तुमसे न हो पाएगा शी जिनपिंग! Condom पर भारी टैक्स से भी नहीं बन रही बात, आखिर लोगों को ज्यादा बच्चे पैदा करने के लिए कैसे मनाएगा ड्रैगन?
चीन में जनसंख्या गिरावट अब सिर्फ आंकड़ा नहीं, बल्कि आर्थिक और रणनीतिक संकट बन चुकी है. कंडोम टैक्स और कैश सब्सिडी जैसे उपाय भी उस संरचनात्मक गिरावट को रोकने में नाकाम दिख रहे हैं.
चीन, जो कभी अपनी विशाल जनसंख्या को राष्ट्रीय ताकत का सबसे बड़ा स्तंभ मानता था, आज उसी जनसंख्या को बचाने के लिए असामान्य और चौंकाने वाले उपाय कर रहा है. कंडोम पर टैक्स लगाना, स्कूलों में डेटिंग कोर्स पढ़ाने का प्रस्ताव देना, बच्चों के लिए कैश सब्सिडी देना - ये सब उस देश की नीतियां हैं जिसने दशकों तक जन्म को “नियंत्रित” किया और अब जन्म को “प्रोत्साहित” करने के लिए जूझ रहा है.
टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के अनुसार नई सरकारी जनसंख्या रिपोर्ट के मुताबिक, चीन की आबादी में गिरावट सिर्फ एक आंकड़ा नहीं है, बल्कि एक गहरी और संरचनात्मक गिरावट है - ऐसी गिरावट जिसे विशेषज्ञ अब “population collapse” कहने लगे हैं.
1949 के बाद सबसे कम जन्म दर, चौथे साल भी घटती आबादी
सरकारी आंकड़ों के अनुसार, वर्ष 2025 में चीन की कुल आबादी घटकर 1.404 अरब रह गई. यह पिछले साल के मुकाबले करीब 30 लाख कम है. यह लगातार चौथा साल है जब चीन की जनसंख्या घटी है. सबसे चौंकाने वाला तथ्य यह है कि चीन की जन्म दर 1949 की कम्युनिस्ट क्रांति के बाद सबसे निचले स्तर पर पहुंच गई है - यानी उसी साल के बाद, जब माओत्से तुंग ने पीपुल्स रिपब्लिक ऑफ चाइना की स्थापना की थी.
2025 में जन्म दर 5.63 प्रति 1,000 जनसंख्या रही और कुल 79.2 लाख बच्चे पैदा हुए. यानी 2024 की तुलना में 17% की गिरावट. हालांकि 2024 में जन्म दर में हल्की बढ़ोतरी दिखी थी, लेकिन वह इतनी अल्पकालिक रही कि नीति निर्माता उसका श्रेय लेने से पहले ही आंकड़े फिर नीचे गिर गए.
फर्टिलिटी रेट: संकट की जड़
चीन ने आखिरी बार आधिकारिक रूप से फर्टिलिटी रेट (प्रजनन दर) 2020 में जारी की थी, जो 1.3 थी. हालांकि स्वतंत्र जनसांख्यिकी विशेषज्ञों का अनुमान है कि वास्तविक दर अब 1 या उससे भी कम हो चुकी है. जबकि किसी भी देश की आबादी को स्थिर रखने के लिए फर्टिलिटी रेट 2.1 होना जरूरी माना जाता है. तुलना करें तो:
- दक्षिण कोरिया: ~0.7
- जापान: ~1.26
- अमेरिका: ~1.6
नतीजा साफ है - चीन में बुजुर्गों की संख्या तेज़ी से बढ़ रही है और युवा आबादी सिकुड़ रही है.
जब जनसंख्या थी रणनीतिक हथियार
1957 में माओत्से तुंग ने कहा था, “चीन के 60 करोड़ लोग उसकी सबसे बड़ी ताकत हैं.” लेकिन 1970 के दशक तक आते-आते हालात बदल गए. भुखमरी, अकाल और आर्थिक अस्थिरता ने चीनी नेतृत्व को यह सोचने पर मजबूर किया कि अनियंत्रित जनसंख्या देश के आधुनिकीकरण के रास्ते में सबसे बड़ी बाधा बन सकती है.
एक बच्चा नीति: जिसने भविष्य की नींव हिला दी
1980 में, माओ की मृत्यु के चार साल बाद, चीन ने कुख्यात वन-चाइल्ड पॉलिसी लागू की. शहरी इलाकों में ज्यादातर परिवारों को सिर्फ एक बच्चे की अनुमति दी गई. यह नीति करीब 35 साल तक लागू रही और इसके गहरे दुष्परिणाम सामने आए:
बेटों की चाह में लैंगिक असंतुलन
- “ओनली चाइल्ड” पीढ़ी - न भाई, न बहन
- तेजी से बूढ़ी होती आबादी
- शहरी इलाकों में वर्कफोर्स का सिकुड़ना
2015 में दो बच्चे और 2021 में तीन बच्चों की अनुमति दी गई, लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी.
बच्चे क्यों नहीं चाह रहे चीनी परिवार?
वन-चाइल्ड पॉलिसी खत्म होने के बावजूद चीन में बेबी बूम नहीं आया. वजहें गहरी और जटिल हैं.
