World Health Day 2026: पुष्पा नाम सुनकर फ्लावर समझे क्या, फायर है मैं… ब्रेस्ट कैंसर को मात दे जिंदगी को बनाया खूबसूरत
आजकल कैंसर एक गंभीर समस्या बन गया है. महिलाएं ब्रेस्ट कैंसर की चपेट में आ रही हैं. इसी खतरनाक बीमारी को पुष्पा सिंह ने मात दी और बताया कि अगर जीने का साहस सबकुछ बदल देता है.
ब्रेस्ट कैंसर को मात देने वालीं पुष्पा सिंह की कहानी
पुष्पा नाम सुनकर फ्लावर समझे क्या, फायर है मैं… यह संवाद भले ही फिल्मी हो, लेकिन जो लोग पुष्पा सिंह को जानते हैं, उनके लिए यह उनकी असली पहचान जैसा है. पुष्पा सिंह की कहानी सिर्फ कैंसर से लड़ने की नहीं है. यह कहानी है उठ खड़े होने की, जीने की और दूसरों के लिए सहारा बनने की. साल 2014 में उन्होंने अपने जीवनसाथी को खो दिया. यह एक ऐसा दुख था जिसने उनकी जिंदगी की दिशा ही बदल दी. वह अभी इस दर्द को संभाल ही रही थीं कि 2016 में 57 वर्ष की उम्र में उन्हें ब्रेस्ट कैंसर का पता चला. यह खबर किसी को भी अंदर तक हिला सकती है, लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी और तय किया कि यह बीमारी उनकी पहचान नहीं बनेगी.
उन्होंने कहा, 'मृत्यु तो एक दिन सभी को आनी है, लेकिन उससे पहले जीने के लिए एक खूबसूरत जिंदगी भी है.' इसके बाद जो सफर शुरू हुआ, वह सिर्फ इलाज का नहीं था बल्कि वो साहस, धैर्य और अडिग इच्छाशक्ति का सफर था. यह राह आसान नहीं थी. दर्द, अनिश्चितता, अस्पताल के लंबे दिन और कई रातों की बेचैनी सब कुछ था, लेकिन उनकी ताकत शांत, स्थिर और अटूट थी जो हर दिन उन्हें आगे बढ़ाती रही. पति के जाने के बाद जो खालीपन आया, वह कभी-कभी आज भी महसूस होता था. परिवार में दो बेटे, बहुएं और प्यारे पोते थे मगर उनके साथ होने के बावजूद, कुछ पल ऐसे आते थे जब अकेलापन चुपचाप दस्तक देता था, लेकिन उन्होंने अकेलेपन को अपनी पहचान नहीं बनने दिया. उन्होंने अपनी कहानी खुद लिखी.
दूसरों के लिए एक मजबूत सहारा बनीं पुष्पा
वह एक सोलो ट्रैवलर बन गईं. निडर होकर देश के कोने-कोने में घूमने लगीं. पहाड़ों से लेकर समंदर तक, भीड़भाड़ वाले शहरों से लेकर शांत गांवों तक, उन्होंने सिर्फ जगहें नहीं देखीं, बल्कि खुद को फिर से खोजा. हर यात्रा के साथ उन्होंने साबित किया कि जिंदगी रुकती नहीं है, बल्कि नए रूप में आगे बढ़ती है. उन्होंने तकनीक को भी उतनी ही लगन से अपनाया. स्मार्टफोन और सोशल मीडिया सीखकर, उन्होंने व्हाट्सएप स्टेटस के जरिए अपनी जिंदगी के छोटे-छोटे पल साझा करने शुरू किए. उनकी मुस्कान, उनके सफर, उनकी जीत. ये सिर्फ पोस्ट नहीं थे, बल्कि उम्मीद और आत्मनिर्भरता के प्रतीक भी थे, लेकिन उनकी सबसे खास बात सिर्फ उनका खुद का संघर्ष नहीं है बल्कि दूसरों के लिए उनका साथ है.
अपने दर्द और अनुभवों से गुजरने के बाद, वह दूसरों के लिए एक मजबूत सहारा बन गईं. जब भी कोई दोस्त, रिश्तेदार या पड़ोसी मुश्किल समय से गुजरता, चाहे वह दुख हो, बीमारी हो या मानसिक तनाव-पुष्पा सिंह उनके साथ खड़ी रहतीं. कभी शब्दों के साथ, कभी खामोशी से और कभी सिर्फ अपनी उपस्थिति से. उन्होंने दर्द को समझा है, सिर्फ सुना नहीं, बल्कि जिया है इसलिए उनका साथ लोगों को सुकून देता है.
समाज में भी उन्होंने अपनी एक अलग पहचान बनाई है. वह लोगों को हिम्मत देती हैं, उन्हें संभालती हैं और जरूरत पड़ने पर बिना किसी अपेक्षा के मदद करती हैं. उनकी जिंदगी यह सिखाती है कि असली जीत सिर्फ खुद संभलने में नहीं, बल्कि दूसरों को संभालने में भी है. उनके पोते उनके जीवन का जश्न हैं ऐसा मानती हैं वो और उनके लिए ही जीने की लालसा रखती हैं. उनकी खिलखिलाहट, उनकी ऊर्जा मिसाल है लेकिन उन्होंने अपनी दुनिया को सीमित नहीं होने दिया, बल्कि उसे और बड़ा किया. पिछले दस वर्षों से वह नियमित रूप से अपनी जांच और इलाज का ध्यान रख रही हैं. उन्होंने कभी शिकायत नहीं की, न दर्द की, न परिस्थितियों की. उन्होंने हमेशा कृतज्ञता को चुना. वह अपने अतीत को दुख के साथ नहीं, बल्कि गर्व के साथ देखती हैं.
कैंसर को कोई भी हरा सकता है- पुष्पा
उन्होंने कहा, 'मैं पुष्पा हूं- एक फूल, जो सुंदर है लेकिन क्षणभंगुर भी… और मैं सिंह भी हूं- बेख़ौफ़. उनका नाम ही उनकी पहचान है. नरमी और ताकत का संगम.' आंखों में आंसू और चेहरे पर मुस्कान के साथ, वह अपने सफर को याद करती हैं और उस दूरी को महसूस करती हैं जो उन्होंने तय की है. उनका इलाज दिल्ली स्टेट कैंसर इंस्टीट्यूट हुआ. उन्होंने कहा कि डॉक्टरों और स्टाफ का दिल से धन्यवाद करती हैं, जिन्होंने हर मुश्किल घड़ी में उनका साथ दिया और सबसे ऊपर, वह भगवान का धन्यवाद करती हैं, जिन्होंने उन्हें जिंदगी का हर एक दिन नया दिया. उन्होंने कहा कि अगर मैं कैंसर से जीत सकती हूं, तो कोई भी जीत सकता है. बस अपनी ताकत को कभी मत भूलो.'




