ढोल-दमाऊं की गूंज, डंगरिया में उतरते हैं देवता, उत्तराखंड की जागर परंपरा का रोमांच कर देगा हैरान
सदियों से पहाड़ों में लोग अपनी समस्याओं, दुखों और मनोकामनाओं को लेकर जागर लगाते आए हैं. जागर में लोकगायक विशेष धुनों, मंत्रों और वाद्ययंत्रों के माध्यम से देवी-देवताओं का आह्वान करते हैं.
क्या है उत्तराखंड के जागर का इतिहास
उत्तराखंड को देवभूमि कहा जाता है और इसकी पहचान सिर्फ बर्फीले पहाड़ों, नदियों और मंदिरों से ही नहीं, बल्कि यहां की अनोखी लोकपरंपराओं से भी जुड़ी हुई है. हिमालय की गोद में बसे इस राज्य में आज भी ऐसी कई प्राचीन मान्यताएं जीवित हैं, जो लोगों को सीधे आस्था और आध्यात्म से जोड़ती हैं. इन्हीं में से एक है जागर परंपरा, जिसे उत्तराखंड की आत्मा माना जाता है.
ढोल-दमाऊं की गूंज, हुड़के की थाप और लोकगाथाओं के बीच होने वाली जागर केवल एक अनुष्ठान नहीं, बल्कि देवताओं को पुकारने की सदियों पुरानी परंपरा है. मान्यता है कि जागर के दौरान देवता डंगरिया में अवतरित होकर लोगों की समस्याएं सुनते हैं और समाधान भी देते हैं. यही वजह है कि उत्तराखंड की यह रहस्यमयी परंपरा आज भी लोगों के लिए आस्था, रोमांच और संस्कृति का अद्भुत संगम बनी हुई है.
क्या होता है जागर?
“जागर” शब्द का अर्थ है जागृत करना. यानी देव शक्ति को जगाना और उनका आह्वान करना. यह अनुष्ठान आमतौर पर रात में होता है, जहां ढोल, दमाऊँ, हुड़का और डमरू जैसे पारंपरिक वाद्य बजाए जाते हैं. जागर के दौरान जगरिया लोकभाषा में देवताओं की गाथाएं गाता है. इन गीतों में रामायण, महाभारत, स्थानीय वीरों, राजाओं और लोकदेवताओं की कहानियां शामिल होती हैं. धीरे-धीरे वातावरण पूरी तरह भक्तिमय और रहस्यमयी हो जाता है.
कुमाऊं और गढ़वाल की अलग पहचान
उत्तराखंड के दोनों मंडलों कुमाऊं और गढ़वाल में जागर की अपनी अलग शैली देखने को मिलती है.
कुमाऊंनी जागर
कुमाऊं क्षेत्र में हुड़के की थाप सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण मानी जाती है. यहां गोलू देवता, गंगनाथ, हरज्यू और नंदा देवी जैसे लोकदेवताओं की जागर प्रसिद्ध है. कुमाऊंनी भाषा में गाई जाने वाली ये गाथाएं बेहद भावुक और मधुर होती हैं.
गढ़वाली जागर
गढ़वाल में ढोल और दमाऊं की गूंज जागर की पहचान होती है. यहां नरसिंह देवता, कालिका माता और स्थानीय ग्राम देवताओं की जागर लगाई जाती है. गढ़वाली जागर में वीरता और शक्ति का अलग ही रंग देखने को मिलता है.
जागर के तीन प्रमुख रूप
समय के साथ जागर की अलग-अलग शैलियां विकसित हुईं.
1. हुड़किया जागर
इसमें हुड़का मुख्य वाद्य होता है. इसकी लय मधुर और सम्मोहक होती है. कुमाऊँ में यह सबसे ज्यादा प्रचलित है.
2. डमरिया जागर
इसमें डमरू और थाली का प्रयोग होता है. यह अधिक शांत और ध्यानमय रूप माना जाता है.
3. ढोल जागर
इसमें ढोल और नगाड़ों की तेज थाप वातावरण को ऊर्जावान बना देती है. यह जागर सबसे रोमांचक और शक्तिशाली माना जाता है.
जागर के मुख्य पात्र
जागर कोई अकेला व्यक्ति नहीं करता. इसमें कई लोगों की भूमिका होती है.
जगरिया
यह जागर का मुख्य गायक होता है, जो देवताओं का आह्वान करता है और लोकगाथाएं सुनाता है.
डंगरिया
डंगरिया वह व्यक्ति होता है, जिसमें देवता का अवतरण माना जाता है. श्रद्धालु उसकी बात को देववाणी मानते हैं.
स्योंकार
जिस परिवार द्वारा जागर कराई जाती है, उन्हें स्योंकार कहा जाता है.
गाजे-बाजे वाले
ढोल, दमाऊं और अन्य वाद्य बजाने वाले लोग जागर की ऊर्जा को बढ़ाते हैं.
