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प्रियंका गांधी के इशारे पर चल रही UP कांग्रेस? आराधना मिश्रा से इमरान मसूद तक, एक तीर से 5 निशाने

यूपी कांग्रेस की नई टीम में आराधना मिश्रा, इमरान मसूद समेत चार बड़े चेहरों को जिम्मेदारी मिली है. क्या प्रियंका गांधी की रणनीति से 2027 के पांच समीकरण साधे गए?

Priyanka Gandhi UP Congress Aradhana Mishra Imran Masood
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2022 के यूपी विधानसभा चुनाव में प्रियंका गांधी ने कांग्रेस की राजनीति को एक अलग नारा दिया था- ‘लड़की हूं, लड़ सकती हूं.’ महिलाओं को राजनीति के केंद्र में लाने के लिए कांग्रेस ने 40 फीसदी टिकट महिलाओं को देने का ऐलान किया था. चुनावी नतीजे कांग्रेस के पक्ष में नहीं रहे, लेकिन यूपी में 'प्रियंका' की राजनीति की एक अलग पहचान बनी.

अब 2027 विधानसभा चुनाव से पहले कांग्रेस ने आराधना मिश्रा ‘मोना’ को प्रदेश अध्यक्ष, सहारनपुर सांसद इमरान मसूद को कार्यकारी अध्यक्ष और देविंदर निषाद व आलोक प्रसाद को वरिष्ठ उपाध्यक्ष बनाया है. नई टीम में महिला, ब्राह्मण, मुस्लिम, ओबीसी और दलित प्रतिनिधित्व को जगह मिली है. इसे कांग्रेस की संगठनात्मक रणनीति के साथ 2027 की सोशल इंजीनियरिंग माना जा रहा है.

लड़की हूं लड़ सकती हूं

क्या प्रियंका की रणनीति फिर दिखाई दे रही?

आराधना मिश्रा को प्रदेश अध्यक्ष और इमरान मसूद को कार्यकारी अध्यक्ष बनाने के फैसले को सीधे प्रियंका गांधी का निर्देश कहना उचित नहीं होगा, क्योंकि पार्टी ने ऐसा कोई आधिकारिक दावा नहीं किया है. लेकिन नई टीम की संरचना में प्रियंका के पुराने यूपी प्रयोग की कुछ समानताएं जरूर दिखती हैं. 2022 में उन्होंने महिला राजनीतिक भागीदारी को कांग्रेस के अभियान का केंद्रीय मुद्दा बनाया था. अब 2026 में पार्टी ने महिला और ब्राह्मण चेहरे आराधना मिश्रा को प्रदेश संगठन की कमान दी है, जबकि मुस्लिम, ओबीसी और दलित प्रतिनिधित्व के लिए इमरान मसूद, देविंदर निषाद और आलोक प्रसाद को अहम जिम्मेदारियां दी गई हैं.

Credit: ANI

कौन हैं आराधना मिश्रा ‘मोना’?

आराधना मिश्रा ‘मोना’ कांग्रेस के वरिष्ठ नेता प्रमोद तिवारी की बेटी हैं और रामपुर खास उनका मजबूत राजनीतिक आधार रहा है. उन्होंने 2014 के उपचुनाव में पहली बार विधानसभा चुनाव जीता. इसके बाद 2017 और 2022 में भी रामपुर खास सीट बरकरार रखी. 2022 में उन्होंने बीजेपी उम्मीदवार को 14,741 वोटों से हराया था. अब प्रदेश अध्यक्ष बनने के बाद उनके सामने सिर्फ अपने क्षेत्र की राजनीतिक पकड़ बनाए रखने की चुनौती नहीं है, बल्कि पूरे उत्तर प्रदेश में कांग्रेस के संगठन को सक्रिय करने की जिम्मेदारी भी है.

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प्रमोद तिवारी से क्या है कनेक्शन?

