Begin typing your search...

40 नेट पिचें, 33 सेंटर विकेट और 8 लेन इनडोर प्रैक्टिस एरिया- कैसा है BCCI का 40 एकड़ में फैला Centre of Excellence?

BCCI का Centre of Excellence खिलाड़ियों की ट्रेनिंग, फिटनेस, स्पोर्ट्स साइंस और रिहैब से जुड़ी आधुनिक सुविधाओं वाला बड़ा सेंटर है, लेकिन भारतीय खिलाड़ियों की लगातार चोटों के बीच अब इसकी कार्यप्रणाली पर सवाल उठ रहे हैं.

BCCI Centre of Excellence Explained
X

BCCI Centre of Excellence 

BCCI का Centre of Excellence खिलाड़ियों की ट्रेनिंग, फिटनेस, स्पोर्ट्स साइंस और रिहैब से जुड़ी आधुनिक सुविधाओं वाला बड़ा सेंटर है. हालांकि, भारतीय खिलाड़ियों की लगातार चोटों के बीच अब इसकी कार्यप्रणाली पर सवाल उठ रहे हैं.

CoE प्रमुख VVS Laxman ने साफ कहा है कि यह सिर्फ रिहैब सेंटर नहीं है और खिलाड़ियों को तय फिटनेस मानक पूरा किए बिना रिलीज नहीं किया जाता. वहीं, Sports Science & Medicine विभाग के प्रमुख पद का लंबे समय से खाली होना भी चर्चा में है.

कितने एकड़ में फैला है BCCI का Centre of Excellence?

भारतीय क्रिकेट को आधुनिक सुविधाएं देने के उद्देश्य से बेंगलुरु में BCCI ने Centre of Excellence यानी CoE तैयार किया है. यह करीब 40 एकड़ में फैला हुआ हाई-परफॉर्मेंस सेंटर है, जिसे खिलाड़ियों की ट्रेनिंग, फिटनेस, स्पोर्ट्स साइंस, चोट से उबरने और प्रदर्शन को बेहतर करने के लिए तैयार किया गया है. BCCI ने हाल ही में सोशल मीडिया पोस्ट में CoE की सुविधाओं को बताते हुए कहा कि यहां 3 फुल-साइज क्रिकेट ग्राउंड, 40 नेट पिच और 33 सेंटर विकेट हैं.

इसके अलावा, 8-लेन का इंडोर प्रैक्टिस एरिया और करीब 16,000 वर्ग फुट का हाई-परफॉर्मेंस जिम भी मौजूद है. यानी यह सिर्फ क्रिकेट खेलने की जगह नहीं है, बल्कि खिलाड़ियों की पूरी तैयारी पर काम करने वाला हाई-परफॉर्मेंस सेंटर है.

फिर CoE पर सवाल क्यों उठ रहे हैं?

CoE को लेकर चर्चा उस समय तेज हुई है, जब भारतीय क्रिकेटरों के बीच लगातार चोटों के मामले सामने आ रहे हैं. टीम के कई खिलाड़ियों को फिटनेस और इंजरी से जुड़ी परेशानियों का सामना करना पड़ा है. ऐसे में सवाल उठ रहा है कि जब BCCI के पास इतनी आधुनिक सुविधाओं वाला सेंटर है, तो खिलाड़ियों की चोटों को रोकने और उन्हें पूरी तरह फिट रखने की व्यवस्था कितनी प्रभावी है? इसी सवाल के बीच CoE के प्रमुख VVS Laxman ने सेंटर की भूमिका को लेकर स्थिति स्पष्ट करने की कोशिश की है.

VVS Laxman बोले- CoE सिर्फ Rehabilitation Centre नहीं

VVS Laxman ने साफ कहा कि Centre of Excellence को सिर्फ रिहैबिलिटेशन सेंटर समझना सही नहीं है. उनके मुताबिक, CoE का उद्देश्य खिलाड़ियों को चोट लगने के बाद ठीक करना भर नहीं, बल्कि हर दिन उनके प्रदर्शन और फिटनेस में सुधार की दिशा में काम करना है. Laxman ने यह भी कहा कि CoE, टीम मैनेजमेंट, चयनकर्ता और Sports Science & Medicine टीम के बीच अच्छा तालमेल है. उनके मुताबिक, चयन समिति जब किसी खिलाड़ी की फिटनेस रिपोर्ट मांगती है तो CoE उसकी स्थिति का आकलन करके रिपोर्ट साझा करता है.

