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मदरसे से मुख्यमंत्री तक, आरोप ही नहीं अपमान और मजाक भी सहना पड़ा, ऐसा रहा है सम्राट चौधरी का सफर

सम्राट चौधरी का राजनीतिक सफर आसान नहीं रहा है. एक साधारण परिवार से निकलकर मुख्यमंत्री पद तक पहुंचने तक उन्हें कई तरह की चुनौतियों का सामना करना पड़ा. उनके जीवन में शिक्षा से लेकर राजनीति तक कई उतार-चढ़ाव रहे हैं, जहां एक तरफ उनके मदरसे से शुरुआती पढ़ाई और साधारण जीवन की चर्चा होती है. आइए इस कड़ी में उनके चर्चित किस्सों पर एक नजर डालते हैं.

मदरसे से मुख्यमंत्री तक, आरोप ही नहीं अपमान और मजाक भी सहना पड़ा, ऐसा रहा है सम्राट चौधरी का सफर
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( Image Source:  ANI )
सागर द्विवेदी
By: सागर द्विवेदी6 Mins Read

Updated on: 15 April 2026 7:10 AM IST

बिहार की राजनीति में बड़ा बदलाव देखने को मिला है, जहां सम्राट चौधरी को राज्य का नया मुख्यमंत्री नामित किया गया है. इसके साथ ही लंबे समय से सत्ता की कमान संभाल रहे नीतीश कुमार के दो दशकों से अधिक पुराने नेतृत्व का अध्याय समाप्त माना जा रहा है. राजनीतिक हलकों में यह फैसला बेहद अहम माना जा रहा है, क्योंकि इससे राज्य की सत्ता संरचना पूरी तरह बदल गई है.

भाजपा विधायक दल की बैठक में सम्राट चौधरी को सर्वसम्मति से नेता चुना गया, जिसके बाद उनके गृह जिले मुंगेर के तारापुर प्रखंड स्थित लखनपुर गांव में जश्न का माहौल बन गया है. समर्थकों और ग्रामीणों में खुशी की लहर है और लोग इसे एक ऐतिहासिक उपलब्धि के रूप में देख रहे हैं. ऐसे में आइए जानते हैं कि सम्राट चौधरी के मदरसे से मुख्यमंत्री तक कैसा रहा सफर?

मदरसे से शुरुआत और साधारण बचपन की कहानी

सम्राट चौधरी का बचपन बेहद साधारण माहौल में बीता. लखनपुर गांव में उस समय एक ही मदरसा हुआ करता था, जहां गांव के सभी बच्चे साथ पढ़ाई करते थे. ग्रामीणों के अनुसार, सम्राट चौधरी ने भी शुरुआती शिक्षा वहीं से ली थी और उन्होंने अलिफ-बे से लेकर क, ख तक की पढ़ाई की. मदरसे में हिंदी और उर्दू के साथ-साथ संस्कृत की भी शिक्षा दी जाती थी, जहां हिंदू और मुस्लिम बच्चे एक साथ पढ़ते थे. ग्रामीणों का कहना है कि उस समय शिक्षा का माहौल पूरी तरह साझा और आपसी भाईचारे वाला था.

क्रिकेट और पढ़ाई में संतुलन, बचपन के किस्से

ग्रामीणों और बचपन के दोस्तों के अनुसार, सम्राट चौधरी पढ़ाई के साथ-साथ खेलों में भी काफी सक्रिय रहते थे. खासकर क्रिकेट में उनकी गहरी रुचि थी और वे अच्छे खिलाड़ी माने जाते थे. उनके पिता शकुनि चौधरी चाहते थे कि वे खेल में आगे बढ़ें, इसलिए कई बार उन्हें क्रिकेट को लेकर डांट भी पड़ती थी. दोस्तों का कहना है कि खेल के दौरान छोटी-मोटी नोकझोंक होती थी, लेकिन आपसी रिश्तों में कभी दूरी नहीं आई.

गांव से जुड़ाव और सामाजिक ताने-बाने की कहानी

लखनपुर गांव के लोग आज भी सम्राट चौधरी को उसी सरलता के साथ याद करते हैं. ग्रामीणों के अनुसार, वे जब भी गांव आते हैं तो पुराने दोस्तों और परिचितों से जरूर मिलते हैं. गांव में हिंदू-मुस्लिम एकता की मिसाल आज भी देखने को मिलती है और लोग बताते हैं कि उस समय से लेकर आज तक सामाजिक सौहार्द बना हुआ है.