आराधना मिश्रा की राजनीति को उनके पिता प्रमोद तिवारी की लंबी राजनीतिक विरासत से अलग करके देखना मुश्किल है. प्रमोद तिवारी रामपुर खास से 1980 से 2012 तक लगातार नौ बार विधायक रहे. 2014 में उनके राज्यसभा जाने के बाद हुए उपचुनाव में आराधना मिश्रा ने कांग्रेस के टिकट पर जीत दर्ज की. इसके बाद 2017 और 2022 में भी उन्होंने सीट जीती. इस तरह रामपुर खास कांग्रेस और तिवारी परिवार का पुराना राजनीतिक केंद्र बना रहा. अब इसी क्षेत्र से लगातार जीत दर्ज करने वाली आराधना मिश्रा को प्रदेश संगठन की कमान दी गई है.

इमरान मसूद की क्या है सियासी विरासत?

इमरान मसूद पश्चिमी उत्तर प्रदेश की राजनीति में लंबे समय से सक्रिय हैं. वह 2007 में मुजफ्फराबाद विधानसभा सीट से विधायक चुने गए थे. इसके बाद 2012 में नकुड़ विधानसभा चुनाव, 2014 में सहारनपुर लोकसभा चुनाव, 2017 में नकुड़ विधानसभा चुनाव और 2019 में सहारनपुर लोकसभा चुनाव में उन्हें हार का सामना करना पड़ा. 2024 में कांग्रेस के टिकट पर उन्होंने सहारनपुर लोकसभा सीट जीती. उन्होंने बीजेपी के राघव लखनपाल को 64,542 वोटों से हराया. अब प्रदेश संगठन में उनकी भूमिका वेस्ट यूपी की राजनीति से आगे बढ़कर राज्य स्तर पर होगी.

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मुस्लिम मतदाताओं में कितनी पकड़?

इमरान मसूद की राजनीतिक पहचान सहारनपुर और वेस्ट यूपी के मुस्लिम राजनीतिक प्रतिनिधित्व से जुड़ी रही है. वह काजी रशीद मसूद (Rasheed Masood) के भतीजे हैं. रशीद मसूद सहारनपुर (गंगोह) के एक बेहद कद्दावर मुस्लिम नेता थे. वह अपने राजनीतिक जीवन में 5 बार लोकसभा और 4 बार राज्यसभा के सदस्य चुने गए. उन्होंने सहारनपुर लोकसभा सीट का कई बार प्रतिनिधित्व किया. इमरान मसूद की 2024 में सहारनपुर लोकसभा सीट पर उनकी जीत ने कांग्रेस को पश्चिमी यूपी में महत्वपूर्ण आधार दिया.

हालांकि, किसी एक नेता की जीत को पूरे मुस्लिम समुदाय की राजनीतिक पसंद का प्रमाण नहीं माना जा सकता. इमरान मसूद को प्रदेश संगठन में महत्वपूर्ण पद मिलने से कांग्रेस ने मुस्लिम प्रतिनिधित्व को अपने शीर्ष संगठनात्मक ढांचे में जगह दी है. अब चुनौती यह होगी कि वह अपने क्षेत्रीय प्रभाव को प्रदेश स्तर के संगठन में किस तरह इस्तेमाल करते हैं.

इसका अलावा, मौलाना अबुल कलाम आजाद, मोहसिना किदवई, हसरत मोहानी, राशिद अल्वी और सलमान खुर्शीद के बाद अब इमरान मसूद यूपी में कांग्रेस के सबसे बड़े चेहरे माने जाते हैं.

देविंदर निषाद से क्या ओबीसी संदेश?

देविंदर निषाद को वरिष्ठ उपाध्यक्ष बनाए जाने से कांग्रेस की नई टीम में निषाद और व्यापक ओबीसी प्रतिनिधित्व का पहलू जुड़ता है. उत्तर प्रदेश में ओबीसी कोई एकरूप राजनीतिक समूह नहीं है. इसमें कई जातियां और अलग-अलग क्षेत्रीय राजनीतिक प्राथमिकताएं शामिल हैं. इसलिए एक निषाद चेहरे को जिम्मेदारी देने को पूरे ओबीसी समाज के समर्थन का संकेत नहीं माना जा सकता. फिर भी संगठन में देविंदर निषाद को महत्वपूर्ण जिम्मेदारी देना कांग्रेस के सामाजिक विस्तार की कोशिश के तौर पर देखा जा सकता है, खासकर पूर्वांचल में जहां निषाद समुदाय कई विधानसभा सीटों के समीकरण में महत्वपूर्ण भूमिका रखता है.

