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रायसीना हिल से भी पुराना है Kadimi Masjid का इतिहास, कभी नहीं बनी विवाद का विषय, क्या अब हमेशा के लिए हो जाएगा अंत?

कादिमी मस्जिद का इतिहास 100 साल से अधिक पुराना बताया जाता है. सेंट्रल विस्टा प्रोजेक्ट में इसके स्पष्ट उल्लेख नहीं होने से इसके भविष्य पर सवाल उठे हैं.

रायसीना हिल से भी पुराना है Kadimi Masjid का इतिहास, कभी नहीं बनी विवाद का विषय, क्या अब हमेशा के लिए हो जाएगा अंत?
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दिल्ली का सत्ता गलियारा इन दिनों बड़े बदलाव के दौर से गुजर रहा है. सेंट्रल विस्टा प्रोजेक्ट के तहत पुराने सरकारी भवनों की जगह आधुनिक कार्यालय परिसरों को विकसित किया जा रहा है. इसी क्रम में कृषि भवन और शास्त्री भवन यानी केंद्रीय सचिवालय के पुनर्विकास की प्रक्रिया भी आगे बढ़ रही है. लेकिन कृषि भवन परिसर में मौजूद एक छोटी-सी मस्जिद ने इस पूरी कवायद को इतिहास, विरासत और संरक्षण के सवालों से जोड़ दिया है. इसका नाम कादिमी मस्जिद है, जिसे स्थानीय लोग तकिया मस्जिद भी कहते हैं.

करीब 100 साल से अधिक पुरानी बताई जाने वाली यह मस्जिद आज भी नमाज के लिए इस्तेमाल होती है. यहां इमाम नूर मोहम्मद नमाज पढ़ाते हैं. सेंट्रल विस्टा प्रोजेक्ट से जुड़े उपलब्ध दस्तावेजों और रिपोर्टों में मस्जिद के पुनर्विकास या स्थानांतरण का स्पष्ट उल्लेख सामने नहीं आता. यही वजह है कि इसके भविष्य को लेकर सवाल उठ रहे हैं.

कादिमी मस्जिद कितनी पुरानी है और कहानी क्या है?

कादिमी मस्जिद कृषि भवन परिसर में स्थित एक छोटी मस्जिद है. उपलब्ध रिपोर्टों के मुताबिक, दिल्ली वक्फ बोर्ड इसे 100 साल से अधिक पुरानी बताता है. बोर्ड का दावा है कि यह मस्जिद कृषि भवन के निर्माण से पहले से मौजूद थी. यहां लंबे समय से नियमित नमाज होती रही है और आसपास के सरकारी कर्मचारी भी इसका इस्तेमाल करते हैं. मस्जिद के बेसमेंट में महिलाओं के लिए नमाज की व्यवस्था होने की बात भी सामने आती है.

Credit : State Mirror

हालांकि, मस्जिद की सटीक स्थापना तिथि और इसे रायसीना हिल से भी पुराना साबित करने वाला स्वतंत्र ऐतिहासिक रिकॉर्ड सार्वजनिक स्रोतों में स्पष्ट रूप से उपलब्ध नहीं है. मस्जिद की प्राचीनता को लेकर इमाम और स्थानीय लोगों के दावे जरूर हैं, लेकिन इन दावों को ऐतिहासिक दस्तावेजों से प्रमाणित करना जरूरी होगा.

सेंट्रल विस्टा में मस्जिद का जिक्र क्यों चर्चा में आया?

कृषि भवन और शास्त्री भवन के पुनर्विकास के लिए केंद्रीय लोक निर्माण विभाग (CPWD) की ओर से टेंडर जारी किए गए हैं. उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार, प्रस्तावित योजना में मौजूदा सरकारी भवनों की जगह नए कॉमन सेंट्रल सेक्रेटेरिएट भवन विकसित करने की योजना है.

हालांकि, कृषि भवन परिसर में मौजूद कादिमी मस्जिद को लेकर उपलब्ध नक्शों में स्पष्ट जानकारी नहीं दिखाई देती. इसी वजह से मस्जिद के भविष्य को लेकर सवाल उठने लगे हैं. लेकिन यह स्पष्ट करना जरूरी है कि सरकार की ओर से मस्जिद को तोड़ने या हटाने का कोई अंतिम आधिकारिक फैसला सामने नहीं आया है. इसलिए सिर्फ नक्शे में स्पष्ट उल्लेख नहीं होने को मस्जिद को हटाने का फैसला मानना उचित नहीं होगा.

क्या पहले भी मस्जिद की सुरक्षा का मामला कोर्ट पहुंचा था?

मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक, रायसीना हिल्स क्षेत्र में स्थित एक मस्जिद की सुरक्षा को लेकर 2021 में अदालत का रुख किया गया था. उस समय पुनर्विकास के दौरान मस्जिद को नुकसान नहीं पहुंचाने को लेकर सरकार की ओर से आश्वासन दिए जाने की बात सामने आई थी. बाद में याचिका खारिज हो गई थी. हालांकि, भविष्य में किसी तरह का खतरा पैदा होने की स्थिति में कानूनी रास्ता अपनाने की संभावना बनी रहने की बात भी रिपोर्टों में कही गई थी.

क्या कादिमी मस्जिद अकेली विरासत है?

कृषि भवन और सेंट्रल विस्टा के आसपास कई छोटे धार्मिक और ऐतिहासिक स्थल मौजूद हैं. ऐसे में सेंट्रल विस्टा का पुनर्विकास सिर्फ नई सरकारी इमारतों के निर्माण की परियोजना नहीं है, बल्कि इसके साथ पुरानी दिल्ली और नई दिल्ली के बीच मौजूद ऐतिहासिक विरासत को संरक्षित करने की चुनौती भी जुड़ी हुई है.

