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80 बचावकर्मी 90 मिनट तक देखते रहे युवराज की मौत का तमाशा, नोएडा हादसे ने उघाड़ी सिस्टम की नाकामी

नोएडा में 27 वर्षीय युवराज मेहता डेढ़ घंटे तक मदद के लिए चिल्लाता रहा, लेकिन 80 रेस्क्यूकर्मियों की मौजूदगी के बावजूद उसे बचाया नहीं जा सका. यह हादसा अब सिर्फ दुर्घटना नहीं, बल्कि पूरे सिस्टम की “Institutional Failure” का प्रतीक बन गया है.

80 बचावकर्मी 90 मिनट तक देखते रहे युवराज की मौत का तमाशा, नोएडा हादसे ने उघाड़ी सिस्टम की नाकामी
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सागर द्विवेदी
By: सागर द्विवेदी

Updated on: 25 Jan 2026 7:46 AM IST

नोएडा के सेक्टर-150 में 16 जनवरी की रात जो हुआ, वह सिर्फ एक हादसा नहीं बल्कि पूरे इमरजेंसी रेस्पॉन्स सिस्टम पर एक गंभीर सवाल है. 27 वर्षीय सॉफ्टवेयर इंजीनियर युवराज मेहता अपनी कार के साथ पानी से भरी एक गहरी खाई में फंस गया. वह मदद के लिए चिल्लाता रहा, मोबाइल की फ्लैशलाइट जलाकर इशारे करता रहा, लेकिन करीब डेढ़ घंटे तक चले इस संघर्ष के बाद उसकी आवाज़ हमेशा के लिए खामोश हो गई.

सबसे चौंकाने वाली बात यह रही कि मौके पर पुलिस, फायर ब्रिगेड, SDRF और अंत में NDRF समेत करीब 80 लोग मौजूद थे. फिर भी युवराज को बचाया नहीं जा सका. उसके पिता राज मेहता ने बाद में इसे “संस्थागत विफलता (Institutional Failure)” करार दिया. एक ऐसा सिस्टम जो मौजूद तो था, लेकिन काम नहीं कर पाया.

'यह हादसा नहीं, संस्थागत पतन है'

पूर्व यूपी डीजीपी विक्रम सिंह ने इस घटना को “institutional collapse” बताया. उन्होंने कहा कि 'इतने सारे लोग मौजूद थे, लेकिन कोई भी पीड़ित को बचा नहीं सका. यह कौशल, उपकरण और साहस तीनों की कमी को दिखाता है.' बताया गया कि युवराज को तैरना नहीं आता था, लेकिन वह रात करीब 1:30 बजे तक किसी तरह खुद को पानी पर संभाले रहा. घना कोहरा और ठंड के बीच वह लगातार मदद की गुहार लगाता रहा, लेकिन कोई भी उसे निकालने के लिए पानी में नहीं उतरा.

50 मीटर की दूरी और मौत का फासला

हादसे की जगह से युवराज की दूरी अधिकतम 50 मीटर थी. एक डिलीवरी बॉय ने हिम्मत दिखाते हुए ठंडे पानी में छलांग लगाई और तैरकर युवराज तक पहुंचने की कोशिश की, लेकिन आधिकारिक बचावकर्मियों में से किसी ने यह जोखिम नहीं उठाया. रेस्क्यू में बाधा बताई गई. घना कोहरा, पानी में डूबी लोहे की छड़ें और निर्माणाधीन मॉल का वह बेसमेंट, जिसे सालों से खुला छोड़ दिया गया था. लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि इससे कहीं ज्यादा मुश्किल हालात में भी देश में सफल रेस्क्यू ऑपरेशन हुए हैं.