धूणी का महत्व
जागर में धूणी यानी पवित्र अग्नि का विशेष महत्व होता है. धूणी वाले स्थान को गोबर और गेरू से लीपकर पवित्र किया जाता है. वहां ऐपण कला बनाई जाती है और मंत्रों के साथ अग्नि प्रज्वलित की जाती है. मान्यता है कि यही धूणी देवताओं का आसन बनती है. जागर के दौरान यहां बेहद पवित्रता रखी जाती है.
जागर के सात चरण
जागर की प्रक्रिया कई चरणों में पूरी होती है.
- सांझवाली – यह जागर का पहला चरण होता है. इसमें जगरिया संध्या के समय देवी-देवताओं, प्रकृति और आसपास की दैवी शक्तियों का आह्वान करता है. इस चरण का उद्देश्य वातावरण को पवित्र और शांत बनाना होता है, ताकि जागर की शुरुआत शुभ तरीके से हो सके.
- बिरत्वाई – इस चरण में जिस देवता की जागर लगाई जा रही होती है, उसकी वीरता, शक्ति, पराक्रम और जीवन से जुड़ी गाथाएं गाई जाती हैं. ढोल-दमाऊँ की थाप के साथ देवताओं की कहानियां सुनाई जाती हैं, जिससे माहौल पूरी तरह भक्तिमय हो जाता है.
- औसाण – इसे जागर का सबसे महत्वपूर्ण और रहस्यमयी चरण माना जाता है. इस समय वाद्ययंत्रों की आवाज़ तेज हो जाती है और मान्यता है कि देवता डंगरिया के शरीर में अवतरित होते हैं. डंगरिया विशेष भाव-भंगिमाओं और नृत्य के जरिए देव उपस्थिति का संकेत देता है.
- गुरु आरती – देवता के अवतरण के बाद गुरु और परंपरा का सम्मान किया जाता है. इस दौरान गुरु, नाथ परंपरा और देवशक्ति की आरती की जाती है. यह चरण आध्यात्मिक परंपरा के प्रति श्रद्धा को दर्शाता है.
- खाक रमाना – इस चरण में धूणी की पवित्र राख यानी विभूति भक्तों को लगाई जाती है. मान्यता है कि यह विभूति सुरक्षा, शांति और देव आशीर्वाद का प्रतीक होती है. लोग इसे बेहद श्रद्धा से ग्रहण करते हैं.
- दाणी का विचार – यह जागर का मुख्य उद्देश्य माना जाता है. इसमें देवता यजमान की समस्या, दुख या संकट का कारण बताते हैं और उसका समाधान भी देते हैं. लोग अपनी परेशानियों के जवाब और मार्गदर्शन के लिए इस चरण का इंतजार करते हैं.
- आशीर्वाद और विदाई – जागर के अंतिम चरण में देवता उपस्थित लोगों को सुख, समृद्धि और रक्षा का आशीर्वाद देते हैं. इसके बाद विशेष पूजा और नृत्य के साथ देवता की विदाई की जाती है और जागर का समापन होता है.
जागर में पूजे जाने वाले प्रमुख देवता
उत्तराखंड की जागर परंपरा में कई लोकदेवताओं का विशेष महत्व माना जाता है. इन देवताओं को गांव, परिवार, प्रकृति और लोगों की रक्षा करने वाला माना जाता है. कुमाऊं क्षेत्र में गोलू देवता को न्याय का देवता कहा जाता है और लोग अपनी समस्याओं के समाधान के लिए उनसे प्रार्थना करते है. वहीं भूमिया देवता को गांव और भूमि का रक्षक माना जाता है. गंगनाथ देवता वीरता, प्रेम और बलिदान के प्रतीक माने जाते हैं, जबकि हरज्यू देवता परिवार और कुल की रक्षा करने वाले देवता माने जाते हैं.
इसके अलावा नरसिंह देवता को धर्म और शक्ति का रक्षक माना जाता है, जिनकी जागर में विशेष ऊर्जा और जोश देखने को मिलता है. वहीं नंदा देवी उत्तराखंड की सबसे प्रमुख लोकदेवी मानी जाती हैं, जिन्हें हिमालय की अधिष्ठात्री देवी कहा जाता है. जागर में इन सभी लोकदेवताओं का आह्वान कर सुख-समृद्धि, सुरक्षा और समस्याओं के समाधान की कामना की जाती है.
बैसी: जागर की सबसे कठिन साधना
बैसी जागर का सबसे कठिन और रहस्यमयी रूप माना जाता है. यह 22 दिनों तक चलने वाली साधना होती है. इसमें तपसी डंगरिया मंदिर में रहकर कठोर नियमों का पालन करते हैं.बैसी की अंतिम रात “स्यौरात” कहलाती है, जिसमें मशालों के साथ गांव की परिक्रमा की जाती है. ग्रामीण मानते हैं कि इससे गांव की रक्षा होती है.




