जब अर्जुन ने बनाया था बाणों का पुल, हनुमान जी के एक कदम से गया था टूट, आखिर क्या है अर्जुन के रथ से बजरंग बली का संबंध
कहा जाता है कि अर्जुन को अपनी धनुर्विद्या पर इतना गर्व हो गया था कि उन्होंने दावा कर दिया कि वे बाणों से ऐसा पुल बना सकते हैं, जो भगवान राम के पत्थरों के सेतु से भी मजबूत हो.
आखिर क्यों हनुमान जी के उतरते ही अर्जुन का रथ हो गया था राख
महाभारत काल की कई कथाएं आज भी लोगों को हैरान कर देती हैं, लेकिन अर्जुन और हनुमान जी से जुड़ा यह प्रसंग सबसे अनोखा माना जाता है. एक तरफ थे अद्वितीय धनुर्धर अर्जुन, जिन्हें अपनी तीरंदाजी पर गर्व था, तो दूसरी ओर थे अपार शक्ति के स्वामी हनुमान जी. दोनों के बीच हुई एक छोटी-सी बहस ने ऐसी घटना को जन्म दिया, जिसका असर आगे चलकर महाभारत युद्ध तक देखने को मिला.
कहा जाता है कि अर्जुन ने अपने बाणों से ऐसा पुल बनाया था, जिस पर उन्हें पूरा भरोसा था. लेकिन हनुमान जी के एक कदम रखते ही वह पुल टूट गया और अर्जुन का अभिमान भी चकनाचूर हो गया. इसके बाद भगवान श्रीकृष्ण की लीला से जो रहस्य सामने आया, उसने न केवल अर्जुन को विनम्रता का पाठ सिखाया, बल्कि यह भी बताया कि आखिर महाभारत के युद्ध में अर्जुन के रथ और बजरंग बली का क्या गहरा संबंध था.
जब अर्जुन ने दी हनुमान जी को चुनौती
कहा जाता है कि एक बार अर्जुन रामेश्वरम पहुंचे. वहां उनकी मुलाकात हनुमान जी से हुई. बातचीत के दौरान अर्जुन को अपनी धनुर्विद्या पर गर्व हो गया. उन्होंने कहा कि यदि वे भगवान राम के समय होते, तो समुद्र पर पत्थरों का पुल बनाने की आवश्यकता नहीं पड़ती. वे अपने बाणों से ऐसा मजबूत पुल बना देते, जिस पर पूरी वानर सेना आसानी से चल सकती थी. हनुमान जी को अर्जुन की यह बात अहंकार से भरी लगी. उन्होंने अर्जुन की बात को परखने का निश्चय किया और उन्हें चुनौती दे दी.
बाणों का पुल और श्रीकृष्ण की परीक्षा
अर्जुन ने अपनी दिव्य शक्ति से बाणों का एक सुंदर और मजबूत पुल तैयार कर दिया. हनुमान जी ने उसकी मजबूती जांचने के लिए उस पर कदम रखा. पहले ही प्रयास में पुल टूट गया. अर्जुन को अपनी क्षमता पर संदेह होने लगा और वे बहुत निराश हो गए. तब श्रीकृष्ण एक साधारण व्यक्ति के रूप में वहां पहुंचे और दोनों को दोबारा प्रयास करने के लिए कहा. अर्जुन ने फिर से पुल बनाया. इस बार जब हनुमान जी उस पर चढ़े, तो पुल नहीं टूटा. बाद में श्रीकृष्ण ने बताया कि उन्होंने स्वयं कछुए का रूप धारण कर पुल को अपनी पीठ पर संभाला था. तभी वह हनुमान जी का भार सह सका.
महाभारत युद्ध में निभाया वचन
इस घटना के बाद दोनों का अहंकार समाप्त हो गया. हनुमान जी ने अर्जुन को वचन दिया कि वे महाभारत युद्ध के दौरान उनके रथ की ध्वजा पर विराजमान रहेंगे और उनकी रक्षा करेंगे. कहा जाता है कि युद्ध के पूरे 18 दिनों तक हनुमान जी अर्जुन के रथ पर उपस्थित रहे. उनकी दिव्य शक्ति के कारण अर्जुन का रथ अनेक घातक अस्त्रों के प्रहार झेलने के बाद भी सुरक्षित रहा.
जब भस्म हुआ था अर्जुन का रथ
महाभारत युद्ध समाप्त होने के बाद श्रीकृष्ण ने अर्जुन को पहले रथ से उतरने के लिए कहा. जब अर्जुन नीचे उतर गए और फिर श्रीकृष्ण भी रथ से उतरे, तब हनुमान जी ध्वज से अदृश्य हो गए. इसके तुरंत बाद अर्जुन का रथ आग की लपटों में घिरकर जल गया. श्रीकृष्ण ने बताया कि युद्ध के दौरान रथ पर कई दिव्य अस्त्रों का प्रभाव जमा हुआ था. हनुमान जी और उनकी स्वयं की उपस्थिति के कारण ही वह अब तक सुरक्षित था. यह दृश्य अर्जुन को यह समझाने के लिए पर्याप्त था कि विजय केवल उनकी वीरता से नहीं, बल्कि ईश्वर की कृपा और दैवीय संरक्षण से मिली थी.