फर्स्ट रिस्पॉन्डर्स और ट्रेनिंग पर सवाल

राज मेहता की 112 कॉल पर पुलिस की PRV सिर्फ 9 मिनट में मौके पर पहुंच गई थी. आधे घंटे के भीतर स्थानीय थाने की फोर्स भी आ गई. पुलिस ने रस्सियां फेंककर युवराज तक पहुंचने की कोशिश की, लेकिन खुद पानी में उतरने की हिम्मत किसी ने नहीं दिखाई. हालांकि यूपी पुलिस ट्रेनिंग अकादमी के मुताबिक, इंस्पेक्टर, SI और ASI स्तर के सभी अधिकारियों को तैराकी और आपदा प्रबंधन का प्रशिक्षण दिया जाता है. इस पर विक्रम सिंह ने तीखा सवाल उठाया.

'अगर ठंड या खतरे से डरकर पुलिस पानी में नहीं उतरी, तो फिर वर्दी पहनने का क्या मतलब?” पूर्व डीजीपी ओपी सिंह ने भी माना कि यहां सिर्फ स्किल ही नहीं, इच्छाशक्ति की भी कमी दिखी. डिलीवरी बॉय तैयार था, लेकिन फर्स्ट रिस्पॉन्डर्स नहीं.'

उपकरणों की कमी: लाइफ जैकेट क्यों नहीं?

अगर मान भी लिया जाए कि पुलिसकर्मी तैरने में सहज नहीं थे, तो सवाल उठता है. क्या उनके पास लाइफ जैकेट थी? Dial 112 की PRV में सायरन, टॉर्च, रस्सी, फर्स्ट एड किट जैसे उपकरण होते हैं, लेकिन लाइफ जैकेट शामिल नहीं है. विशेषज्ञों का कहना है कि जब शहरों में खुले नाले और गड्ढे जानलेवा बन चुके हैं, तो लाइफ जैकेट, ऑक्सीजन सिलेंडर और फोल्डिंग बोट जैसे उपकरण हर फर्स्ट रिस्पॉन्डर के पास होने चाहिए.

फायर ब्रिगेड, SDRF और समय की बर्बादी

फायर ब्रिगेड करीब 45 मिनट बाद पहुंची. पानी के नीचे लोहे की छड़ों और झाड़ियों के कारण उनकी नाव आगे नहीं बढ़ सकी. क्रेन से भी रेस्क्यू की कोशिश नाकाम रही. SDRF ने दूसरी तरफ से नाव उतारने की योजना बनाई, लेकिन वहां रास्ता खोदने में ही दो घंटे लग गए. NDRF करीब दो घंटे बाद पहुंची, लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी.

SOP था, लेकिन ज़मीन पर लीडरशिप नहीं

Dial 112 के DIG शाहब राशिद खान के मुताबिक, सिस्टम ने तय SOP के तहत पुलिस, फायर, मेडिकल और SDRF को एक साथ अलर्ट किया था. तकनीकी रूप से सिस्टम फेल नहीं हुआ, लेकिन ज़मीनी स्तर पर समन्वय और नेतृत्व की भारी कमी दिखी. ओपी सिंह ने साफ कहा कि मौके पर कोई सिंगल कमांड नहीं था. अगर कोई वरिष्ठ अधिकारी नेतृत्व संभालता, तो शायद हालात अलग होते.”

समाधान क्या है?

सेना के पूर्व अधिकारी कर्नल इंदरजीत सिंह का मानना है कि आर्मी का रेस्क्यू मॉडल सिविल सिस्टम में लागू किया जा सकता है. जहां एक नोडल कमांड पोस्ट, प्रशिक्षित टीम और त्वरित संसाधन हमेशा तैयार रहते हैं. पूर्व IAS अधिकारियों ने भी जिला आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (DDMA) की भूमिका पर सवाल उठाए और कहा कि DM के पास विशेष रेस्क्यू सेल बनाने की पूरी शक्ति है.

एक मौत, कई सवाल

युवराज मेहता की मौत ने यह साफ कर दिया है कि सिर्फ एजेंसियों की मौजूदगी काफी नहीं. सही ट्रेनिंग, सही उपकरण, स्पष्ट नेतृत्व और समय पर निर्णय इन सबकी कमी एक युवा की जान ले गई. यह हादसा चेतावनी है अगर सिस्टम नहीं सुधरा, तो अगला युवराज कोई और हो सकता है.

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