100 साल पुराने फर्जी कागज, करोड़ों की जमीन टके के भाव! बिहार में जमीन माफिया कैसे चला रहे पूरा ‘खेल’? 10 Points
बिहार में जमीन से जुड़े कथित फर्जीवाड़े की जांच तेज हो गई है. 100 साल पुराने कथित फर्जी दस्तावेजों, कम कीमत दिखाकर रजिस्ट्री, दाखिल-खारिज और सरकारी जमीन पर कब्जे के मामलों की जांच हो रही है
बिहार में जमीन से जुड़ी कथित गड़बड़ियों की जांच में रजिस्ट्री से लेकर म्यूटेशन यानी दाखिल-खारिज तक का पूरा नेटवर्क जांच के दायरे में आया है. आरोप है कि जमीन माफिया भूमि सुधार एवं राजस्व विभाग और निबंधन विभाग के कुछ पदाधिकारियों और कर्मचारियों से कथित सांठ-गांठ कर जमीन के दस्तावेजों में हेरफेर कर रहे हैं. कहीं जमीन की वास्तविक कीमत से काफी कम पैसा दिखाकर रजिस्ट्री कराने का मामला सामने आया है, तो कहीं दशकों पुराने फर्जी दस्तावेज तैयार कर जमीन पर कब्जे की कोशिश की गई है.
बिहार पुलिस की जांच में जमुई, मुजफ्फरपुर, नालंदा, पटना समेत कई जिलों से ऐसे मामले सामने आए हैं. राज्य के एक दर्जन से ज्यादा अंचलों में रजिस्ट्री से लेकर दाखिल-खारिज तक सरकारी कर्मियों की संदिग्ध भूमिका की जांच चल रही है. भूमि एवं राजस्व विभाग भी आर्थिक अपराध इकाई (EOU) के साथ मिलकर मामलों की पड़ताल कर रहा है, जबकि निबंधन विभाग राजस्व चोरी रोकने के लिए आंतरिक जांच और स्थल निरीक्षण करा रहा है.
10 Points में जानें पूरा मामला
1. जांच में आरोप है कि जमीन माफिया सरकारी अधिकारियों और कर्मचारियों के साथ कथित मिलीभगत कर जमीन की रजिस्ट्री और उसके बाद म्यूटेशन यानी दाखिल-खारिज की प्रक्रिया को प्रभावित कर रहे हैं. एक तरफ जमीन की कीमत कम दिखाकर रजिस्ट्री कराने की बात सामने आई है, तो दूसरी तरफ पुराने और कथित फर्जी दस्तावेजों के आधार पर जमीन पर मालिकाना हक और कब्जा हासिल करने के प्रयासों की जांच हो रही है.
2. राज्य में एक दर्जन से अधिक ऐसे अंचल बताए गए हैं, जहां निबंधन से लेकर दाखिल-खारिज तक सरकारी पदाधिकारियों और कर्मचारियों की संदिग्ध भूमिका की जांच की जा रही है. भूमि एवं राजस्व विभाग EOU के साथ मिलकर कथित रूप से दोषी पदाधिकारियों और कर्मियों की भूमिका की पड़ताल कर रहा है. वहीं निबंधन विभाग भी रजिस्ट्री में राजस्व चोरी रोकने के लिए आंतरिक जांच और स्थल निरीक्षण करा रहा है.
3. EOU की जांच रिपोर्ट के अनुसार, जमुई में कृषि विभाग की 10 एकड़ जमीन पर कब्जे के लिए कथित तौर पर अंचल कार्यालय के अधिकारियों और कर्मचारियों से मिलीभगत की गई. इसके लिए वर्ष 1924 और 1927 के फर्जी कागजात तैयार किए जाने का आरोप है.
जांच एजेंसी इस बात की पड़ताल कर रही है कि इन पुराने बताए जा रहे दस्तावेजों को किस तरह तैयार किया गया और सरकारी जमीन पर दावे के लिए उनका इस्तेमाल कैसे किया गया.
4. जांच रिपोर्ट के अनुसार, इन कथित फर्जी दस्तावेजों के आधार पर सरकारी जमीन का दाखिल-खारिज गुड्डू यादव गिरोह के सदस्यों के नाम पर दिखा दिया गया. इस मामले में कांड दर्ज किया गया है. साथ ही तत्कालीन अंचल अधिकारी, कर्मचारियों और राजस्व अधिकारियों की भूमिका की भी जांच चल रही है.
5. पिछले साल मुजफ्फरपुर में 44 डिसमिल सरकारी कृषि भूमि के गलत तरीके से दाखिल-खारिज का मामला सामने आया था. इस मामले के बाद तत्कालीन अंचल अधिकारी को निलंबित किया गया था.
6. पिछले महीने कांटी और मुशहरी में भी जमीन कब्जे के कथित खेल में राजस्व पदाधिकारियों और कर्मचारियों की संलिप्तता सामने आने की बात कही गई. इन मामलों में सरकारी कर्मियों की भूमिका की जांच अभी जारी है.
7. जून में नालंदा में संतोष डान के ठिकानों पर हुई छापेमारी के दौरान मिली अचल संपत्तियों से जुड़े दस्तावेज भी जांच के दायरे में हैं. इन संपत्तियों के निबंधन और दाखिल-खारिज की प्रक्रिया में राजस्वकर्मियों और निबंधनकर्मियों की भूमिका की जांच की जा रही है.
8. EOU के अनुसार, जमुई में ऐसी जमीन का मामला भी सामने आया है, जिसका सरकारी सर्किल रेट के हिसाब से मूल्य 14 करोड़ रुपये से अधिक था. आरोप है कि इसकी रजिस्ट्री महज 6 करोड़ रुपये की कीमत दिखाकर कर दी गई.
9. EOU के अनुसार, गुड्डू यादव और उसकी पत्नी दुलारी देवी के नाम जमुई और सिकंदरा में 29 संपत्तियां दर्ज हैं. इन संपत्तियों का निबंधन मूल्य 2.57 करोड़ रुपये दर्ज किया गया है. वहीं सरकारी सर्किल रेट के अनुसार इन संपत्तियों की कीमत 7.59 करोड़ रुपये आंकी गई है. यानी दस्तावेजों में दर्ज निबंधन मूल्य और सरकारी सर्किल रेट के बीच बड़ा अंतर बताया गया है.
10. जांच रिपोर्ट के अनुसार, गुड्डू यादव गिरोह के अन्य सदस्यों के नाम पर 61 दस्तावेजों के जरिए 3.37 करोड़ रुपये का निवेश दिखाया गया है. वहीं इन संपत्तियों की सरकारी सर्किल रेट के अनुसार कीमत 6.65 करोड़ रुपये बताई गई है. इन मामलों में भी जांच एजेंसियां यह पता लगाने में जुटी हैं कि संपत्तियों के निबंधन में वास्तविक कीमत और दर्ज कीमत के बीच इतना अंतर क्यों रहा. साथ ही निबंधनकर्मियों की भूमिका की भी जांच की जा रही है.