शिक्षा और शैक्षणिक सफर

सार्वजनिक दस्तावेजों और चुनावी हलफनामों के अनुसार, सम्राट चौधरी ने अपनी उच्च शिक्षा दक्षिण भारत के मदुरै कामराज विश्वविद्यालय से प्राप्त की है. यह विश्वविद्यालय देश के प्रतिष्ठित शिक्षण संस्थानों में गिना जाता है. इसके अलावा उनके प्रोफाइल में कैलिफोर्निया पब्लिक यूनिवर्सिटी से प्राप्त “डॉक्टर ऑफ लेटर्स (D.Litt.)” की मानद उपाधि का भी उल्लेख मिलता है. हालांकि, उनकी शैक्षणिक योग्यता को लेकर राजनीतिक बहस और विवाद भी समय-समय पर उठते रहे हैं.

सम्राट चौधरी पर क्या-क्या हैं आरोप?

सम्राट चौधरी पर राजनीतिक जीवन के दौरान कई गंभीर आरोप भी लगाए गए हैं. चुनावी प्रचार के दौरान राजनीतिक रणनीतिकार प्रशांत किशोर ने उन पर आपराधिक मामलों से जुड़े आरोपों का उल्लेख किया था. इन दावों में 1995-96 के पुराने मामलों और आपराधिक पृष्ठभूमि से जुड़े आरोपों की चर्चा शामिल रही, जिनको लेकर राजनीतिक माहौल काफी गरमाया रहा. हालांकि, ये आरोप राजनीतिक बहस का हिस्सा बने रहे और इन पर अलग-अलग पक्षों की अलग राय सामने आती रही.

पगड़ी विवाद और राजनीतिक संकल्प की कहानी

अब बात करते हैं उनके ऊपर अपमान और मजाक की तो करीब तीन साल पहले बिहार विधानसभा में एक बहस के दौरान सम्राट चौधरी और तत्कालीन मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के बीच तीखी नोकझोंक हुई थी. उसी दौरान पगड़ी (मुरेठा) को लेकर उनका एक बयान काफी चर्चा में रहा. उन्होंने कहा था कि यह मेरा संकल्प है कि आपको मुख्यमंत्री पद से हटाऊंगा. जिस दिन आप हटेंगे, उसी दिन यह पगड़ी उतर जाएगी.” यह बयान उस समय राजनीतिक प्रतीक बन गया था और बिहार की सियासत में लंबे समय तक चर्चा में रहा.

बदलती राजनीति और मुरेठा की वापसी

बिहार की राजनीति में बड़े बदलाव के साथ नीतीश कुमार ने जनवरी 2024 में महागठबंधन छोड़कर एनडीए में वापसी की. इसके बाद माना गया कि सम्राट चौधरी का राजनीतिक संकल्प काफी हद तक पूरा हो गया. जुलाई 2024 में वे अयोध्या पहुंचे, जहां उन्होंने सरयू नदी में स्नान किया और राम जन्मभूमि मंदिर में रामलला को अपना मुरेठा अर्पित किया. उन्होंने इसे अपने संकल्प की समाप्ति और आस्था का प्रतीक बताया.

सम्राट चौधरी को राजनीति के शुरुआती दौर में कई बार आलोचनाओं और तंज का सामना करना पड़ा. उनके बयानों और शैक्षणिक दावों को लेकर विपक्ष ने लगातार सवाल उठाए. वहीं, उनके राजनीतिक सफर में कई ऐसे मौके आए जब उन्हें सार्वजनिक रूप से आलोचना और राजनीतिक हमलों का सामना करना पड़ा, लेकिन उन्होंने अपने राजनीतिक करियर को आगे बढ़ाया.

आज सम्राट चौधरी का सफर बिहार की राजनीति में एक बड़े बदलाव के रूप में देखा जा रहा है. एक साधारण ग्रामीण पृष्ठभूमि, मदरसे की शुरुआती पढ़ाई, विवादों और आरोपों से गुजरते हुए उनका मुख्यमंत्री तक पहुंचना राजनीतिक इतिहास का महत्वपूर्ण अध्याय बन गया है. यह कहानी सिर्फ सत्ता परिवर्तन की नहीं, बल्कि संघर्ष, विवाद और राजनीतिक उतार-चढ़ाव की भी एक बड़ी तस्वीर पेश करती है.

सम्राट चौधरी
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