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Assam Chunav 2026 : Sarbananda Sonowal असम की राजनी​ति में 'परछाई' या BJP के 'ट्रंप कार्ड'!

असम की राजनीति में Sarbananda Sonowal कभी BJP के सबसे मजबूत और भरोसेमंद चेहरे माने जाते थे. अब वैसा नहीं है. क्या यह उनकी राजनीतिक कमजोरी का संकेत है, या फिर BJP की रणनीति के तहत उन्हें “reserve force” के तौर पर रखा गया है?

Sarbananda Sonowal Assam election 2026
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( Image Source:  Sarbanand Sonowal facebook )

असम की राजनीति में सर्बानंद सोनोवाल का नाम कभी सिर्फ एक नेता का नहीं, बल्कि 'असमिया पहचान' नायक की भी है. छात्र आंदोलन से राजनीति में उभरे और सीएम बने सोनोवाल एक दौर में बीजेपी को राज्य में जड़ें जमाने का रास्ता दिया और 2016 में उसे सत्ता के शिखर तक पहुंचाया. लेकिन वक्त के बदला और उसी के साथ नेतृत्व बदल भी बदल गया. अब वही सोनवाल पहले जितने मुखर या प्रदेश की राजनीति के केंद्र में नजर नहीं आते. सवाल यही है, क्या वे सच में राजनीति की 'परछाई' बन चुके हैं, या फिर अब भी BJP के ऐसे trump card हैं, जिसे सही समय पर खेला जाना बाकी है?

1. क्या एक छात्र नेता सच में “जातीय नायक” बन सकता है?

दरअसल, असम की राजनीति में कुछ कहानियां आंदोलन की धूल से उठकर सत्ता के शिखर तक पहुंचती हैं. सर्बानंद सोनोवाल की कहानी भी ऐसी ही है. All Assam Student Union से निकले सोनोवाल ने शुरुआत में ही यह समझ लिया था कि असम में राजनीति सिर्फ सत्ता नहीं, बल्कि पहचान की लड़ाई है. अवैध प्रवासन और सांस्कृतिक अस्मिता जैसे मुद्दों को उन्होंने सिर्फ भाषण का हिस्सा नहीं बनाया, बल्कि उसे अपनी पहचान बना लिया. यही वजह रही कि वे धीरे-धीरे भीड़ से अलग दिखने लगे, एक ऐसे नेता के रूप में, उभरकर सामने आए जो बोलता कम है, लेकिन सही मुद्दे पर खड़ा होता है.”

2. IMDT Act के खिलाफ लड़ाई ने उन्हें इतिहास में जगह दिलाई?

हर नेता के जिंदगी में एक टर्निंग प्वाइंट आता है. सोनवाल के लिए यह था अवैध प्रवासी अधिकरणों द्वारा निर्धारण अधिनियम के खिलाफ उनकी कानूनी लड़ाई. जब उन्होंने इसे सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी और 2005 में यह कानून रद्द हुआ, तो यह सिर्फ एक कानूनी जीत नहीं थी. यह असम के लोगों के लिए भावनात्मक जीत थी. उसी पल से सोनवाल असम में “जातीय नायक” बन गए. यह टैग उन्हें चुनावों से नहीं, बल्कि संघर्ष से मिला. यही उनकी सबसे बड़ी राजनीतिक पूंजी भी है.

3. क्या BJP को असम में - 'स्थानीय चेहरा' मिल गया था?

साल 2016 का चुनाव असम की राजनीति का टर्निंग प्वाइंट था. बीजेपीको एक ऐसे चेहरे की जरूरत थी जो स्थानीय भी हो और भरोसेमंद भी. और सोनवाल इस कसौटी पर पूरी तरह फिट बैठे थे. उनकी साफ छवि, असमिया पहचान से जुड़ाव और कांग्रेस विरोध की विश्वसनीयता ने उन्हें मुख्यमंत्री की कुर्सी तक पहुंचाया. BJP की यह जीत सिर्फ राजनीतिक बदलाव नहीं थी, बल्कि यह संकेत था कि पार्टी अब असम में “अपना चेहरा” बना चुकी है और वह चेहरा सोनवाल थे.

