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इमरजेंसी में हुए अरेस्ट-नहीं की शादी, रामलला के पटवारी से इनसाइक्लोपीडिया तक, कहानी चंपत राय की जो हर विवाद पर पड़ जाता है भारी

इमरजेंसी में गिरफ्तारी, अविवाहित जीवन, रामलला के पटवारी और आंदोलन के इनसाइक्लोपीडिया की पहचान. जानिए चंपत राय का पूरा सफर और विवादों के बीच उनकी ताकत.

Champat Rai Ram Mandir Trust caretaker of Ram Lalla
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अयोध्या के राम मंदिर में चढ़ावा चोरी के आरोपों और एसआईटी (SIT) जांच के बीच एक बार फिर राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट के महासचिव चंपत राय चर्चा में हैं. बिजनौर के एक केमिस्ट्री प्रोफेसर से लेकर राम मंदिर आंदोलन के सबसे प्रभावशाली संगठनकर्ताओं में शामिल होने तक का उनका सफर कई परतों से भरा है. आपातकाल में जेल, सरकारी नौकरी से इस्तीफा, आजीवन अविवाहित रहने का फैसला, राम मंदिर आंदोलन की कानूनी लड़ाई के लिए हजारों दस्तावेज जुटाना, अशोक सिंघल के भरोसेमंद सहयोगी बनना और फिर ट्रस्ट के महासचिव पद तक पहुंचना, चंपत राय की कहानी सिर्फ एक व्यक्ति की नहीं बल्कि राम मंदिर आंदोलन के संगठनात्मक इतिहास की कहानी भी है.

यही वजह है कि समर्थक उन्हें "रामलला का पटवारी" और "आंदोलन का एनसाइक्लोपीडिया" कहते हैं, जबकि आलोचक उन पर लगे विवादों को लेकर सवाल उठाते हैं.

कौन हैं चंपत राय और उनका संघ से रिश्ता कितना पुराना है?

18 नवंबर 1946 को उत्तर प्रदेश के बिजनौर जिले की नगीना तहसील में जन्मे चंपत राय 10 भाई-बहनों में दूसरे नंबर पर थे. उनके पिता रामेश्वर प्रसाद बंसल राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़े थे और घर का माहौल भी संघ विचारधारा से प्रभावित था. बचपन से शाखा जाने वाले चंपत राय ने विज्ञान विषय में पढ़ाई की और बाद में धामपुर के आरएसएम डिग्री कॉलेज में रसायन विज्ञान के प्रोफेसर बने. लेकिन शिक्षक का जीवन ज्यादा लंबा नहीं चला. संघ कार्यों में बढ़ती सक्रियता ने उन्हें सार्वजनिक जीवन की ओर खींच लिया.

जेल क्यों गए और नौकरी क्यों छोड़ दी?

1975 में आपातकाल लागू होने के बाद संघ और उससे जुड़े कार्यकर्ताओं पर कार्रवाई शुरू हुई. इसी दौरान पुलिस उन्हें गिरफ्तार करने कॉलेज पहुंची. इंदिरा की पुलिस ने चंपत राय को कॉलेज में छात्रों को पढ़ते समय क्लासरूम से ही गिरफ्तार किया और जेल भेज दिया. पूछने पर, उनके खिलाफ आरोप क्या हैं, ये भी पुलिस ने बताने की जरूरत नहीं समझी, जबकि वो प्रोफेसर थे. गिरफ्तारी के बाद चंपत राय ने लगभग 18 महीने जेल में बिताए. जेल से बाहर आने के बाद उन्होंने प्रोफेसर की नौकरी छोड़ दी और संघ के पूर्णकालिक प्रचारक बन गए. यही वह मोड़ था जिसने उन्हें अकादमिक जीवन से निकालकर राष्ट्रीय स्तर के संगठनकर्ता में बदल दिया. इसके बाद उनका पूरा जीवन संघ, विहिप और राम मंदिर आंदोलन को समर्पित हो गया.

चंपत राय ने शादी क्यों नहीं की?

संघ के पूर्णकालिक प्रचारकों की तरह चंपत राय ने भी अविवाहित जीवन चुना. उनका पूरा जीवन संगठन, हिंदू समाज और राम मंदिर आंदोलन को समर्पित रहा. सहयोगियों के अनुसार उन्होंने निजी और पारिवारिक जीवन की बजाय संगठनात्मक कार्यों को प्राथमिकता दी. यही कारण है कि आज भी उनका जीवन प्रचारक शैली के अनुशासन और सादगी से जुड़ा माना जाता है.

‘रामलला का पटवारी’ और ‘इनसाइक्लोपीडिया’ क्यों कहलाते हैं?

1991 में उन्हें अयोध्या भेजा गया. यहां उन्होंने सिर्फ आंदोलन की रणनीति नहीं संभाली बल्कि राम जन्मभूमि से जुड़े हजारों दस्तावेज, राजस्व रिकॉर्ड, पुरातात्विक संदर्भ, मुकदमों से जुड़ी सामग्री और ऐतिहासिक ग्रंथों को व्यवस्थित करने का काम भी किया. राम मंदिर मामले की कानूनी लड़ाई में इस्तेमाल हुए अनेक दस्तावेज जुटाने में उनकी भूमिका महत्वपूर्ण मानी जाती है. इसी वजह से संघ परिवार और विहिप के कई नेता उन्हें "रामलला का पटवारी" कहते हैं. आंदोलन के इतिहास, मुकदमों और तथ्यों पर असाधारण पकड़ के कारण उन्हें "राम मंदिर आंदोलन का इनसाइक्लोपीडिया" भी कहा जाता है.

