कौन थी सुरों की मल्लिका 'इलाहाबादी छप्पन छुरी'? घूंघट तले सजाती थी ऐसी महफिल कि लोग लुटा देते थे पूरी दौलत
जानकी बाई उर्फ ‘छप्पन छुरी’ भारतीय संगीत और तवायफ संस्कृति का ऐसा नाम थीं, जिनकी जिंदगी दर्द, संघर्ष और शोहरत से भरी रही. 56 चाकुओं के वार झेलने के बाद भी उन्होंने अपनी गायकी से पूरे हिंदुस्तान को दीवाना बना दिया था।
भारत में हमेशा से तवायफों का एक दौर रहा है. रसूलन बाई, जद्दनबाई और गौहरजान समेत कई अन्य. कुछ याद रहीं और कुछ का इतिहास के पन्नों पर नामों निशान भी मिट गया. इसमें एक सबसे मशहूर रहीं जानकी बाई उर्फ छप्पन छुरी. यह सुनकर तो आप सभी को किसी फिल्म का डायलॉग या कहावत जैसा लगा रहा होगा. लेकिन एक तवायफ को 'छप्पन छुरी' का नाम भला क्यों मिला. जानकी बाई पर दो किताबें लिखी गई है, जिनमें उनके जीवन का वर्णन है. एक किताब इलाहाबाद यूनिवर्सिटी की साहित्य प्रोफेसर नीलम सरन गौर ने लिखा है जिसका नाम है 'Requiem in Raga Janki'. उनके अलावा कपिल पांडे की किताब 'फूलसुंघी' में छप्पन छुरी की कई कहानियां है.
जानकी बाई का जन्म 1880 में बनारस में हुआ था. उनके पिता पहलवान सिंह ने अपनी प्रेमिका के लिए उन्हें और उनकी मां मनकी को छोड़ दिया था. मनकी जो अकेले अपनी बेटी जानकी का पालन पोषण कर रही थी. तभी मनकी को एक और झटका लगा. उनकी दोस्ती में उन्हें धोखा मिला और उन्हें इलाहाबाद के एक कोठे में बेच दिया गया. जानकी जब बड़ी होती गई तो उनका रुझान संगीत की तरफ हुआ. उन्हें शास्त्रीय संगीत में रुचि हुई और रिआज़ से खुद को संगीत की दुनिया में मांझना शुरू कर दिया. जब वह 12 साल की थी तब एक पुलिस कांस्टेबल रघुनंदन का दिल उनपर आ गया. 12 साल की मासूम जानकी को प्यार की समझ नहीं थी और उसने रघुनंदन प्यार को ठुकरा दिया. रघुनंदन को यह बात दिल पर जा लगी और उसने जानकी से जबरदस्ती संबंध बनाने की कोशिश की.
कैसे नाम पड़ा छप्पन छुरी
रघुनंदन जब संबंध बनाने में भी कामयाब न हो सका तो अंदर ही अंदर बदले की आग में जलने लगा. जानकी को इस बात की भनक भी न थी की प्यार को ठुकराने का अंजाम भी भुगतना पड़ेगा. रघुनंदन ने अपना बदला लेने के लिए जानकी पर चाक़ू से हमला किया. वह गुस्से में जानकी के शरीर पर वार करता रहा यहां तक की उनके चेहरे को भी नहीं छोड़ा. जानकी के खूबसूरत चेहरे के साथ-साथ शरीर पर 56 वार थे और यहीं से उनका नाम पड़ा 'छप्पन छुरी'.
घूंघट तले चेहरे का हर कोई दीवाना
इस दर्दनाक घटना से जानकी पूरी दुनिया के लिए छप्पन छुरी बन गई. उनकी गायकी में अदा थी जिसका हर कोई दीवाना हो जाता. हालांकि छप्पन छुरी ने अपना चेहरा किसी को भी दिखाना मुनासिब नहीं समझती थी. वह घूंघट तले महफिलें सजाती. उस दौर में ऐसे कई लोग थे जिन्होंने सिर्फ उनकी गायकी सुनकर एक तरफा प्यार में पागल थे. कहा जाता है जब लोग महफिलों में उन्हें सुनते थे हर कोई कहीं खो सा जाता था. लोगों को अपनी सुध बुध नहीं होती थी.