Bumrah और Sai Sudharsan के मामले में क्या हुआ?

हाल में जसप्रीत बुमराह और साई सुदर्शन को श्रीलंका के खिलाफ टेस्ट सीरीज के लिए टीम में शामिल किया गया था, लेकिन उनकी उपलब्धता फिटनेस क्लियरेंस पर निर्भर थी. यही बात बाद में चर्चा का विषय बनी कि अगर खिलाड़ी पूरी तरह फिट नहीं थे तो उन्हें टीम में चुना ही क्यों गया? VVS Laxman ने बताया कि टीम का चयन आम तौर पर सीरीज शुरू होने से कई सप्ताह पहले होता है. उस समय किसी खिलाड़ी की चोट की स्थिति बाद में बदल सकती है.

BCCI सचिव देवजीत सैकिया ने भी इसी बात पर जोर दिया कि खिलाड़ी मशीन नहीं हैं. चयन के समय जो स्थिति होती है, वह कुछ सप्ताह बाद बदल सकती है. इसलिए किसी खिलाड़ी को सिर्फ उस तारीख की फिटनेस स्थिति के आधार पर हमेशा के लिए टीम से बाहर नहीं किया जाता.

'फिटनेस टेस्ट पास किए बिना CoE से रिलीज नहीं होते खिलाड़ी'

CoE की प्रक्रिया को लेकर Laxman ने एक अहम बात कही. उनके मुताबिक, खिलाड़ियों के लिए Sports Science & Medicine और Strength & Conditioning टीम के साथ मिलकर कुछ फिटनेस पैरामीटर और बेंचमार्क तय किए गए हैं. जब तक खिलाड़ी उन मानकों को पूरा नहीं कर लेता, तब तक उसे CoE से टीम में वापस नहीं भेजा जाता. मतलब खिलाड़ी का सिर्फ चोट से दर्द खत्म हो जाना पर्याप्त नहीं है. उसे मैच खेलने के स्तर की फिटनेस हासिल करनी होती है, ताकि टीम में लौटने के बाद वह पहले ही मैच से अपना सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन कर सके.

CoE में आखिर-क्या-क्या सुविधाएं हैं?

BCCI के मुताबिक Centre of Excellence में खिलाड़ियों के लिए कई आधुनिक सुविधाएं मौजूद हैं, जिनका मकसद खिलाड़ियों को अलग-अलग परिस्थितियों में तैयार करना और उनकी फिटनेस को वैज्ञानिक तरीके से मॉनिटर करना है. मुख्य सुविधाओं में शामिल हैं;

  • 40 एकड़ में फैला बड़ा हाई-परफॉर्मेंस कैंपस
  • 3 फुल-साइज क्रिकेट ग्राउंड
  • 40 नेट पिच
  • 33 सेंटर विकेट
  • 8-लेन इंडोर प्रैक्टिस एरिया
  • 16,000 वर्ग फुट का हाई-परफॉर्मेंस जिम
  • अलग-अलग तरह की मिट्टी वाली पिचों पर अभ्यास की सुविधा
  • स्पोर्ट्स साइंस और मेडिसिन से जुड़ी सुविधाएं
  • फिजियोथेरेपी और रिहैब से जुड़ी व्यवस्थाएं
  • रिकवरी के लिए जकूजी और मसाज जैसी सुविधाएं

तीन तरह की मिट्टी और अलग-अलग परिस्थितियों में अभ्यास

CoE की खास बात सिर्फ मैदानों और जिम तक सीमित नहीं है. यहां अलग-अलग तरह की पिच और मिट्टी की व्यवस्था भी की गई है. इसका फायदा यह है कि भारतीय खिलाड़ी देश-विदेश की अलग-अलग परिस्थितियों के मुताबिक अपनी बल्लेबाजी और गेंदबाजी की तैयारी कर सकते हैं यानी खिलाड़ी को सिर्फ नेट में गेंद खेलने की ट्रेनिंग नहीं मिलती, बल्कि पिच और परिस्थितियों के हिसाब से तैयारी करने पर भी जोर दिया जाता है.