आलोक प्रसाद से क्या दलित संदेश?

आलोक प्रसाद को वरिष्ठ उपाध्यक्ष बनाकर कांग्रेस ने दलित प्रतिनिधित्व को भी नई प्रदेश टीम में प्रमुख स्थान दिया है. उत्तर प्रदेश की राजनीति में दलित मतदाता लंबे समय से महत्वपूर्ण भूमिका निभाते रहे हैं और अलग-अलग राजनीतिक दल इस सामाजिक आधार तक पहुंच बनाने की कोशिश करते रहे हैं. कांग्रेस के लिए चुनौती सिर्फ संगठन में दलित चेहरे को जगह देने की नहीं, बल्कि इस प्रतिनिधित्व को जिला, ब्लॉक और बूथ स्तर के संगठन से जोड़ने की भी है. आलोक प्रसाद की जिम्मेदारी इसी लिहाज से महत्वपूर्ण हो सकती है कि पार्टी अपने संगठन को दलित मतदाताओं के बीच कितना सक्रिय कर पाती है.

क्या महिला कार्ड फिर प्रियंका की राजनीति के केंद्र में?

यहां प्रियंका गांधी की 2022 की राजनीति का सीधा संदर्भ सामने आता है. ‘लड़की हूं, लड़ सकती हूं’ अभियान के दौरान कांग्रेस ने महिलाओं को 40 फीसदी टिकट देने की घोषणा की थी. उस चुनाव में कांग्रेस ने बड़ी संख्या में महिला उम्मीदवार उतारे, लेकिन आराधना मिश्रा ‘मोना’ ही पार्टी की एकमात्र महिला विधायक बनीं. अब चार साल बाद उसी आराधना मिश्रा को प्रदेश अध्यक्ष बनाना महिला नेतृत्व को संगठन के शीर्ष स्तर पर लाने का कदम है. फर्क यह है कि 2022 में महिला प्रतिनिधित्व को टिकट वितरण के जरिए आगे रखा गया था, जबकि अब एक महिला को प्रदेश संगठन की कमान दी गई है.

एक तीर से 5 निशाने क्या?

राजनीति नजरिए से देखें तो यह "एक तीर से पांच निशाने" है. यूपी ​की राजनीति के हिसाब से इसका मतलब है एक ही कदम या योजना से पांच अलग-अलग लक्ष्यों या समस्याओं को एक साथ हल करना. उदाहरण के लिए, उत्तर प्रदेश की राजनीति में किसी ऐसी सोशल इंजीनियरिंग या गठबंधन नीति को अपनाना जो एक साथ ओबीसी, दलित, मुस्लिम, ब्राह्मण और युवा वोट बैंक को साध ले.

लड़की हूं लड़ सकती हूं

1. क्या ब्राह्मण समीकरण साधा?

आराधना मिश्रा ‘मोना’ को प्रदेश अध्यक्ष बनाना कांग्रेस के लिए ब्राह्मण प्रतिनिधित्व का बड़ा संकेत है. रामपुर खास से लगातार चुनाव जीतती आ रही आराधना मिश्रा की अपनी क्षेत्रीय पकड़ है और वह वरिष्ठ कांग्रेस नेता प्रमोद तिवारी की बेटी हैं. रीता बहुगुणा जोशी के बाद वह यूपी कांग्रेस की प्रदेश अध्यक्ष बनने वाली दूसरी महिला हैं. ऐसे में कांग्रेस ने एक साथ महिला और ब्राह्मण, दोनों सामाजिक समीकरणों को साधने की कोशिश की है. सवाल यह है कि क्या यह चेहरा 2027 में कांग्रेस के पुराने ब्राह्मण आधार को फिर सक्रिय कर पाएगा?