4. क्या सत्ता के भीतर अब प्रभाव कम हो गया?

लेकिन, सत्ता की कहानी हमेशा सीधी नहीं होती. 2016 में सोनवाल मुख्यमंत्री बने, मगर इसी दौरान एक और नेता तेजी से उभरे बीजेपी में उभरे, वो नाम था हिमंता बिस्वा सरमा. जहां सोनवाल संतुलन और सादगी के प्रतीक थे, वहीं सरमा आक्रामक रणनीति और चुनावी मशीन के रूप में सामने आए. धीरे-धीरे सरकार के भीतर एक दो केंद्र बन गया. ठीक वैसे, जैसे राजनीति में perception ही reality बन जाता है. पहली बार असम में बीजेपी के हाथ सत्ता आने के बाद वहां का परसेप्शन भी बदलने लगा कि असली राजनीतिक नियंत्रण किसके पास है.

5. 2021 में बदलाव साइडलाइन था या रणनीति?

2021 में BJP फिर जीती, लेकिन इस बार मुख्यमंत्री बने हिमंता बिस्वा सरमा और सोनवाल को केंद्र में भेज दिया गया. यह फैसला कई लोगों को साइडलाइन जैसा लगा. लेकिन राजनीति में हर बदलाव हार नहीं होता. कई बार यह रीपोजिशनिंग होती है. केंद्र सरकार में मंत्री बनकर राष्ट्रीय पहचान तो उन्हें मिली, लेकिन राज्य की राजनीति में उनकी मौजूदगी कम हो गई. यहीं से उनका “परछाई” वाली छवि बनने लगी, जो शायद पूरी सच्चाई नहीं है.

6. क्या अब भी सोनवाल BJP के लिए जरूरी हैं?

अगर सतह से नीचे देखें, तो सोनवाल की ताकत आज भी बरकरार है. वे असम में “स्वतंत्र पहचान ” के सबसे भरोसेमंद चेहरों में से एक हैं. उनकी साफ छवि आज भी बीजेपी के एक rare asset है, और वे ऐसे नेता हैं जिन्हें विरोधी भी आसानी से खारिज नहीं कर सकते. वह, असम में बीजेपी के लिए वे एक बैलेंसिंग फैक्टर हैं, जहां आक्रामक राजनीति के साथ एक शांत और स्वीकार्य चेहरा भी जरूरी होता है. यही कारण है कि वे भले spotlight में कम हों, लेकिन सिस्टम के भीतर उनकी अहमियत बनी हुई है.

7. क्या 2026 में फिर से बदल सकता है उनका रोल?

सबसे बड़ा सवाल यही है - क्या सोनवाल अब भी BJP का 'ट्रंप कार्ड' हैं? जवाब पूरी तरह “हां” या “नहीं” में नहीं है, बल्कि परिस्थितियों में छिपा है. अगर असम में एंटी इनकम्बेंसी बढ़ती है, या असमिया पहचान का मुद्दा फिर केंद्र में आता है, तो BJP को एक ऐसे चेहरे की जरूरत होगी जो भरोसेमंद और संतुलित हो. और वहां सोनवाल सबसे आगे खड़े दिखाई दे सकते हैं. इसलिए उन्हें असम की राजनीति में'परछाई' कहना जल्दबाजी होगी. वे शायद बीजेपी के “रिजर्व फोर्स” हैं, जो सही समय पर सबसे बड़ा असर डाल सकती है.

8. कौन हैं सर्बानंद सोनोवाल?

Sarbananda Sonowal एक भारतीय राजनेता हैं, जो असम की राजनीति में प्रमुख चेहरों में गिने जाते हैं. उनका जन्म 31 अक्टूबर 1962 को असम में हुआ. वे छात्र संगठन All Assam Students’ Union से उभरे और असमिया अस्मिता के मुद्दों पर पहचान बनाई. IMDT Act के खिलाफ उनकी कानूनी लड़ाई के बाद उन्हें “जातीय नायक” कहा गया. वे 2016 से 2021 तक असम के मुख्यमंत्री रहे और वर्तमान में केंद्र सरकार में मंत्री हैं. उनकी छवि साफ-सुथरे और शांत नेता की रही है.

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