गौहरजान भी थी उनकी मुरीद
कपिल पांडे की किताब 'फूलसुंघी' में लिखा है कि जानकी बाई इतनी मशहूर तवायफ थी उनकी कद्रदान सबसे बड़ी मशहूर गौहरजान थी. यह भी कहा जाता है कि एक तरफ़ा प्यार में एक अमीर शख्स ने उनपर अपनी पूरी दौलत लूटा दी थी. वहीं किसी अमीरजादे ने अपनी सारी संपत्ति जानकी के नाम कर दी थी. वो भी बिना कभी उनका चेहरा देखे. वहीं 'फूलसुंघी' में जिक्र है कि छप्पन छुरी के चाहने वाले एक सख्स ने उनका घूंघट उठाकर उनका चेहरा देख लिया. उनके चेहरे पर वार देखकर वह विचलित हो उठा. उसने कहा कि इस खूबसूरत आवाज के पीछे इतना खतरनाक चेहरा है.
लेती थी इतनी फीस
जानकी अपनी गायकी के लिए मशहूर थी और कई महफिलों में गाने का हजार रूपये लेती थी. उस दौर का हजार लाखों के बारबार था. वह बड़े बड़े राजा महाराजा के दरबारों में गाना गाया करती थी. उन्होंने 'दीवान-ए जानकी' नाम की उर्दू कविताओं की एक किताब लिखी. जानकी कमर्शियल रूप से रिकॉर्ड की जाने वाली पहली भारतीय शास्त्रीय महिला गायिकाओं में से एक थी. वह हिंदी, उर्दू और अंग्रेजी भाषा जानती थी. उनकी गानों की रिकॉर्डिंग्स में पूर्वी उत्तर प्रदेश का खास स्वाद मिलता है. उनमें ज्यादातर भजन, कजरी, चैती जैसे अर्ध-शास्त्रीय गीत होते थे. कहा जाता है कि उनके कई रिकॉर्ड्स की 25,000 से ज्यादा कॉपी बिक गईं. यह बात उनके सबसे अच्छे समकालीन गायकों के लिए भी बहुत अनोखी और हैरान करने वाली थी.
जब भरे दरबार में महाराजा की नहीं मानी बात
एक बार जानकी बाई मध्य प्रदेश के रीवा रियासत के महाराजा के दरबार में महफ़िल सजाने पहुंची. महाराज यह नहीं जानते थे कि मशहूर जानकी बाई अपना चेहरा छुपाती है. इसलिए जानकी ने अपनी शर्तों पर पर्दे के पीछे और घूंघट में गाना चाहा. लेकिन महाराज को यह मंजूर नहीं था. जानकी बाई को महाराज के सामने और बिना घूंघट के गाना गाने को कहा गया. वह नहीं मानी उन्हें महाराजा के गुस्से का वास्ता दिया गया. तब जानकी बाई ने कहा, 'मैं महाराजा का गुस्सा मंजूर करुंगी और महफ़िल को यहीं खत्म कर दूंगी.' जानकी बाई की जिद्द और उसूलों के चलते लोगों को पीछे हटना पड़ा. जानकी बाई ने पर्दे के पीछे ही अपने सुरों से महफ़िल को गुलजार किया. महाराजा खुश हुए. तभी उन्हें जानकी बाई के चेहरे को छुपाने की असल वजह भी बताई गई कि उनके चेहरे और शरीर पर चाकू से 56 वार है. यह सुनकर महाराजा का दिल पसीज गया. महाराजा कला के पारखी तो थे ही उन्होंने जानकी का दर्द भी समझा. उन्होंने जानकी को उनकी गायकी की कीमत से बहुत ज्यादा दिया. उन्होंने सम्मान के साथ उन्हें कई उपहार तक दिए.
शादी में भी मिला धोखा
जानकी बाई उर्फ़ छप्पन छुरी के जीवन में घर बसाने का भी मौका आया, जिसका सपना हर औरत देखती है. जानकी ने इलाहाबद के एक वकील शेख अब्दुल से शादी रचाई. लेकिन यह शादी ज्यादा दिल चल नहीं पाई. कहते है इस शादी में भी उन्हें धोखा मिला जिससे वह टूट गई और खुद को समाज सेवा में झोंक दिया. उन्होंने अपने नाम पर धर्माथ ट्रस्ट नाम की स्थापना की. उन्होंने जरूरतमंद छात्रों को वित्तीय मदद करना शुरू कर दिया. वह इलाहाबद में कई गरीबों का सहारा बनीं. वह मस्जिदों में दान करती तो वह मंदिरों में भी अपनी सेवा देती. 18 मई 1934 में उनका निधन हो गया. इलाहाबाद के आदर्श नगर कालाडांडा कब्रिस्तान में उनकी कब्र मौजूद है, लेकिन बदहाल अवस्था में.