मस्जिद से जुड़े लोगों का कहना है कि कादिमी मस्जिद लंबे समय से यहां मौजूद है और इसका धार्मिक महत्व है. दूसरी ओर, पुनर्विकास परियोजना का उद्देश्य पुराने सरकारी भवनों की जगह आधुनिक और अधिक केंद्रीकृत कार्यालय परिसर तैयार करना है. ऐसे में बड़ा सवाल यही है कि विकास और विरासत के बीच संतुलन कैसे बनाया जाएगा.

क्या नक्शे में नहीं होना खतरे का संकेत है?

फिलहाल, इसे सीधे तौर पर मस्जिद को तोड़े जाने का फैसला कहना जल्दबाजी होगी. हालांकि, प्रस्तावित पुनर्विकास से जुड़े नक्शों और दस्तावेजों में मस्जिद की स्थिति को लेकर स्पष्ट जानकारी सामने नहीं आने से सवाल जरूर उठते हैं. यही वजह है कि कादिमी मस्जिद अब एक छोटे धार्मिक स्थल से आगे बढ़कर दिल्ली की विरासत और सेंट्रल विस्टा के विकास मॉडल से जुड़ी बहस का हिस्सा बन गई है.

क्या कहते हैं इमाम नूर मोहम्मद?

कृषि भवन परिसर से जुड़ी करीब 50 से 60 गज में बनी इस मस्जिद के इमाम नूर मोहम्मद का कहना है कि कादिमी मस्जिद, जिसे लोग तकिया मस्जिद भी कहते हैं, का इतिहास रायसीना हिल्स से भी पुराना है. उनका दावा है कि जब अंग्रेजों ने कोलकाता से दिल्ली को राजधानी बनाने का फैसला किया और नई दिल्ली का निर्माण शुरू हुआ, उससे पहले यहां रायसीना गांव था और मस्जिद उस दौर से मौजूद है.

इमाम नूर मोहम्मद के मुताबिक, मस्जिद को लेकर कभी कोई विवाद नहीं रहा और यह लंबे समय से शांति का प्रतीक रही है. उनका कहना है कि आज भी 65 से अधिक सरकारी कर्मचारी, जो विभिन्न मंत्रालयों में काम करते हैं, कार्यदिवस के दौरान यहां नमाज पढ़ने आते हैं. इसके अलावा आसपास रहने वाले मुस्लिम समुदाय के लोग भी मस्जिद में नमाज अदा करते हैं.

जब स्टेट मिरर के प्रतिनिधि ने इमाम नूर मोहम्मद से पूछा कि क्या सेंट्रल विस्टा प्रोजेक्ट के तहत मस्जिद को हटाने या कहीं और स्थानांतरित करने की कोई योजना है, तो उन्होंने कहा कि उन्हें अभी तक किसी अधिकारी या अन्य व्यक्ति की ओर से इस संबंध में कोई जानकारी नहीं दी गई है. उन्होंने यह भी कहा कि उन्होंने इस बारे में किसी अधिकारी से संपर्क नहीं किया है.

इमाम ने कहा कि सेंट्रल विस्टा प्रोजेक्ट पर कई वर्षों से काम चल रहा है और उनकी इच्छा है कि मस्जिद जिस स्थिति में और जिस स्थान पर है, वहीं बनी रहे. उन्होंने कहा कि अगर मस्जिद को हटाने की स्थिति आती है तो इससे जुड़े लोग इस पर विचार करेंगे. उनका कहना था कि ऐसा नहीं होना चाहिए.

क्या कहते हैं मस्जिद से जुड़े मोहम्मद शाह आलम?

मस्जिद से जुड़े मोहम्मद शाह आलम ने नमाज के बाद कहा कि कादिमी मस्जिद कमेटी भी इसके भविष्य को लेकर चिंतित है. उन्होंने कहा कि अभी तक मस्जिद को हटाने का कोई आधिकारिक प्रस्ताव उनके सामने नहीं आया है. अगर ऐसा कोई प्रस्ताव आता है तो कमेटी के सदस्य आपस में चर्चा कर इस मुद्दे को उचित स्तर पर उठाएंगे.

शाह आलम का कहना है कि फिलहाल कमेटी चाहती है कि सरकार अपनी मंशा स्पष्ट करे. उनसे जब पूछा गया कि अगर सरकार मस्जिद को किसी दूसरी जगह स्थानांतरित करने का प्रस्ताव देती है तो कमेटी का क्या रुख होगा, उन्होंने कहा कि ऐसा प्रस्ताव सामने आने के बाद ही उस पर विचार किया जाएगा और अंतिम फैसला उसी समय लिया जाएगा.

फिलहाल, कादिमी मस्जिद को लेकर सबसे अहम बात यही है कि इसके हटाए जाने का कोई अंतिम सरकारी फैसला सार्वजनिक रूप से सामने नहीं आया है. दूसरी ओर, मस्जिद की ऐतिहासिकता, मौजूदा उपयोग और पुनर्विकास योजना में इसकी स्थिति को लेकर सवाल बने हुए हैं. ऐसे में आने वाले समय में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि सेंट्रल विस्टा के पुनर्विकास में इस छोटे लेकिन ऐतिहासिक धार्मिक स्थल के भविष्य को लेकर सरकार क्या रुख अपनाती है.

स्टेट मिरर स्पेशल
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