- आर्थिक दबाव : शहरी चीन में बच्चों की परवरिश बेहद महंगी हो चुकी है - घर, स्कूल, ट्यूशन, हेल्थकेयर और एक्स्ट्रा एक्टिविटीज. धीमी होती अर्थव्यवस्था और युवाओं में बेरोज़गारी ने हालात और बिगाड़ दिए हैं.
- बदलते सामाजिक मूल्य : शादी की दर गिर रही है. खासकर युवा महिलाएं शादी और मातृत्व को टाल रही हैं या पूरी तरह छोड़ रही हैं. लंबा कामकाजी समय, करियर प्रेशर और प्रतिस्पर्धी शिक्षा प्रणाली बड़े परिवार के खिलाफ जाती है.
- नीति की मानसिक छाया : वन-चाइल्ड पॉलिसी के दौर में पली-बढ़ी पीढ़ी के लिए छोटा परिवार “नॉर्मल” बन चुका है. एक बच्चे पर ज़्यादा निवेश की संस्कृति - जिसे “लिटिल एम्परर सिंड्रोम” कहा जाता है - आज भी कायम है.
- सांस्कृतिक कारण : 2025 चीनी कैलेंडर के अनुसार सांप का वर्ष था, जिसे बच्चों के जन्म के लिए शुभ नहीं माना जाता. इसका असर भी जन्म दर पर पड़ा.
- ध्यान देने वाली बात यह है कि 2022 से चीन में मौतों की संख्या जन्मों से अधिक हो चुकी है.
बीजिंग के अजीबोगरीब उपाय
जब सामाजिक बदलाव नाकाम रहे, तो सरकार ने आर्थिक और व्यवहारिक इंजीनियरिंग का सहारा लिया. हाल में जो कदम उठाए गए वो कुछ इस प्रकार थे:
- कैश सब्सिडी: कुछ क्षेत्रों में प्रति बच्चे 3,600 युआन (करीब 500 डॉलर)
- कंडोम पर 13% टैक्स (VAT छूट हटाई गई)
- किंडरगार्टन, डेकेयर और यहां तक कि मैचमेकर्स को टैक्स छूट
- शादी और बच्चे पैदा करने को बढ़ावा देने वाले प्रचार अभियान
- पांच साल की योजनाओं में चाइल्डकेयर लागत घटाने का लक्ष्य
हालांकि विशेषज्ञों का कहना है कि ये सब्सिडी वास्तविक लागत के मुकाबले नाकाफी हैं और मूल संरचनात्मक समस्याओं को नहीं सुलझातीं.
बूढ़ा होता चीन: अमीर बनने से पहले
- 2025 तक चीन में 60 साल से ऊपर के लोग: 32.3 करोड़ रहे जो कुल आबादी का 23% है. यह अनुपात तेजी से बढ़ रहा है. इसके गंभीर आर्थिक परिणाम हैं:
- धीमी आर्थिक रफ्तार : 2025 में चीन की ग्रोथ 5% रही, लेकिन श्रम शक्ति घटने से आगे चलकर यह और धीमी हो सकती है.
- पेंशन और स्वास्थ्य पर दबाव : रिटायर्ड लोगों की बढ़ती संख्या से सरकारी खर्च बढ़ेगा. पेंशन सुधार और टैक्स बेस बढ़ाना अनिवार्य हो जाएगा.
- इंडस्ट्रियल ट्रांजिशन की चुनौती : हाई-टेक और ऑटोमेशन सभी नौकरियों की जगह नहीं ले सकते, खासकर कंज़्यूमर इकॉनमी में.
इसी डर को विशेषज्ञ एक वाक्य में समेटते हैं - “China is getting old before it gets rich.”
वैश्विक असर और भारत फैक्टर
जनसंख्या हमेशा से चीन की रणनीतिक ताकत रही है. राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने इसे “1.4 अरब लोगों से बनी स्टील की दीवार” कहा था. लेकिन 2023 में भारत ने चीन को पीछे छोड़कर दुनिया की सबसे बड़ी आबादी वाला देश बनने का तमगा हासिल कर लिया. अब जनसंख्या सिर्फ संख्या नहीं, बल्कि बाज़ार, कूटनीति, सैन्य योजना और ग्लोबल साउथ में नेतृत्व का भी सवाल है.
आगे क्या?
चीन के सामने कोई आसान समाधान नहीं है. जापान और दक्षिण कोरिया जैसे देश भी इसी संकट से जूझ रहे हैं, लेकिन चीन का पैमाना अभूतपूर्व है.
जनसंख्या गिरावट को रोकने के लिए चीन को:
- परिवार बसाना सस्ता बनाना होगा
- पेंशन और वेलफेयर सिस्टम सुधारना होगा
- वर्किंग पेरेंट्स पर दबाव घटाना होगा
- आर्थिक स्थिरता बनाए रखनी होगी
लेकिन जनसांख्यिकी विशेषज्ञ चेतावनी देते हैं कि एक बार जब फर्टिलिटी रेट एक सीमा से नीचे गिर जाता है, तो उसका वापस उठना बेहद मुश्किल होता है. जिस देश ने कभी हर हाल में जन्म रोकने की कोशिश की, आज वही देश एक नए और अप्रत्याशित सवाल से जूझ रहा है - ऐसे समाज में लोगों को बच्चे पैदा करने के लिए कैसे मनाया जाए, जो कम बच्चों का आदी हो चुका है?





