संसार में पहली राखी किसने किसको बांधी? अपने भाई को राखी बांधते समय इस मंत्र का जरूर करें जाप
पहली राखी किसने किसको बांधी? जानें शची-इंद्र, लक्ष्मी-बलि और द्रौपदी-कृष्ण से जुड़ी रक्षाबंधन की पौराणिक कथाएं और राखी बांधने का मंत्र.
आज देशभर में रक्षाबंधन का त्योहार पूरे उत्साह और उमंग के साथ मनाया जा रहा है. घरों में राखी की रौनक है और बहनें अपने भाइयों की कलाई पर रक्षा सूत्र बांधकर उनकी सुख-समृद्धि और लंबी उम्र की कामना कर रही हैं. वहीं, भाई भी बहनों की रक्षा और हर परिस्थिति में उनका साथ देने का संकल्प लेते हैं. लेकिन क्या आप जानते हैं कि राखी बांधने की यह परंपरा आखिर शुरू कैसे हुई?
रक्षाबंधन का रिश्ता सिर्फ भाई-बहन के प्रेम तक ही नहीं है, बल्कि इसके पीछे कई पौराणिक कथाएं और धार्मिक मान्यताएं भी जुड़ी हैं. माता लक्ष्मी और राजा बलि से लेकर शची और देवराज इंद्र तथा द्रौपदी और भगवान श्रीकृष्ण तक, रक्षासूत्र से जुड़ी कई कथाएं आज भी लोगों के बीच प्रचलित हैं. आइए जानते हैं रक्षाबंधन की इन रोचक पौराणिक कथाओं की पूरी कहानी.
राखी को लेकर कई धार्मिक कथाएं प्रचलित हैं. कहीं माता लक्ष्मी और राजा बलि का प्रसंग मिलता है, तो कहीं देवराज इंद्र और उनकी पत्नी शची की कथा को सबसे पुराने रक्षासूत्र से जोड़ा जाता है. महाभारत में द्रौपदी और भगवान श्रीकृष्ण का प्रसंग भी भाई-बहन के स्नेह और रक्षा के भाव को समझाने वाली सबसे लोकप्रिय कथाओं में शामिल है.
राजा बलि और माता लक्ष्मी की कहानी क्या है?
रक्षाबंधन से जुड़ी सबसे प्रसिद्ध पौराणिक कथाओं में भगवान विष्णु, राजा बलि और माता लक्ष्मी का प्रसंग आता है. मान्यता के अनुसार, दानवीर राजा बलि ने अश्वमेध यज्ञ किया था. इसी दौरान भगवान विष्णु ने वामन अवतार धारण किया और राजा बलि से तीन पग भूमि दान में मांगी. राजा बलि ने वामन रूप में आए भगवान को वचन दे दिया. इसके बाद भगवान ने अपने विराट स्वरूप से दो पग में पृथ्वी और आकाश नाप लिया. तीसरा कदम रखने के लिए स्थान बचा तो राजा बलि ने अपना सिर आगे कर दिया.
भगवान विष्णु राजा बलि की भक्ति और दानशीलता से प्रसन्न हुए. इसके बाद उन्हें पाताल लोक का अधिकार दिया गया. कथा के एक प्रचलित रूप के अनुसार, राजा बलि ने भगवान विष्णु से आग्रह किया कि वे उनके साथ पाताल लोक में रहें. भगवान अपने भक्त को निराश नहीं करना चाहते थे, इसलिए उन्होंने बलि की बात स्वीकार कर ली. राजा बलि ने भगवान से ऐसा वचन ले लिया कि जब भी वे सोएं या जागें, उनकी नजर जहां तक जाए, वहां भगवान विष्णु ही दिखाई दें. इस तरह भगवान विष्णु पाताल लोक में राजा बलि के साथ रहने लगे.
भगवान विष्णु के पाताल जाने से चिंतित हुईं माता लक्ष्मी
उधर वैकुंठ में माता लक्ष्मी भगवान विष्णु के लंबे समय तक वापस न आने से चिंतित हो गईं. तभी देवर्षि नारद वहां पहुंचे. माता लक्ष्मी ने नारद जी से भगवान विष्णु के बारे में पूछा. नारद जी ने बताया कि भगवान विष्णु राजा बलि के यहां पाताल लोक में हैं. माता लक्ष्मी ने भगवान विष्णु को वापस लाने का उपाय पूछा. तब नारद जी ने उन्हें एक उपाय बताया. उन्होंने कहा कि माता लक्ष्मी राजा बलि को अपना भाई बनाकर उनसे रक्षा का वचन लें. इसके बाद राजा बलि से उपहार मांगने के समय भगवान विष्णु को वापस मांग लें.
माता लक्ष्मी ने राजा बलि को बांधी राखी
कथा के अनुसार, माता लक्ष्मी ने एक साधारण स्त्री का रूप धारण किया और राजा बलि के पास पहुंचीं. राजा बलि ने जब उन्हें उदास देखा तो कारण पूछा. माता लक्ष्मी ने कहा कि उनका कोई भाई नहीं है और इसी कारण वह दुखी हैं. राजा बलि ने उन्हें अपनी धर्म बहन स्वीकार कर लिया. इसके बाद माता लक्ष्मी ने राजा बलि की कलाई पर रक्षा सूत्र बांधा. रक्षा सूत्र बांधने के बाद जब राजा बलि ने बहन से उपहार मांगने को कहा, तो माता लक्ष्मी ने भगवान विष्णु को वापस मांग लिया. राजा बलि समझ गए कि यह कोई साधारण स्त्री नहीं बल्कि स्वयं माता लक्ष्मी हैं. उन्होंने भगवान विष्णु को उनके साथ वैकुंठ जाने की अनुमति दे दी. इसी कथा को कई लोक परंपराओं में रक्षाबंधन की शुरुआत से जोड़ा जाता है.
क्या इंद्राणी ने सबसे पहले रक्षासूत्र बांधा था?
रक्षाबंधन को लेकर एक अन्य प्राचीन कथा भविष्य पुराण से जुड़ी बताई जाती है. पौराणिक मान्यता के अनुसार, एक समय देवताओं और असुरों के बीच भयंकर युद्ध हुआ. इस युद्ध में देवराज इंद्र की स्थिति कमजोर पड़ने लगी. तब इंद्र की पत्नी शची, जिन्हें इंद्राणी भी कहा जाता है, ने गुरु बृहस्पति के निर्देश पर श्रावण पूर्णिमा के दिन इंद्र की कलाई पर रक्षासूत्र बांधा. मान्यता है कि इस रक्षा सूत्र ने इंद्र को आत्मविश्वास और शक्ति प्रदान की तथा अंततः देवताओं को युद्ध में विजय मिली. इसी कारण कुछ परंपराओं में शची द्वारा इंद्र को बांधे गए रक्षासूत्र को रक्षाबंधन की सबसे पुरानी परंपराओं में गिना जाता है.
द्रौपदी और भगवान श्रीकृष्ण का रक्षा सूत्र
रक्षाबंधन से जुड़ा महाभारत का प्रसंग भी बेहद लोकप्रिय है. कथा के अनुसार, एक अवसर पर भगवान श्रीकृष्ण की उंगली में चोट लग गई और उससे रक्त निकलने लगा. यह देखकर द्रौपदी ने तुरंत अपनी साड़ी का एक हिस्सा फाड़ा और उसे श्रीकृष्ण की उंगली पर बांध दिया. द्रौपदी के इस स्नेह और अपनत्व को श्रीकृष्ण ने हमेशा याद रखा. बाद में जब द्रौपदी का चीरहरण करने का प्रयास किया गया, तब श्रीकृष्ण ने उसकी लाज बचाई. धार्मिक कथाओं में इस प्रसंग को भाई-बहन जैसे पवित्र स्नेह और रक्षा के भाव से जोड़ा जाता है. हालांकि, यह ध्यान रखना जरूरी है कि महाभारत के इस प्रसंग को आधुनिक अर्थों में रक्षाबंधन की ऐतिहासिक शुरुआत मानने के बजाय एक लोकप्रिय धार्मिक कथा के रूप में देखा जाता है.
यमराज और यमुना की कथा भी है खास
राखी से जुड़ी एक अन्य लोकप्रचलित कथा यमराज और उनकी बहन यमुना की है. मान्यता के अनुसार, यमुना ने अपने भाई यमराज को अपने घर बुलाया और उनका स्वागत किया. उन्होंने यमराज की कलाई पर रक्षा सूत्र बांधा और उनके सुख-समृद्धि की कामना की. यमराज अपनी बहन के प्रेम से प्रसन्न हुए और उन्हें वरदान दिया. इसी वजह से कई परंपराओं में रक्षाबंधन को भाई-बहन के रिश्ते के साथ-साथ दीर्घायु और मंगलकामना से भी जोड़ा जाता है.
राखी बांधते समय कौन सा मंत्र पढ़ा जाता है?
रक्षाबंधन पर रक्षा सूत्र बांधते समय एक प्रसिद्ध मंत्र का उच्चारण किया जाता है- 'येन बद्धो बलि राजा, दानवेन्द्रो महाबलः. तेन त्वामभिबध्नामि, रक्षे मा चल मा चल॥' इस मंत्र का भावार्थ है कि जिस रक्षा सूत्र से महाबली दानवेंद्र राजा बलि को बांधा गया था, उसी रक्षा सूत्र से मैं तुम्हें बांधता/बांधती हूं. हे रक्षा सूत्र, तुम अपने संकल्प से कभी विचलित न होना. यह मंत्र राखी के मूल भाव को सामने रखता है- रक्षा, विश्वास और अपने संकल्प पर अडिग रहने का भाव.
रक्षाबंधन सिर्फ भाई की कलाई पर राखी बांधने का पर्व नहीं
समय के साथ रक्षाबंधन का स्वरूप भी व्यापक हुआ है. आज यह पर्व केवल भाई की कलाई पर राखी बांधने तक सीमित नहीं है. बहन भाई की खुशहाली और सुरक्षा की कामना करती है, जबकि भाई भी बहन के सम्मान, सुख और सुरक्षा के प्रति अपने प्रेम और जिम्मेदारी का संकल्प व्यक्त करता है. इस पर्व का सबसे महत्वपूर्ण संदेश महंगे उपहार या दिखावे में नहीं, बल्कि रिश्ते की मजबूती में है. राखी एक धागा जरूर है, लेकिन इसके साथ जुड़ा भाव भाई-बहन के बीच विश्वास और अपनापन है.
राखी का असली मैसेज क्या है?
रक्षाबंधन का अर्थ केवल एक-दूसरे को राखी बांधना नहीं है. यह पर्व याद दिलाता है कि रिश्ते सिर्फ रस्मों से नहीं, बल्कि विश्वास, सम्मान और जिम्मेदारी से मजबूत होते हैं. पौराणिक कथाओं में कहीं शची अपने पति की रक्षा के लिए रक्षासूत्र बांधती हैं, कहीं माता लक्ष्मी राजा बलि को भाई बनाकर भगवान विष्णु को वापस लाती हैं और कहीं द्रौपदी का छोटा-सा कपड़े का टुकड़ा श्रीकृष्ण के साथ उसके आत्मीय रिश्ते का प्रतीक बन जाता है. इन सभी कथाओं में एक बात समान दिखाई देती है. रक्षा सूत्र का मूल्य उसके धागे में नहीं, बल्कि उसके पीछे छिपे प्रेम, विश्वास और संकल्प में है. इसलिए रक्षाबंधन को केवल फैशन या दिखावे का पर्व बनाने के बजाय इसके भाव को समझना ज्यादा महत्वपूर्ण है. राखी का यह धागा भाई-बहन के रिश्ते में प्रेम, सम्मान और हमेशा साथ खड़े रहने की भावना को मजबूत करने का अवसर है.




