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CM धामी ने बिछाई 2027 चुनाव की बिसात, कैबिनेट विस्तार से ऐसे साधे पहाड़-मैदान के वोट, क्या है जीत का नया प्लान

2027 के विधानसभा चुनाव से पहले पुष्कर सिंह धामी का कैबिनेट विस्तार कई बड़े राजनीतिक संकेत दे रहा है. यह कदम सिर्फ मंत्रियों के बदलाव तक सीमित नहीं, बल्कि पहाड़ और मैदान के बीच संतुलन बनाकर अलग-अलग वोट बैंक को साधने की सोची-समझी रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है.

pushkar singh dhami
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( Image Source:  ANI )
हेमा पंत
Edited By: हेमा पंत4 Mins Read

Updated on: 20 March 2026 1:15 PM IST

2027 के विधानसभा चुनाव से पहले उत्तराखंड की राजनीति में हलचल तेज हो गई है और पुष्कर सिंह धामी का हालिया कैबिनेट विस्तार कई बड़े संकेत दे रहा है. सतह पर यह एक सामान्य राजनीतिक कदम नजर आता है, लेकिन इसके पीछे छिपी रणनीति कहीं ज्यादा गहरी मानी जा रही है. खास बात यह है कि इस बार फैसले सिर्फ चेहरों के बदलाव तक सीमित नहीं हैं, बल्कि एक बड़े चुनावी समीकरण को साधने की कोशिश साफ दिख रही है.

पहाड़ और मैदान के बीच संतुलन, नए और पुराने चेहरों का मिश्रण और अलग-अलग वर्गों को संदेश देने की चाल, इन सभी पहलुओं को जोड़कर देखा जाए तो तस्वीर कुछ और ही कहानी बयां करती है. आखिर इस विस्तार के जरिए कौन-सा नया प्लान तैयार किया गया है और कैसे यह 2027 के चुनाव में गेम बदल सकता है, यही सवाल अब राजनीतिक गलियारों में सबसे ज्यादा चर्चा में है.

किन चेहरों को मिली जगह और क्या है संदेश

इस कैबिनेट विस्तार में खजान दास, भरत चौधरी, राम सिंह कैड़ा, मदन कौशिक और प्रदीप बत्रा को मंत्री बनाया गया है. खजान दास को देहरादून (राजपुर) क्षेत्र से शामिल कर शहरी और संगठनात्मक पकड़ मजबूत करने का प्रयास किया गया है. राम सिंह कैड़ा को नैनीताल क्षेत्र से मौका देकर कुमाऊं में नया चेहरा आगे लाया गया है. भरत चौधरी को रुद्रप्रयाग से शामिल कर लंबे समय से उपेक्षित पहाड़ी जिलों को प्रतिनिधित्व देने की कोशिश की गई है. वहीं मदन कौशिक और प्रदीप बत्रा को हरिद्वार से मंत्री बनाकर मैदान क्षेत्र, खासतौर पर व्यापारी और पंजाबी समाज को साधने की रणनीति अपनाई गई है. यह साफ दिखाता है कि हर चयन के पीछे एक स्पष्ट राजनीतिक गणित काम कर रहा है.

क्या है गढ़वाल बनाम कुमाऊं की सियासत

उत्तराखंड की राजनीति में गढ़वाल और कुमाऊं का संतुलन बेहद अहम माना जाता है. इस विस्तार में दोनों मंडलों को साधने की कोशिश की गई है. कुमाऊं से पहले ही मुख्यमंत्री का चेहरा होने के कारण वहां संतुलन बनाए रखते हुए सीमित लेकिन रणनीतिक प्रतिनिधित्व दिया गया. वहीं गढ़वाल में देहरादून और हरिद्वार जैसे अहम जिलों को मजबूत हिस्सेदारी देकर बड़ा संदेश दिया गया है. खास बात यह है कि हरिद्वार, जो अब तक कैबिनेट में उपेक्षित था, उसे एक साथ दो मंत्री देकर चुनावी दृष्टि से अहम बना दिया गया है.

धामी सरकार का क्या है जातीय समीकरण?

इस विस्तार में ठाकुर, ब्राह्मण, अनुसूचित जाति और पंजाबी समाज को प्रतिनिधित्व देकर सामाजिक समीकरणों को संतुलित करने की कोशिश की गई है. उत्तराखंड की राजनीति में जातीय संतुलन का बड़ा प्रभाव रहता है, और इसी को ध्यान में रखते हुए अलग-अलग वर्गों को साधने का प्रयास किया गया है. इससे सरकार का उद्देश्य साफ है कि हर वर्ग को प्रतिनिधित्व देकर विरोध की संभावनाओं को कम करना और एक व्यापक वोट बैंक तैयार करना.

2027 के लिए धामी सरकार का चुनावी ब्लूप्रिंट

यह कैबिनेट विस्तार दरअसल 2027 के चुनाव का ट्रेलर है. नए चेहरों के जरिए एंटी-इंकम्बेंसी कम करना, क्षेत्रीय असंतोष को दूर करना और हर वर्ग को प्रतिनिधित्व देना, ये तीनों इस रणनीति के मुख्य आधार हैं. अगर सरकार इन मंत्रियों के जरिए जमीनी स्तर पर काम को तेज करती है और जनता से जुड़ाव बढ़ाती है, तो इसका सीधा फायदा चुनाव में मिल सकता है. कुल मिलाकर, यह विस्तार एक मजबूत मैसेज देता है कि धामी सरकार सत्ता में वापसी के लिए पूरी तरह तैयार है और उसने अपनी राजनीतिक चालें चलनी शुरू कर दी हैं.

उत्तराखंड न्‍यूज
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