विद्यासागर सोनकर कौन हैं? UP चुनाव से पहले BJP ने खेला SC कार्ड, क्यों जताया भरोसा
विद्यासागर सोनकर कौन हैं? बीजेपी ने राज्यसभा के लिए उन्हें क्यों चुना? जानिए उनकी राजनीतिक यात्रा, खटीक समाज से जुड़ाव और यूपी चुनाव से पहले इस फैसले के सियासी मायने.
उत्तर प्रदेश में 2027 की सत्ता की लड़ाई से पहले बीजेपी ने राज्यसभा के टिकटों के जरिए सियासी बिसात पर नए मोहरे नहीं, बल्कि खास संदेश देने वाले चेहरे उतारे हैं. विद्यासागर सोनकर को उम्मीदवार बनाना इसी रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है. सवाल सिर्फ इतना नहीं कि सोनकर संसद के राज्यसभा में पहुंचेंगे या नहीं. असली सवाल यह है कि बीजेपी उनके जरिए किस जातीय समीकरण को साधना चाहती है और विपक्ष के पीडीए दांव का जवाब कैसे देना चाहती है. पूर्वांचल से आने वाले सोनकर का लंबा संगठनात्मक अनुभव अब पार्टी की चुनावी रणनीति में कितना असर डालेगा, नजर इसी पर है.
करीब चार दशक के राजनीतिक अनुभव वाले सोनकर को राज्यसभा का टिकट देकर बीजेपी ने क्या संदेश दिया है? उनकी जाति, पूर्वांचल में पकड़ और संगठन में भूमिका इस फैसले को समझने के अहम पहलू हैं.
1. विद्यासागर सोनकर का राजनीतिक सफर क्या?
विद्यासागर सोनकर का जन्म 21 जुलाई 1961 को जौनपुर में हुआ. उत्तर प्रदेश विधान परिषद की वेबसाइट के अनुसार, उन्होंने एमए, बीएड और एलएलबी की पढ़ाई की है. वह एडवोकेट, किसान और सोशल वर्कर भी हैं.
सोनकर की राजनीतिक शुरुआत 1985 में बीजेपी के बूथ अध्यक्ष के रूप में हुई. 1989 में वह जौनपुर में सभासद चुने गए. 1996 में उन्होंने सैदपुर लोकसभा सीट से चुनाव जीतकर संसद में प्रवेश किया. यह सीट अब मछलीशहर संसदीय क्षेत्र के रूप में जानी जाती है.
साल 2000 में वह बीजेपी के जिलाध्यक्ष बने. इसके बाद उन्होंने पार्टी के अनुसूचित जाति मोर्चे के प्रदेश अध्यक्ष और संगठन में कई अन्य जिम्मेदारियां संभालीं. वह विधान परिषद सदस्य भी रह चुके हैं. 2009 के लोकसभा और 2017 के विधानसभा चुनाव में उन्हें हार मिली, लेकिन संगठन में उनकी सक्रियता बनी रही.
2. सोनकर किस जाति से आते हैं?
विद्यासागर सोनकर खटीक समुदाय से आते हैं, जिसे उत्तर प्रदेश में अनुसूचित जाति हैं. बीजेपी के राज्यसभा उम्मीदवारों के सामाजिक समीकरणों पर प्रकाशित रिपोर्टों में भी उन्हें खटीक समुदाय का नेता बताया गया है.
उत्तर प्रदेश में अनुसूचित जातियों की आबादी 2011 की जनगणना के अनुसार करीब 20.7 प्रतिशत थी. राजनीतिक दृष्टि से सोनकर की पहचान केवल जाति तक सीमित नहीं है. चार दशक से अधिक समय तक संगठन में काम करने, अनुसूचित जाति मोर्चे की जिम्मेदारी संभालने और पूर्वांचल में सक्रिय रहने से उन्हें पार्टी के सामाजिक प्रतिनिधित्व की रणनीति में जगह मिलती है.
सोनकर का सबसे ज्यादा असर जौनपुर और उसके आसपास के क्षेत्रों में है. उनकी पकड़ जौनपुर की बदलापुर, शाहगंज, जौनपुर, मल्हनी और मुंगरा बादशाहपुर समेत आसपास के अन्य सीटों पर भी है. विद्यासागर सोनकर 1996 में सैदपुर लोकसभा सीट से सांसद चुने गए थे.
