शीतला अष्टमी पर क्यों लगाया जाता है मां को बासी भोग ? जानिए इस व्रत का महत्व और नियम
शीतला अष्टमी का व्रत मां शीतला को समर्पित होता है और इस दिन विशेष रूप से बासी भोजन का भोग लगाया जाता है, लेकिन क्या आप जानते हैं क्यों?
11 मार्च को शीतला अष्टमी का व्रत रखा जा रहा है. हिंदू पंचांग के अनुसार चैत्र माह की सप्तमी और अष्टमी तिथि को मां शीतला की विशेष पूजा-अर्चना की जाती है. शीतला अष्टमी व्रत को बसोड़ा के नाम भी जाना जाता है. हिंदू धर्म में शीतला अष्टमी का पर्व बड़ी श्रद्धा और आस्था के साथ मनाया जाता है. शीतला अष्टमी का यह पर्व हर साल चैत्र मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को मनाया जाता है. इस दिन माता शीतला की पूजा-अर्चना करने की परंपरा है. धार्मिक मान्यता के अनुसार माता शीतला को रोगों और कष्टों से रक्षा करने वाली देवी माना जाता है.
ऐसी मान्यता है कि मां की कृपा से भक्तों के कई तरह के रोगों और कष्टों से मुक्ति मिलती है. धार्मिक मान्यता है इस दिन विधि-विधान से माता की पूजा करने और कुछ विशेष नियमों का पालन करने से घर में सुख-शांति, स्वास्थ्य और समृद्धि बनी रहती है. कई क्षेत्रों में इस दिन माता को बासी या ठंडे भोजन का भोग लगाया जाता है. आइए जानते हैं शीतला अष्टमी का महत्व और इस दिन बासी और ठंडे भोजन का भोग क्यों लगाया जाता है और क्या हैं इस व्रत के पूजा नियम.
शीतला अष्टमी व्रत का महत्व
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार माता शीतला को स्वच्छता और स्वास्थ्य की देवी माना गया है. विशेष रूप से बच्चों के स्वास्थ्य और रोगों से रक्षा के लिए भी इस दिन माता की पूजा की जाती है. शीतला माता की पूजा करने से घर-परिवार में फैली नकारात्मक ऊर्जा दूर होती है. यह त्योहार स्वास्थ्य, स्वच्छता और प्रकृति के संतुलन से भी जुड़ा है. पौराणिक मान्यता के अनुसार ब्रह्मा जी ने संसार को रोगों से मुक्त रखने की जिम्मेदारी देवी शीतला को सौंपी थी. तभी से इस तिथि पर उनकी पूजा करने की परंपरा चली आ रही है. माता शीतला को स्वास्थ्य और स्वच्छता की अधिष्ठात्री देवी माना जाता है. माना जाता है कि उनकी पूजा करने से ज्वर, चेचक, त्वचा रोग, फोड़े-फुंसी और अन्य संक्रामक रोगों से रक्षा मिलती है.
शीतला माता को बासी भोजन का भोग लगाने की मान्यता
शीतला अष्टमी के दिन माता को ठंडा या बासी भोजन चढ़ाने की परंपरा को बसोड़ा कहा जाता है. धार्मिक मान्यता है कि माता शीतला को शीतलता अत्यंत प्रिय है, इसलिए इस दिन गरम भोजन नहीं बनाया जाता. इस दिन माता को एक दिन पहले तैयार किया गया भोजन ही अर्पित किया जाता है. लोकमान्यता के अनुसार माता का स्वभाव शांत और शीतल माना जाता है, इसलिए उनकी पूजा में भी शीतलता का विशेष महत्व बताया गया है. इस दिन चूल्हा जलाने की परंपरा नहीं मानी जाती. शीतला अष्टमी की पूजा अन्य पर्वों की तुलना में कुछ अलग और विशेष मानी जाती है. इस दिन पूजा की तैयारी एक दिन पहले से ही शुरू हो जाती है. सप्तमी तिथि की रात को माता के भोग के लिए मीठे चावल, पुए, हलवा, पूड़ी और दूसरे पकवान बनाए जाते हैं. अष्टमी के दिन इन्हीं व्यंजनों को बासी रूप में माता को नैवेद्य के रूप में अर्पित किया जाता है.
शीतला अष्टमी के दिन क्या करें
- इस दिन सुबह जल्दी उठकर स्नान करें और स्वच्छ वस्त्र धारण करें.
- इसके बाद शीतला माता की विधिपूर्वक पूजा करें.
- पूजा के दौरान माता को हल्दी मिश्रित शीतल जल अर्पित करना शुभ माना जाता है.
- मिट्टी के नए या शुद्ध पात्र में भरे जल से माता का अभिषेक करना भी शुभ माना जाता है.
- एक दिन पहले तैयार किए गए ठंडे भोजन का भोग माता को लगाएं .
शीतला अष्टमी के दिन क्या न करें
- इस दिन नया भोजन बनाना वर्जित माना जाता है.
- चूल्हा या गैस जलाने से बचने की परंपरा मानी जाती है.
- शीतला अष्टमी पर ठंडा या बासी भोजन ही खाना चाहिए.