6 दिसंबर 1992 को उनकी भूमिका क्या थी?

1991 में उन्हें अयोध्या भेजा गया, जहां उन्होंने आंदोलन की जमीनी रणनीति, संतों के समन्वय और दस्तावेजी तैयारी की जिम्मेदारी संभाली. 6 दिसंबर 1992 को विवादित ढांचा गिराए जाने के समय भी वे अयोध्या में मौजूद थे. जब 6 दिसंबर 1992 को बाबरी ढांचा गिराया गया, उस समय चंपत राय अयोध्या में मौजूद थे.

अदालतों में चली लंबी कानूनी लड़ाई के दौरान ऐतिहासिक साक्ष्य जुटाने और उन्हें व्यवस्थित करने का बड़ा काम चंपत राय ने ही किया. यही वजह है कि आंदोलन के नेताओं के बीच उनकी विश्वसनीयता लगातार बढ़ती गई.

राम मंदिर आंदोलन के प्रमुख सार्वजनिक चेहरों में उनका नाम नहीं था, लेकिन संगठनात्मक स्तर पर वे सक्रिय थे. आंदोलन के दौरान संतों, कार्यकर्ताओं और विहिप नेतृत्व के बीच समन्वय बनाने वाले लोगों में उनकी गिनती होती थी.

अशोक सिंघल के बाद VHP में कैसे बढ़ा कद?

चंपत राय को विश्व हिंदू परिषद में आगे बढ़ाने में अशोक सिंघल की भूमिका महत्वपूर्ण मानी जाती है. 1996 में वे विहिप के केंद्रीय मंत्री बने. 2002 में संयुक्त महामंत्री और बाद में अंतरराष्ट्रीय महामंत्री बने. वर्तमान में वे विहिप के अंतरराष्ट्रीय उपाध्यक्ष हैं. संगठन के भीतर उनकी पहचान भाषण देने वाले नेता की नहीं बल्कि फाइल, दस्तावेज, रणनीति और नेटवर्क संभालने वाले व्यक्ति की रही है.

राम मंदिर ट्रस्ट के महासचिव कैसे बने?

2019 में सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद जब श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट का गठन हुआ तो ऐसे व्यक्ति की जरूरत थी जिसे आंदोलन का इतिहास, संत समाज की संरचना, कानूनी लड़ाई और संगठनात्मक तंत्र की पूरी जानकारी हो. चंपत राय इस भूमिका के लिए स्वाभाविक विकल्प माने गए और 2020 में उन्हें ट्रस्ट का महासचिव नियुक्त किया गया. मंदिर निर्माण से लेकर प्रशासनिक समन्वय तक कई महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां उनके पास हैं.

चढ़ावा चोरी और अन्य विवादों में उनका नाम क्यों आया?

हाल के दिनों में राम मंदिर के चढ़ावे को लेकर सामने आए कथित चोरी के मामले में विपक्षी दलों और कुछ संतों ने ट्रस्ट प्रबंधन पर सवाल उठाए हैं. भाजपा के पूर्व सांसद विनय कटियार समेत कुछ लोगों ने भी ट्रस्ट की जवाबदेही पर प्रश्न उठाए. चूंकि चंपत राय ट्रस्ट के महासचिव हैं, इसलिए उनका नाम भी विवादों में आया. इससे पहले भूमि खरीद विवाद और चंदा प्रबंधन को लेकर भी उन पर राजनीतिक आरोप लगे थे. हालांकि आरोप लगना और दोष सिद्ध होना अलग बातें हैं.

क्या किसी मामले में दोषी साबित हुए?

राम मंदिर भूमि खरीद विवाद, चढ़ावा प्रबंधन पर सवाल और हाल में सामने आए कथित चढ़ावा चोरी विवाद में चंपत राय का नाम चर्चा में आया. विपक्षी दलों और कुछ संतों ने ट्रस्ट की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाए, लेकिन अब तक किसी अदालत या सक्षम जांच एजेंसी ने चंपत राय को किसी वित्तीय अनियमितता, चोरी या भ्रष्टाचार के मामले में दोषी नहीं ठहराया है. यही कारण है कि राजनीतिक आरोपों के बावजूद उनकी संस्थागत साख बनी हुई है.

उन पर कई राजनीतिक और सार्वजनिक आरोप लगे, लेकिन दोषसिद्धि का कोई रिकॉर्ड सामने नहीं आया. यही तथ्य उनके समर्थकों को यह कहने का आधार देता है कि दशकों के विवादों के बावजूद वे कानूनी रूप से बेदाग बने हुए हैं.

आखिर क्या है चंपत राय का असली तिलिस्म?

चंपत राय की असली ताकत न चुनावी राजनीति है, न जनसभा की लोकप्रियता. उनकी ताकत है- संघ का नेटवर्क, विहिप में दशकों का अनुभव, संत समाज में स्वीकार्यता, राम मंदिर आंदोलन के इतिहास और दस्तावेजों पर पकड़ तथा संगठनात्मक विश्वसनीयता. यही कारण है कि वे आंदोलन के कार्यकर्ता से ट्रस्ट के सबसे प्रभावशाली प्रशासक तक का सफर तय कर पाए. समर्थकों के लिए यही उनका "तिलिस्म" है, जबकि आलोचक इसे संगठनात्मक शक्ति और संस्थागत प्रभाव का परिणाम मानते हैं.

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