3. सोनकर का किन क्षेत्रों में प्रभाव है?
विद्यासागर सोनकर की राजनीतिक और संगठनात्मक सक्रियता का प्रमुख क्षेत्र पूर्वांचल रहा है. जौनपुर उनका गृह जिला है और सैदपुर से सांसद चुने जाने के कारण गाजीपुर क्षेत्र से भी उनका राजनीतिक जुड़ाव रहा है. इसके अलावा वह बीजेपी के काशी और गोरखपुर क्षेत्र के संगठन में जिम्मेदारियां संभाल चुके हैं.
बीजेपी के लिए ऐसे नेताओं का महत्व इसलिए होता है क्योंकि वे केवल चुनाव लड़ने तक सीमित नहीं रहते, बल्कि कार्यकर्ताओं, बूथ स्तर के संगठन और सामाजिक समूहों के बीच संपर्क बनाए रखने में भी भूमिका निभाते हैं.
4. बीजेपी ने सोनकर को टिकट क्यों दिया?
बीजेपी ने अक्टूबर 2026 में उत्तर प्रदेश की राज्यसभा सीटों के लिए आठ उम्मीदवार घोषित किए. इस सूची में सोनकर को शामिल करना सामाजिक प्रतिनिधित्व और संगठनात्मक अनुभव, दोनों के लिहाज से महत्वपूर्ण है. पार्टी की सूची में तीन अन्य पिछड़ा वर्ग के उम्मीदवारों के साथ दो दलित चेहरे भी शामिल हैं.
सियासी लिहाज से यह फैसला 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले सामाजिक समीकरणों को मजबूत करने की कोशिश के रूप में देखा जा सकता है. समाजवादी पार्टी के पीडीए यानी पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक प्रतिनिधित्व के राजनीतिक अभियान के बीच बीजेपी भी अलग-अलग सामाजिक समूहों को प्रतिनिधित्व देने पर जोर देती दिख रही है. हालांकि, सोनकर को टिकट देने के पीछे पार्टी ने कोई एक विशिष्ट कारण सार्वजनिक रूप से घोषित नहीं किया है.
सोनकर का लंबा संगठनात्मक अनुभव भी उनके पक्ष में जाता है. वह बूथ स्तर से लेकर प्रदेश संगठन तक काम कर चुके हैं. ऐसे नेता को राज्यसभा भेजने का फैसला पार्टी के पुराने कार्यकर्ताओं को महत्व देने का संदेश भी दे सकता है.
5. सोनकर की उम्मीदवारी से क्या संदेश?
विद्यासागर सोनकर की उम्मीदवारी को केवल एक नेता के राजनीतिक पुनर्वास के रूप में देखना अधूरा होगा. यह बीजेपी की उस व्यापक रणनीति का हिस्सा भी हो सकती है, जिसमें सामाजिक प्रतिनिधित्व, क्षेत्रीय संतुलन और संगठन के अनुभवी चेहरों को साथ रखा जाता है.
सोनकर का पूर्वांचल से जुड़ाव, अनुसूचित जाति मोर्चे में काम और लंबे समय का संगठनात्मक अनुभव उन्हें इस समीकरण में महत्वपूर्ण बनाते हैं. लेकिन उनकी उम्मीदवारी से कितनी विधानसभा सीटों पर चुनावी असर पड़ेगा, यह अभी निश्चित रूप से नहीं कहा जा सकता. उसका आकलन करने के लिए समुदाय की वास्तविक आबादी, स्थानीय संगठन की स्थिति और आगामी चुनावों के क्षेत्रवार परिणामों को देखना होगा.
राज्यसभा का टिकट सोनकर को राष्ट्रीय राजनीति में बड़ी भूमिका निभाने का अवसर देता है. बीजेपी के लिए यह फैसला सामाजिक प्रतिनिधित्व और संगठन के पुराने चेहरों को आगे लाने के बीच संतुलन बनाने की कोशिश के रूप में समझा जा सकता है.




