ही अंदर खोद भी रहे थे, तब भी जमाना खुलकर यह नहीं कह सकेगा कि इन दोनों के षडयंत्र में फंसकर ईरान बर्बाद हो गया.”
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सबसे पहले देश फिर विचारधारा
यह तमाम बेबाक बातें 3 जनवरी 2026 को एक एक्सक्लूसिव लंबे इंटरव्यू में भारतीय थलसेना के रिटायर्ड लेफ्टिनेंट कर्नल जे एस सोढ़ी (Lt Colonel J S Sodhi) ने बयान कीं. जेएस सोढ़ी नई दिल्ली में मौजूद स्टेट मिरर हिंदी के एडिटर इनवेस्टीगेशन से ईरान में मचे आंतरिक घमासान पर विशेष बातचीत कर रहे थे. एक सवाल के जवाब में उन्होंने कहा, “पाकिस्तान बांग्लादेश और ईरान. इन तीनों को देख लीजिए. तीनों ही अपनी चरम कट्टरपंथी विचारधारा के लिए दुनिया में बदनाम हैं. मैं यह नहीं कह रहा हूं कि धर्म और कौम की रक्षा मत करिए. या अपनी कौम और धर्म पर आंच आए तो खामोश रहो. बात जहां देश की सुरक्षा अस्मिता की आए वहां हुकूमत और हुक्मरानों को कट्टरपंथी या चरमपंथी विचारधारा से अलग हटकर पहले देश और अपनी जनता के बारे में सोचना चाहिए.”
ईरानी Gen Z सबसे ज्यादा घातक
जब देश ही नहीं रहेगा तो फिर कैसा कट्टरपन और किसकी चरमपंथी विचारधार. बिना देश के तो आप कुछ नहीं कर सकते हैं. ईरान में सच पूछिए तो वही सब हो रहा है कि वहां के कट्टरपंथी विचारधारा के सुप्रीम कमांडर अयातुल्ला अली खामेनेई अपने निजी रुतबा-रसूख की खातिर देश को दांव पर लगाए बैठे हैं. आज तीन चार दिन से वहां जिस तरह से Gen Z सड़कों पर उतर कर गोलीबारी, आगजनी पथराव में लिप्त है, वह नेपाल, श्रीलंका, बांग्लादेश की Gen Z से भी ज्यादा घातक साबित हो जाएगा.
ईरान ने अमेरिका-इजराइल की मौज करवाई
स्टेट मिरर हिंदी के साथ विशेष बातचीत में भारतीय सेना के रिटायर्ड लेफ्टिनेंट कर्नल और विदेश, कूटनीति, रक्षा-सैन्य, जियो पॉलिटिक्स के मर्मज्ञ जसिंदर सिंह सोढ़ी ने कहा, “ईरान में मुल्ला और तानाशाह के खिलाफ सड़कों पर उतरी Gen Z का गुस्सा जायज है. जिस ईरान का सुप्रीम कमांडर खामेनेई अपनी जिद और चरमपंथी मानसिकता के चलते देश की नींब ही हिलाए बैठा हो. तब फिर भी आखिर ऐसे में भुखमरी, अशिक्षा के कगार पर खड़ी युवा पीढ़ी क्यों नहीं उसके विरोध में सड़कों पर उतरेगी. हालांकि इस खूनी प्रदर्शन ने, अमेरिका और इजराइल की ईरान को बर्बाद करने की मनोकामना उनके घर बैठे-बैठे ही पूर्ण करने का मौका खुद ही इन दोनो देशों की झोली में डाल दिया है.”
