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मेहंदी का प्रसाद और शादी की आस... जयपुर का मोती डूंगरी मंदिर क्यों चर्चा में, जानें इसके बारे में और यहां की मान्यता

मोती डूंगरी गणेश मंदिर में सिंजारा पर्व की मेहंदी का प्रसाद बेहद खास माना जाता है. हर साल हजारों श्रद्धालु इसे पाने के लिए मंदिर पहुंचते हैं. खासकर अविवाहित युवक-युवतियों के बीच इस मेहंदी को लेकर विशेष आस्था है. मान्यता है कि इसे लगाने से विवाह की मनोकामना पूरी होती है. आखिर क्या है इस परंपरा का महत्व और इतिहास.

मेहंदी का प्रसाद और शादी की आस... जयपुर का मोती डूंगरी मंदिर क्यों चर्चा में, जानें इसके बारे में और यहां की मान्यता
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जयपुर के प्रसिद्ध मोती डूंगरी गणेश मंदिर में सिंजारा पर्व पर भगवान गणेश को मेहंदी अर्पित करने और बाद में उसे प्रसाद के रूप में श्रद्धालुओं को बांटने की परंपरा बेहद खास मानी जाती है. यह परंपरा करीब 200 साल पुरानी है. हालांकि यह प्रथा ठीक किस वर्ष शुरू हुई, इसका रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं है.

हर साल गणेश चतुर्थी से पहले सिंजारा के दिन बड़ी मात्रा में मेहंदी सोजत से मंगाई जाती है. इसे पहले भगवान गणेश को अर्पित किया जाता है और फिर भक्तों में प्रसाद के तौर पर वितरित किया जाता है. यहां भगवान गणेश को पंचामृत से स्नान भी कराया जाता है.

इस बार भी मोती डूंगरी मंदिर में सिंजारा उत्सव के दौरान करीब 3500 किलो मेहंदी सोजत से मंगाई गई. मेहंदी पूजन के बाद इसे श्रद्धालुओं में बांटा जाना था, लेकिन भक्तों की भारी भीड़ को देखते हुए वितरण तय समय से पहले शुरू करना पड़ा.

राजस्थान के अलावा मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, हरियाणा, गुजरात, दिल्ली, छत्तीसगढ़ और पश्चिम बंगाल समेत कई राज्यों से लोग जयपुर पहुंचे. मंदिर के आसपास लंबी कतारें लग गईं और कई श्रद्धालु रात से ही मेहंदी प्रसाद लेने के लिए इंतजार करते नजर आए.

शादी की मनोकामना से जुड़ी है खास मान्यता

मोती डूंगरी की मेहंदी को लेकर सबसे ज्यादा चर्चा अविवाहित युवक-युवतियों के बीच रहती है. श्रद्धालुओं के बीच मान्यता है कि भगवान गणेश को अर्पित की गई इस मेहंदी को प्रसाद के रूप में लगाने से विवाह की मनोकामना पूरी हो सकती है.

इसी वजह से सिंजारा के दिन मंदिर में बड़ी संख्या में कुंवारे युवक-युवतियां पहुंचते हैं. कुछ भक्त इसे घर ले जाकर परिवार के सदस्यों को भी लगाते हैं. हालांकि जल्दी विवाह होने की बात धार्मिक आस्था और मान्यता पर आधारित है, इसका कोई वैज्ञानिक प्रमाण नहीं है.

1761 में बना था मोती डूंगरी गणेश मंदिर

मोती डूंगरी गणेश मंदिर का इतिहास जयपुर के पुराने धार्मिक स्थलों से जुड़ा हुआ है. राजस्थान देवस्थान विभाग और अन्य सरकारी पर्यटन स्रोतों के मुताबिक, मंदिर का निर्माण 1761 में सेठ जय राम पालीवाल की देखरेख में हुआ था. इसके पीछे एक प्रसिद्ध कथा भी जुड़ी है. कहा जाता है कि मेवाड़ के राजा एक विशाल गणेश प्रतिमा को बैलगाड़ी में लेकर जा रहे थे.

उन्होंने तय किया था कि जहां बैलगाड़ी रुक जाएगी, वहीं भगवान गणेश का मंदिर बनाया जाएगा. बैलगाड़ी मोती डूंगरी की पहाड़ी के पास रुक गई और इसी स्थान पर मंदिर का निर्माण कराया गया.

मोती डूंगरी यानी 'मोती जैसी पहाड़ी', आज जयपुर की पहचान

मंदिर का नाम पास की मोती डूंगरी पहाड़ी से पड़ा है. 'मोती डूंगरी' का अर्थ मोती जैसी पहाड़ी माना जाता है. आज यह मंदिर जयपुर के सबसे प्रसिद्ध धार्मिक स्थलों में शामिल है. यहां भगवान गणेश के दर्शन के लिए पूरे साल श्रद्धालुओं की भीड़ रहती है और बुधवार को विशेष रूप से बड़ी संख्या में भक्त पहुंचते हैं.

