मैं राजा मानसिंह हूं! पुर्नजन्म को लेकर टोंक में 10 वर्षीय बच्चे का दावा, खुद को बताया अकबर का वफादार सिपाही
राजस्थान के टोंक जिले में एक 10 साल का बच्चा खुद को आमेर के राजा मानसिंह का पुनर्जन्म बता रहा है, जिससे इलाके में चर्चा तेज हो गई है. बच्चे के दावे और ऐतिहासिक तथ्यों के बीच कई चौंकाने वाले समानताएं भी सामने आ रही हैं.
यह कहानी सुनकर कई लोग हैरान रह जाते हैं. रोजमर्रा की जिंदगी में पुनर्जन्म को लेकर कई अजीबोगरीब और हैरान करने वाली घटनाएं सामने आती रहती हैं, लेकिन इस बार की कहानी काफी ज्यादा रोचक और चर्चा में है. राजस्थान के टोंक जिले में एक मात्र 10 साल का नन्हा बच्चा खुद को 400 साल पहले के प्रसिद्ध आमेर के राजा मानसिंह का पुनर्जन्म बताकर सबको चौंका रहा है. यह छोटा सा बच्चा दावा कर रहा है कि उसका पिछले जन्म में राजा मानसिंह के रूप में जन्म हुआ था. क्या यह सचमुच पिछले जन्म की यादें हैं या फिर बच्चे का कोई भ्रम है? क्या सदियों पुराना इतिहास एक बार फिर जाग उठा है?.
10 साल के बच्चे का दावा- 'मैं राजा मानसिंह हूं'
राजस्थान के टोंक जिले में जैकमाबाद गांव में रहने वाला 10 वर्षीय कान्हाराम बैरवा नाम का बच्चा कुछ समय से अपने परिवार और आसपास के लोगों को हैरान कर रहा है. वह बार-बार यह कहता है कि वह आमेर का राजा मानसिंह है और उसका पुनर्जन्म हुआ है. परिवार वाले बताते हैं कि कान्हाराम पिछले कई सालों से ऐसी बातें करता आ रहा है. उसकी मां और अन्य परिजन कहते हैं कि वह अक्सर कहता है, 'मुझे आमेर जाना है, क्योंकि मैं वहां का राजा हूं.' बच्चे का व्यवहार भी काफी अलग है. वह अपने आसपास के माहौल से अलग तरीके से रहता है और बातें करता है.
कान्हाराम के दावे क्या-क्या हैं?
जब मीडिया ने कान्हाराम से पूछा कि वह खुद को राजा मानसिंह क्यों मानता है, तो बच्चे ने बड़े आत्मविश्वास के साथ कई बातें बताईं कि वह कहता है कि पिछले जन्म में उसका नाम राजा मानसिंह था. उसके दो मुख्य रानियां थीं और तीन भाई थे. आमेर का किला उसी ने बनवाया था. सवाई मानसिंह अस्पताल भी उसी के नाम पर है. उसने हल्दीघाटी के युद्ध में महाराणा प्रताप से लड़ाई की थी. अंत में दुश्मनों ने उसे अनाज की मंडी में घेर लिया और भाले से मार दिया.
क्या जनता है बच्चा शीला देवी के बारें में?
कान्हाराम सबसे ज्यादा शीला देवी के बारे में बात करता है. वह कहता है कि उसे शीला देवी के दर्शन करने हैं. उसने बताया कि शीला देवी का मंदिर आमेर में है और उसे वह बंगाल से लाया था. बच्चे का कहना है कि शीला देवी की असली मूर्ति एक गुप्त कमरे में रखी हुई है, जबकि बाहर जो मूर्ति दिखाई देती है, वह सिर्फ उनकी प्रतीक है. वह आगे बताता है कि पिछले जन्म में जब वह युद्ध जीतकर लौटता था, तो शीला देवी को नरबलि चढ़ाता था. बाद में जब उसने पशुओं की बलि देना शुरू किया, तो माता नाराज हो गईं. नाराजगी में शीला माता की गर्दन तिरछी हो गई, जो आज भी मंदिर में देखी जा सकती है.
बच्चे का राजसी रहन-सहन
परिवार वाले बताते हैं कि कान्हाराम का रहन-सहन भी बिल्कुल राजपूत राजाओं जैसा है. जैसे- वह बिना घी के खाना नहीं खाता. परिवार के बाकी सदस्यों के साथ खाना नहीं खाता, क्योंकि वह कहता है- 'तुम सब बैरवा हो और मैं राजा मानसिंह हूं.' वह अलग बर्तनों में अपना खाना खाता है. पिछले तीन साल से वह लगातार खुद को राजा बताते हुए पुरानी बातें सुनाता रहता है. उसकी बहन बताती है कि वह युद्ध करने के तरीके और पुरानी घटनाएं बड़ी विस्तार से बताया करता था.
असली इतिहास क्या कहता है?
अब सवाल यह उठता है कि क्या कान्हाराम जो कुछ बता रहा है, वह ऐतिहासिक तथ्यों से मेल खाता है?. वास्तविक इतिहास के अनुसार, राजा मानसिंह आमेर के प्रसिद्ध शासक थे. उनका शासनकाल 1589 से 1614 ईस्वी तक रहा. वे मुगल सम्राट अकबर के सबसे विश्वसनीय सेनापति थे. उन्होंने 1592 में आमेर किले का निर्माण शुरू करवाया, जो 1599 में पूरा हुआ. अकबर के आदेश पर मानसिंह को बंगाल के विद्रोह को कुचलने के लिए भेजा गया था. वहां उन्होंने राजा केदार को हराया और शीला देवी की मूर्ति को आमेर लाए. आमेर में शीला माता की मूर्ति को महिषासुर मर्दिनी के रूप में स्थापित किया गया. शुरू में माता को नरबलि दी जाती थी, लेकिन बाद में पशुबलि शुरू हुई. किंवदंती है कि इससे माता रुष्ट हो गईं और उनकी गर्दन तिरछी हो गई, जो आज भी मंदिर में मौजूद है.