ईरान के जलने की वजह
अब जब अपने ही चरमंथी कट्टर मानसिकता के नेताओं (खामेनेई) से आजिज युवा पीढ़ी जब अपनी और अपनों के भविष्य की हिफाजत के लिए सड़कों पर उतर आई है, तो ऐसे में दुनिया यह भी नहीं कह सकेगी कि, अमेरिका और इजराइल ने ईरान को बर्बाद करवा दिया. यहां जिक्र करना जरूरी है कि बीते तीन चार दिनों से ईरान की राजधानी तेहरान से करीब 300 किलोमीटर दूर स्थित चार पांच शहरों में आक्रोषित युवा सड़कों पर उतरकर हिंसक प्रदर्शन कर रहा है. इन खूनी प्रदर्शनों में गोली, पथराव सबका इस्तेमाल खुलकर हो रहा है. अब तक 17 लोगों के मारे जाने की खबर है. सैकड़ों घायल हो चुके हैं. ईरान के लोरेस्तान प्रांत के शहरों और ग्रामीण इलाकों की सड़कों पर उतरी नाराज युवा पीढ़ी “मुल्लाओं और तानाशाह ईरान छोड़ो.” “तानाशाह मुर्दाबाद” “मुल्ला ईरान छोड़ें” जैसे कानफोड़ू नारों से गूंज रही हैं.
आने वाली पीढ़ियों का विनाश तय
बातचीत के दौरान भारतीय सेना के रिटायर्ड लेफ्टिन कर्नल और जीओ पॉलिटिक्स विशेषज्ञ जसिंदर सिंह सोढ़ी ने कहा, “दरअसल कट्टरपंथी और चरमपंथी नेताओं की जिद के चलते जिस तरह से अचानक ईरान की अर्थव्यवस्था और वहां की मुद्रा दुनिया के सबसे निचले स्तर पर पहुंची है, उसने मौजूदा ईरानी पीढ़ी के सब्र के बांध को तोड़ डाला है. इस पीढ़ी के सामने सवाल अपने और अपनी आने वाली पीढ़ियों के डूबते भविष्य का है. ईरानी Gen Z को साफ साफ दिखाई देने लगा है कि अगर हम अब भी रुढ़िवादी चरमपंथी ताकतों के हाथों में उनकी मर्जी के मुताबिक खामोश रहकर खेलते रहेंगे तब आने वाले वक्त में हाथ में सिवाय बर्बादी-तबाही के कुछ नहीं बचेगा.”
कौन थीं महसा अमीनी?
जिक्र करना जरूरी है कि साल 2022 में ईरान में हुए जबरदस्त प्रदर्शनों के बाद यह उससे भी कई गुना खतरनाक प्रदर्शन अब हो रहे हैं. साल 2022 में हुए प्रदर्शन भी चरमपंथियों-कट्टरवादिता के खिलाफ थे. तब के प्रदर्शन 22 साल की ईरानी लड़की महसा अमीनी की पुलिस हिरासत में हुई मौत के बाद शुरू हुए थे. उन विरोध प्रदर्शनों ने भी देश की कानून और शांति व्यवस्था की चूंलें हिला डाली थीं. उस वक्त महसा अमीनी को पुलिस ने हिजाब सही तरीके से न पहनने के चलते गिरफ्तार किया था. वह गिरफ्तारी भी खामेनेई जैसे कट्टरपंथी चरमपंथी नेताओं की घटिया विचारधारा के चलते ही की गई थी.
इस बार के प्रदर्शन मगर देश की बर्बाद होती अर्थ-व्यवस्था, बढ़ती बेरोजगारी-अशिक्षा, देश में बढ़ती महंगाई के चलते हो रहे हैं. इसमें प्रमुख वजह इन आंदोलनों के पीछे ईरानी मुद्रा रियाल की कीमत में अमेरिकी डॉलर के मुकाबले बर्बादी वाली गिरावट है. जिसके मुताबिक आज एक अमेरिकी डॉलर के सामने औंधे मुंह जमीन पर गिरी पड़ी मुद्रा एक ईरानी रियाल की कीमत 14 लाख हो जाना है. हालांकि देश में चौतरफा फैल चुके आंदोलन-अराजकता को काबू करने में जुटे ईरान के सुधारवादी राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियान के नेतृत्व वाली गैर-सैन्य हुकूमत प्रदर्शनकारियों से लगातार बातचीत करने की कोशिशों में जुटी है.





