फुटबॉल का वह 'नंगे पैर' वाला जादूगर, जिसने शोहरत पर चुनी अपनी माटी; कहानी तालीमेरेन आओ की
पूर्वोत्तर का एक अनाम नायक, जिसने अंग्रेजों को सिखाया कि 'फुटबॉल' कैसे खेलते हैं और दुनिया के सबसे बड़े क्लब का ऑफर ठुकरा कर गाँव लौट आया. पढ़ें देवीलाल नेवार की यह खास रिपोर्ट...
लंदन का वेंबली स्टेडियम. साल 1948.. स्वतंत्र भारत पहली बार ओलंपिक के वैश्विक मंच पर कदम रख रहा था. सामने थी फ्रांस की मजबूत टीम. स्टेडियम में बैठे हजारों अंग्रेज दर्शक उस वक्त हैरान रह गए, जब भारतीय टीम के खिलाड़ी बिना जूतों के, नंगे पैर (Barefoot) मैदान पर उतरे. कड़कड़ाती ठंड और विदेशी सरजमीं, लेकिन इन खिलाड़ियों के पैरों में न खौफ था, न हिचकिचाहट.
इस ऐतिहासिक टीम का नेतृत्व कर रहा था पूर्वोत्तर भारत का एक 30 वर्षीय नौजवान डॉ. तालीमेरेन आओ (Dr. T. Ao). नागालैंड (तत्कालीन असम) की पहाड़ियों से निकलकर ओलंपिक तक का उनका सफर भारतीय खेल इतिहास का वह स्वर्णिम अध्याय है, जिस पर आज भी धूल की मोटी परत जमी है.
असम के मैदानों से उभरा एक सितारा
डॉ. टी. आओ का जन्म 1918 में नागा हिल्स के एक छोटे से गाँव चंगकी में हुआ था. उनकी प्रतिभा को असली उड़ान तब मिली जब वे पढ़ाई के लिए गुवाहाटी आए. कॉटन कॉलेज (Cotton College) के मैदानों पर उनके कदमों की चपलता ने जल्द ही सबका ध्यान खींच लिया.
गुवाहाटी के प्रतिष्ठित 'महाराणा क्लब' से जुड़ने के बाद वे असम के सबसे चहेते खिलाड़ी बन गए. उनका खेल ऐसा था कि कोलकाता के दिग्गज क्लब 'मोहन बागान' ने उन्हें अपनी टीम का हिस्सा बना लिया और वे उस क्लब के कप्तान भी बने. लेकिन उनकी जड़ें हमेशा पूर्वोत्तर के उन्हीं मैदानों से जुड़ी रहीं जहाँ से उन्होंने खेलना शुरू किया था. भारत में हम 'फुटबॉल' खेलते हैं, जबकि आप लोग 'बूटबॉल' खेलते हैं."- 1948 ओलंपिक में ब्रिटिश मीडिया को डॉ. टी. आओ का करारा जवाब.
लंदन में भारतीय स्वाभिमान की दहाड़
फ्रांस के खिलाफ उस ऐतिहासिक मैच में भारत भले ही 2-1 से हार गया, लेकिन भारतीय टीम ने दुनिया का दिल जीत लिया. मैच के बाद जब ब्रिटिश पत्रकारों ने एक अजीब सी मुस्कान के साथ टी. आओ से पूछा कि उनकी टीम बिना जूतों के क्यों खेल रही थी, तो उनके कप्तान का जवाब सीधा और सटीक था. डॉ. आओ के इस एक वाक्य ने न केवल अंग्रेजी मीडिया की बोलती बंद कर दी, बल्कि यह नव-स्वतंत्र भारत के स्वाभिमान और गर्व का सबसे बड़ा प्रतीक बन गया.
जब ठुकरा दिया 'आर्सेनल' का करोड़ों का ऑफर
मैगजीन के पन्नों में जो कहानी अक्सर छूट जाती है, वह ओलंपिक के बाद की है. लंदन ओलंपिक में टी. आओ के शानदार डिफेंडिंग कौशल और चुस्ती को देखकर दुनिया का सबसे प्रतिष्ठित फुटबॉल क्लब 'आर्सेनल' (Arsenal FC) उनका मुरीद हो गया. आर्सेनल के प्रबंधन ने उनके सामने एक बेहद आकर्षक और भारी-भरकम कॉन्ट्रैक्ट रखा. अगर वे उस कागज पर हस्ताक्षर कर देते, तो वे यूरोप में खेलने वाले पहले भारतीय बनते और शोहरत के साथ-साथ अपार दौलत उनके कदमों में होती. लेकिन, टी. आओ ने उस प्रस्ताव को मुस्कुराते हुए नामंजूर कर दिया.
आखिर क्यों छोड़ा फुटबॉल?
इसके पीछे एक बेटे का अपने पिता से किया गया वादा था. जब टी. आओ छोटे थे, तब नागा हिल्स में चिकित्सा सुविधाओं के अभाव के कारण उनके पिता का निधन टाइफाइड से हो गया था. मरते वक्त पिता ने कहा था कि उनका बेटा बड़ा होकर डॉक्टर बने. टी. आओ उस समय कोलकाता के कारमाइकल मेडिकल कॉलेज से अपनी मेडिकल की पढ़ाई कर रहे थे. उन्होंने आर्सेनल से कहा, "मैं एक फुटबॉलर से ज्यादा एक डॉक्टर बनना चाहता हूँ. मेरे लोगों को मेरी जरूरत है."
स्टैथोस्कोप, पहाड़ और एक गुमनाम मसीहा
अपनी मेडिकल की पढ़ाई पूरी करने के बाद, इस महान कप्तान ने पेशेवर फुटबॉल के चमकदार करियर को हमेशा के लिए अलविदा कह दिया और वापस अपनी माटी की ओर लौट आए. उन्होंने नागालैंड के उन सुदूर और दुर्गम पहाड़ी इलाकों में अपनी सेवाएं दीं, जहाँ उस वक्त कोई डॉक्टर जाने को तैयार नहीं होता था. वे नागालैंड के पहले डायरेक्टर ऑफ हेल्थ सर्विसेज बने और राज्य में स्वास्थ्य सुविधाओं का पूरा ढांचा खड़ा किया.
एक विरासत जो आज भी जिंदा है
आज जब हम खेल के मैदानों पर खिलाड़ियों को करोड़ों की डील और विज्ञापनों के पीछे भागते देखते हैं, तो डॉ. तालीमेरेन आओ का जीवन एक सुखद आश्चर्य की तरह लगता है. वे केवल एक शानदार एथलीट नहीं थे; वे पूर्वोत्तर के एक ऐसे विजनरी थे जिन्होंने देश के सम्मान के लिए नंगे पैर दौड़ लगाई और अपने लोगों की जान बचाने के लिए दुनिया की सबसे बड़ी शोहरत को ठुकरा दिया. यह समय है कि हम अपने इस अनाम नायक को इतिहास के पन्नों से बाहर निकालें और उस माटी को नमन करें, जिसने ऐसे सपूत को जन्म दिया.




