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'मियां' से असम के CM हिमंता को क्यों लगती है मिर्ची, मुगल के दौर में सम्मान का प्रतीक, अब गाली कैसे?

‘मियां’ अपने मूल में सम्मान का शब्द था. भारत के अलग-अलग हिस्सों में इसके अलग अर्थ हैं. असम में यह राजनीतिक और पहचान की बहस का प्रतीक बन गया है. असम में अब यह शब्द नहीं, संदर्भ और सत्ता उसे गाली या सम्मान बनाते हैं.

मियां से असम के CM  हिमंता को क्यों लगती है मिर्ची, मुगल के दौर में सम्मान का प्रतीक, अब गाली कैसे?
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( Image Source:  Sora AI )

कभी दोस्ती और अपनापन जताने के लिए लोग 'मियां' शब्द का प्रयोग करते हैं. सबके सामने और मंच से भी कह देते थे, हां भी 'मियां' क्या है, खैर खबर तो ठीक है, तो कोई बुरा नहीं मातन था. मुगलों के दौर में ‘मियां’ एक शालीन और सम्मानजनक संबोधन था. दरबार में अमीर-उमराव, फौजी अफसर और पढ़े-लिखे लोगों को ‘मियां साहब’ कहा जाता था, जैसे आज भी उर्दू अदब या पुराने लखनवी-दिल्ली तहजीब में सुनाई देता है, लेकिन असम में यही शब्द समय के साथ सियासत, पहचान और डर की कहानी बन गया.

खासकर ब्रह्मपुत्र घाटी में बंगाल से आए मुस्लिम किसानों और मजदूरों को स्थानीय तौर पर ‘मियां’ कहा जाने लगा. पहले एक पहचान के तौर पर, फिर अवैध घुसपैठ और जनसंख्या बदलाव की आशंका के साथ यह शब्द तंज और अपमान में बदल गया. असम आंदोलन, NRC और नागरिकता जैसे मुद्दों ने इस शब्द पर और जहर चढ़ाया. नतीजा ये हुआ कि जो ‘मियां’ कभी इज्जत का अलंकार था, वही असम की जमीन पर कई लोगों के लिए गाली बन गय. शब्द वही रहा, लेकिन इतिहास और हालात ने उसका मतलब पूरी तरह बदल दिया.

टकराव का प्रतीक कैसे?

'जनाब' और 'हुजूर' के मायने रखने वाला ‘मियां’ शब्द आज असम में सियासत, पहचान और टकराव का प्रतीक बन चुका है. इसके पीछे सिर्फ भाषा नहीं, बल्कि नागरिकता, NRC, घुसपैठ की बहस और जनसांख्यिकीय डर की लंबी कहानी है. यही वजह है कि ‘मियां’ आज असम में एक शब्द नहीं, बल्कि सियासी बहस का मुद्दा बन चुका है. यह शब्द वहां मुख्य रूप से बांग्लाभाषी मुस्लिम समुदाय के लिए इस्तेमाल किया जाता है. खासकर वे लोग जो ब्रह्मपुत्र के टापू वाले इलाकों में रहते हैं.

असम में समय के साथ इस शब्द का अर्थ बदल गया. अब इसे अवैध घुसपैठ, NRC (नेशनल रजिस्टर ऑफ सिटिज़न्स), और जनसांख्यिकीय बदलाव की बहस से जुड़ गया है, जिसके चलते असम में ‘मियां’ कई बार तंज, अपमान या गाली के रूप में इस्तेमाल होने लगा.

असम में ‘मियां’ का मतलब क्या?

असम के लोगों के हिसाब से बात करें तो ‘मियां’ शब्द बांग्लाभाषी मुस्लिम लोगों के लिए प्रयोग किया जाता है. इसमें मूल अस​मियां मुसलमान शामिल नहीं है. खासकर, वे जिन पर बांग्लादेश से आए होने का शक किया जाता है. हालांकि, यह एक सामूहिक लेबल है, जिसे बहुत से लोग अपमानजनक मानते हैं. यही वजह है कि हाल के वर्षों में 'मियां पोएट्री' और 'मियां आइडेंटिटी मूवमेंट' भी सामने आया, जहां लोग इस शब्द को अपनाकर (reclaim) उसकी नकारात्मकता को चुनौती दे रहे हैं.

देश के अलग-अलग राज्यों में ‘मियां’ का मतलब

भारत में ‘मियां’ शब्द का अर्थ राज्य और संदर्भ के हिसाब से बदल जाता है. उत्तर भारत (UP, बिहार और दिल्ली) में ‘मियां’ सम्मानजनक या मजाकिया संबोधन हैं. जैसे “अरे मियां, कैसे हो? महाराष्ट्र में आमतौर पर मुस्लिम पुरुषों के लिए कभी सम्मान, कभी सिर्फ पहचान के लिए इस्तेमाल होता है. हैदराबाद/तेलंगाना यह उर्दू परिपाटी का हिस्सा है. वहां, इसका उपयोग लोग इसे दोस्ताना और अपनापन दिखाने के लिए करते हैं. जैसे 'मियां, जरा सुनो!' यानी शब्द वही है, लेकिन भाव और संदर्भ क्षेत्र के हिसाब से अलग-अलग हैं.

मुगल काल में ‘मियां’ सम्मान का प्रतीक

‘मियां’ शब्द का इतिहास काफी पुराना और दिलचस्प है. यह शब्द फारसी (Persian) से आया है. बाद में यह उर्दू, हिंदी, अवधी, ब्रज और दक्खनी उर्दू में घुल-मिल गया. मियां का मूल अर्थ 'सर' 'जनाब' और 'सम्मानित व्यक्ति' होता है. मुगल काल में ‘मियां’ एक आदरसूचक उपाधि हुआ करती थी. जैसे मियां तानसेन, मियां मीर आदि.

बांग्लाभाषी मियां हेडलाइन में क्यों?

असम के मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा ने हाल ही में एक कार्यक्रम में कहा कि आप लोग जैसे भी कर सकते हो 'मियां' को तकलीफ पहुंचाएं! अगर रिक्शा का किराया 5 है तो 4 ही दें इससे "मियां" को दुःख पहुंचेगा, कुछ बोले तो मारो! ऐसा सीएम ने पहली बार नहीं किया, बल्कि कई मौकों पर बांग्लाभाषी मुसलमानों के लिए वह जहर उगल चुके हैं. ताजा विवाद उनके बयानों की वजह से चर्चा में है.

असम न्‍यूज
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