2. क्या मुस्लिम आधार मजबूत?

सहारनपुर सांसद इमरान मसूद को कार्यकारी अध्यक्ष बनाकर कांग्रेस ने पश्चिमी उत्तर प्रदेश के मुस्लिम मतदाताओं के बीच अपनी राजनीतिक पहुंच मजबूत करने का संकेत दिया है. मसूद लंबे समय से सहारनपुर की राजनीति में सक्रिय हैं और मुस्लिम मतदाताओं के बीच उनकी पहचान मजबूत मानी जाती है. कांग्रेस के लिए यह इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि पश्चिमी यूपी में मुस्लिम वोट कई सीटों पर चुनावी समीकरण को प्रभावित करता है. ऐसे में इमरान मसूद को संगठन में अहम जिम्मेदारी देकर कांग्रेस क्या अपने पुराने मुस्लिम आधार को दोबारा मजबूत करने की तैयारी कर रही है?

3. क्या निषाद कार्ड चला?

देवेंद्र निषाद को वरिष्ठ उपाध्यक्ष बनाए जाने के पीछे पूर्वांचल के निषाद और व्यापक ओबीसी सामाजिक समीकरण को साधने का प्रयास देखा जा सकता है. उत्तर प्रदेश की राजनीति में गैर-यादव ओबीसी मतदाताओं की भूमिका लगातार महत्वपूर्ण रही है. निषाद समुदाय को संगठन में प्रमुख प्रतिनिधित्व देकर कांग्रेस पूर्वांचल की उन सीटों पर अपनी राजनीतिक मौजूदगी बढ़ाना चाहती है, जहां सामाजिक समीकरण चुनावी परिणाम को प्रभावित करते हैं. सवाल यह है कि क्या देवेंद्र निषाद की संगठनात्मक भूमिका कांग्रेस को जमीन पर निषाद और अन्य पिछड़े वर्गों तक पहुंच बनाने में मदद करेगी?

4. क्या दलित दांव मजबूत?

आलोक प्रसाद को वरिष्ठ उपाध्यक्ष बनाकर कांग्रेस ने दलित प्रतिनिधित्व को भी नई प्रदेश टीम में प्रमुख स्थान दिया है. कांग्रेस लंबे समय से उत्तर प्रदेश में अपने पारंपरिक दलित आधार को फिर से मजबूत करने की कोशिश करती रही है. ऐसे समय में संगठन में दलित चेहरे को महत्वपूर्ण जिम्मेदारी देना सामाजिक संतुलन का संकेत माना जा सकता है. खासकर ऐसे राज्य में जहां दलित मतदाता चुनावी राजनीति का बड़ा हिस्सा हैं, कांग्रेस के लिए यह समीकरण महत्वपूर्ण है. सवाल यह है कि क्या आलोक प्रसाद संगठन को दलित बस्तियों और जमीनी कार्यकर्ताओं तक फिर पहुंचा पाएंगे?

5. क्या अखिलेश से तालमेल?

नई प्रदेश टीम का सामाजिक संयोजन समाजवादी पार्टी के पीडीए यानी पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक समीकरण से कई स्तरों पर जुड़ता दिखाई देता है. ब्राह्मण, मुस्लिम, निषाद और दलित प्रतिनिधित्व के जरिए कांग्रेस ने अपनी अलग सामाजिक पहचान मजबूत करने की कोशिश की है. साथ ही आराधना मिश्रा और इमरान मसूद जैसे चेहरों के जरिए पार्टी सपा के साथ सीट बंटवारे में अपनी राजनीतिक जमीन और दावेदारी मजबूत करना चाह सकती है. सवाल यह है कि क्या यह संगठनात्मक बदलाव कांग्रेस को अखिलेश यादव के साथ बेहतर तालमेल और सीटों पर अधिक प्रभावी बातचीत की स्थिति में पहुंचाएगा?

स्टेट मिरर स्पेशल
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