मंदिर की पहचान केवल गणेश चतुर्थी से नहीं, बल्कि अलग-अलग धार्मिक उत्सवों और अनोखी प्रसाद परंपराओं से भी बनी हुई है. गणेश चतुर्थी, जन्माष्टमी, अन्नकूट और पौष बड़ा जैसे अवसरों पर यहां विशेष आयोजन होते हैं.

मोती डूंगरी की मेहंदी की कहानी इसी धार्मिक विरासत का एक दिलचस्प हिस्सा है. एक तरफ 1761 से मंदिर की ऐतिहासिक पहचान जुड़ी है, तो दूसरी तरफ करीब दो सदियों से चली आ रही बताई जाने वाली मेहंदी परंपरा ने इसे खास धार्मिक मान्यता दे दी है. हर साल सिंजारा पर उमड़ने वाली भीड़ बताती है कि जयपुर के लोगों के साथ-साथ देश के अलग-अलग हिस्सों में भी इस परंपरा को लेकर गहरी आस्था है.

क्या है सिंजारा उत्सव और क्या है इसकी मान्यता और मेहंदी का महत्व

जयपुर के मोती डूंगरी गणेश मंदिर में गणेश चतुर्थी से एक दिन पहले (सिंजारा उत्सव पर) भगवान गणेश को भारी मात्रा में मेहंदी अर्पित की जाती है और इसे प्रसाद के रूप में भक्तों को बांटा जाता है. यह मान्यता है कि इस मोती डूंगरी गणेश मंदिर की मेहंदी को हाथों में लगाने से विवाह में आ रही बाधाएं दूर होती हैं और एक साल के भीतर ही शीघ्र विवाह के योग बनते हैं.

मंदिर से जुड़ी धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, भगवान गणेश को मेहंदी अर्पित करने और प्रसाद बांटने की यह अनोखी परंपरा लगभग 200 साल पुरानी है. समय के साथ इस परंपरा का दायरा बहुत बढ़ गया है. पहले जहां सवा किलो मेहंदी चढ़ाई जाती थी, वहीं अब उत्सव के दौरान हजारों किलो (जैसे 3500 किलो तक) मेहंदी बप्पा को अर्पित की जाती है और भक्तों में उसका निःशुल्क वितरण किया जाता है.

क्या है मंदिर का इतिहास, क्या है इसके पीछे की कहानी

जयपुर के प्रसिद्ध मोती डूंगरी गणेश मंदिर का इतिहास लगभग 265 वर्ष पुराना है. यह मंदिर न केवल अपनी धार्मिक महत्ता बल्कि अपनी अनूठी स्थापना और वास्तुकला के लिए भी जाना जाता है. इस भव्य मंदिर का निर्माण वर्ष 1761 में जयपुर के महाराजा सवाई माधोसिंह प्रथम के कार्यकाल के दौरान सेठ जय राम पालीवाल की देखरेख में हुआ था. मंदिर में स्थापित भगवान गणेश की सिंदूरी रंग की प्रतिमा बेहद प्राचीन है. जब 1761 में इसे यहां स्थापित किया गया, तब भी यह प्रतिमा करीब 500 वर्ष पुरानी थी.

इसे महाराजा माधोसिंह प्रथम की पटरानी के पीहर (उदयपुर/मेवाड़ के मावली क्षेत्र) से लाया गया था, जिसे मूल रूप से गुजरात से वहां लाया गया था यहां विराजमान बप्पा की सूंड दाहिनी ओर मुड़ी हुई है, जिन्हें तांत्रिक और दक्षिणमुखी गणेश माना जाता हैस्थानीय लोक मान्यताओं और इतिहास के अनुसार, जब मेवाड़ से गणेश जी की इस विशाल और भारी प्रतिमा को जयपुर लाया जा रहा था, तो उसे एक बैलगाड़ी पर रखा गया था.

राजा ने संकल्प लिया था कि यह बैलगाड़ी यात्रा के दौरान जहां पहली बार खुद से रुक जाएगी, बप्पा का मंदिर उसी स्थान पर बनाया जाएगा. जैसे ही गाड़ी मोती डूंगरी पहाड़ी की तलहटी में पहुंची, बैल वहीं रुक गए. इसे भगवान की इच्छा मानकर इसी स्थान पर मंदिर का निर्माण कराया गया.

कैसे पड़ा मोती डूंगरी नाम

यह मंदिर जिस पहाड़ी की तलहटी में स्थित है, उसका आकार गोल और चिकना है, जो देखने में एक मोती की बूंदजैसा लगता है. राजस्थान में छोटी पहाड़ी को 'डूंगरी' कहते हैं,इसलिए इसका नाम मोती डूंगरी पड़ा. पहाड़ी के ऊपर बना किला एक स्कॉटिश महल के मॉडल पर आधारित है. मंदिर का ढांचा पारंपरिक नागर शैली में चूने और संगमरमर के पत्थरों से मात्र 4 महीने में तैयार किया गया था.

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