सिर्फ क्रिकेटरों के लिए नहीं है Sports Science सुविधा

Centre of Excellence की Sports Science और Medicine से जुड़ी सुविधाओं का इस्तेमाल सिर्फ क्रिकेटरों तक सीमित नहीं रखा गया है. देश के शीर्ष स्तर के ओलंपिक खिलाड़ियों को भी इन सुविधाओं का लाभ देने की व्यवस्था की गई है. इसका मकसद भारत में हाई-परफॉर्मेंस स्पोर्ट्स साइंस का एक मजबूत सिस्टम तैयार करना है. यही वजह है कि CoE को भारतीय क्रिकेट के साथ-साथ भारतीय खेलों के लिए भी एक बड़े हाई-परफॉर्मेंस हब के तौर पर देखा जाता है.

फिर भी SSM Head का पद क्यों खाली है?

यहां एक अहम सवाल BCCI के Sports Science and Medicine (SSM) विभाग को लेकर है. Nitin Patel के मार्च 2025 में पद छोड़ने के बाद से CoE में SSM Head का पद खाली है. VVS Laxman के मुताबिक, BCCI ने इस पद को भरने के लिए कई प्रयास किए, लेकिन अब तक उपयुक्त उम्मीदवार नहीं मिल पाया.

पूर्व भारतीय टीम फिजियो Andrew Leipus से भी इस पद को लेकर बातचीत हुई थी. कई दौर की चर्चा के बाद उन्होंने पारिवारिक कारणों का हवाला देते हुए प्रस्ताव से पीछे हटने का फैसला किया. इसके बाद कुछ अन्य उम्मीदवार भी सामने आए, लेकिन बेंगलुरु में फुल-टाइम नौकरी करने की शर्त बड़ी चुनौती बन गई.

विदेशी विशेषज्ञ भी पद लेने से पीछे हटे

Laxman के मुताबिक, BCCI ने पूरी प्रक्रिया के बाद पांच उम्मीदवारों को शॉर्टलिस्ट किया था. इनमें एक ऑस्ट्रेलियाई विशेषज्ञ भी था, लेकिन उसने बेंगलुरु शिफ्ट होने में असमर्थता जताई. न्यूजीलैंड की रग्बी टीम All Blacks के Sports Science विभाग से जुड़े एक विशेषज्ञ से भी बातचीत हुई थी. वह भी अंतिम समय में इस भूमिका को स्वीकार नहीं कर सके. फिलहाल वरिष्ठ फिजियो धनंजय कौशिक SSM विभाग की जिम्मेदारी संभाल रहे हैं.

क्या CoE और टीम मैनेजमेंट में तालमेल की कमी है?

चोटों की बढ़ती संख्या के बीच यह सवाल भी उठा कि क्या टीम मैनेजमेंट, चयनकर्ता और CoE के बीच तालमेल ठीक नहीं है... लेकिन VVS Laxman ने इस बात से इनकार किया. उन्होंने कहा कि वह किसी को दोष देने की भाषा में बात नहीं करना चाहते. उनके अनुसार CoE, पुरुष और महिला टीमों के मैनेजमेंट, Sports Science & Medicine स्टाफ और चयन समिति के बीच लगातार संवाद होता है. किसी खिलाड़ी की फिटनेस को लेकर बदलाव आता है तो इसकी जानकारी चयन समिति और टीम मैनेजमेंट तक पहुंचाई जाती है.

असली चुनौती अब चोट रोकने की है

Centre of Excellence में सुविधाओं की कमी नहीं है. बड़े मैदान, दर्जनों पिच, इंडोर प्रैक्टिस एरिया, हाई-परफॉर्मेंस जिम और स्पोर्ट्स साइंस की सुविधाएं इसे दुनिया के आधुनिक क्रिकेट ट्रेनिंग सेंटरों में शामिल करती हैं... लेकिन भारतीय क्रिकेट में लगातार चोटों के बीच अब असली परीक्षा सिर्फ CoE की सुविधाओं की नहीं, बल्कि इन सुविधाओं के इस्तेमाल और उसके नतीजों की है.

BCCI का दावा है कि खिलाड़ियों को तय फिटनेस बेंचमार्क पूरा किए बिना वापस नहीं भेजा जाता. वहीं, SSM Head की खाली पोस्ट यह सवाल जरूर खड़ा करती है कि इतने बड़े हाई-परफॉर्मेंस सिस्टम को लंबे समय तक पूरी क्षमता के साथ चलाने के लिए विशेषज्ञ नेतृत्व कितना जरूरी है. आने वाले समय में यही देखना अहम होगा कि CoE भारतीय खिलाड़ियों की फिटनेस, चोट से बचाव और मैदान पर उपलब्धता को कितना बेहतर कर पाता है.

क्रिकेट न्‍यूज
अगला लेख