भारत में गाजियाबाद के हरीश राणा केस ने फिर से यूटेनेशिया (Euthanasia) पर बहस को हवा दे दी है. सुप्रीम कोर्ट द्वारा उनके केस में Passive Euthanasia की अनुमति मिलने के बाद, “Right to Die with Dignity” यानी गरिमा के साथ मरने के अधिकार पर देशभर में गंभीर चर्चा छिड़ गई है. लेकिन हरीश राणा अकेले नहीं हैं. भारत भर में कई परिवार- कुछ 5 साल से, कुछ दशकों से-असहनीय पीड़ा, कोमा या गंभीर बीमारी के कारण मेरसी किलिंग या यूटेनेशिया की अनुमति पाने के लिए संघर्ष कर रहे हैं. इन चार वास्तविक कहानियों में हम दिखाएंगे कि कैसे मरीज और उनके परिवार भावनात्मक, चिकित्सीय और आर्थिक संघर्षों से गुजर रहे हैं: