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जब भक्त की पुकार पर प्रकट हुए भगवान नृसिंह, इस दिन विष्णु के चौथे अवतार की विशेष पूजा का महत्व

भगवान नृसिंह को भगवान विष्णु का चौथा अवतार माना जाता है, जिन्होंने अपने भक्त प्रह्लाद की रक्षा के लिए प्रकट होकर अधर्म का अंत किया था. नृसिंह जयंती के दिन उनकी विशेष पूजा करने से भय, संकट और नकारात्मक शक्तियों से मुक्ति मिलने की मान्यता है.

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जब भक्त की पुकार पर प्रकट हुए भगवान नृसिंह

( Image Source:  chatgpt )
State Mirror Astro
By: State Mirror Astro4 Mins Read

Updated on: 30 April 2026 6:30 AM IST

वैशाख मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी तिथि को नृसिंह जयंती बड़े श्रद्धा और उत्साह के साथ मनाई जाती है. धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इसी पावन तिथि पर भगवान विष्णु ने अपने चौथे अवतार भगवान नृसिंह का प्राकट्य किया था. इस वर्ष यह पर्व 30 अप्रैल, गुरुवार को मनाया जाएगा. यह दिन भक्त और भगवान विष्णु के प्रति भक्ति और श्रद्धा का अटूट संबंध और धर्म की विजय का प्रतीक माना जाता है.

नृसिंह अवतार इस बात का संदेश देता है कि जब भी अधर्म बढ़ता है और धर्म संकट में पड़ता है, तब ईश्वर किसी न किसी रूप में अवतरित होकर अपने भक्तों की रक्षा करते हैं. भगवान नृसिंह का रूप आधा मानव और आधा सिंह का था, जो उनकी अद्भुत और दिव्य शक्ति को दर्शाता है.

नृसिंह जयंती की पूजा-विधि

इस दिन प्रातःकाल ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नान कर स्वच्छ और शुद्ध वस्त्र धारण करें. घर के पूजा स्थान को साफ कर एक चौकी स्थापित करें और उस पर लाल, पीले या सफेद वस्त्र बिछाएं. इसके बाद भगवान नृसिंह और माता लक्ष्मी की मूर्ति या चित्र स्थापित करें. पूजा के दौरान भगवान को पंचामृत, फल, फूल, पंचमेवा, नारियल, अक्षत, कुमकुम, केसर और पीत वस्त्र अर्पित करें. विशेष रूप से चंदन का प्रयोग करना अत्यंत शुभ माना जाता है, क्योंकि यह भगवान के उग्र रूप को शीतलता प्रदान करता है. श्रद्धा भाव से “ॐ नरसिंहाय वरप्रदाय नमः” मंत्र का जाप करें. इस दिन व्रत रखने का भी विशेष महत्व है. साथ ही, जरूरतमंद लोगों को ठंडी वस्तुओं जैसे जल, शरबत या फल का दान करना पुण्यदायी माना जाता है.

क्यों लिया भगवान विष्णु ने नृसिंह अवतार?

पुराणों के अनुसार, हिरण्यकशिपु नामक असुर राजा अत्यंत शक्तिशाली और अहंकारी था. उसने कठोर तपस्या करके ऐसा वरदान प्राप्त कर लिया था कि उसे न मनुष्य मार सके, न कोई जानवर, न दिन में, न रात में, न धरती पर, न आकाश में, न अस्त्र से, न शस्त्र से. इस वरदान के कारण वह स्वयं को अजेय समझने लगा और भगवान विष्णु का विरोध करने लगा. उसने अपने राज्य में विष्णु भक्ति पर प्रतिबंध लगा दिया. लेकिन उसका पुत्र प्रह्लाद बचपन से ही भगवान विष्णु का परम भक्त था. हिरण्यकशिपु ने कई बार प्रह्लाद को समझाने की कोशिश की, लेकिन जब वह नहीं माना तो उसे मारने के अनेक प्रयास किए. कभी उसे ऊंचाई से गिराया गया, कभी विष दिया गया, तो कभी अग्नि में जलाने का प्रयास किया गया. उसकी बहन होलिका, जिसे अग्नि से न जलने का वरदान था, प्रह्लाद को लेकर अग्नि में बैठी, लेकिन भगवान की कृपा से प्रह्लाद सुरक्षित रहा और होलिका जलकर भस्म हो गई.

अंततः जब हिरण्यकशिपु स्वयं प्रह्लाद को मारने के लिए तैयार हुआ, तब भगवान विष्णु ने संध्या समय खंभे से नृसिंह रूप में प्रकट होकर उसका वध किया. उन्होंने न तो अस्त्र का प्रयोग किया, न शस्त्र का, बल्कि अपने नखों से उसे मार डाला.इस प्रकार वरदान की हर शर्त को पूरा करते हुए अधर्म का अंत किया.

नृसिंह जयंती का महत्व

भगवान अपने भक्तों की रक्षा के लिए किसी भी रूप में आ सकते हैं. नृसिंह जयंती का दिन साहस, आस्था और धर्म के मार्ग पर चलने की प्रेरणा देता है. इस दिन श्रद्धा और नियमपूर्वक पूजा करने से भय, बाधाओं और नकारात्मक शक्तियों से मुक्ति मिलती है तथा जीवन में सुख-शांति और समृद्धि का आगमन होता है.

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