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फोन नहीं हुआ वाइब्रेट, फिर भी क्यों लगता है आ रही है कॉल या नोटिफिकेशन? तेज़ी से इस सिंड्रोम का शिकार हो रहे लोग

मोबाइल फोन आज हमारी जिंदगी का अहम हिस्सा बन चुका है, लेकिन इसके साथ कुछ अजीब मनोवैज्ञानिक अनुभव भी सामने आने लगे हैं. कई लोग बिना किसी नोटिफिकेशन के भी फोन के वाइब्रेट होने का एहसास करते हैं. विशेषज्ञ इसे फैंटम वाइब्रेशन सिंड्रोम कहते हैं, जो बढ़ती डिजिटल निर्भरता का एक दिलचस्प संकेत माना जा रहा है.

Phantom Vibration Syndrome what is it and how people impacting from it
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( Image Source:  AI GENERATED IMAGE- SORA )

Phantom Vibration Syndrome: आज की डिजिटल दुनिया में मोबाइल फोन हमारी रोजमर्रा की जिंदगी का अहम हिस्सा बन चुका है. सुबह उठने से लेकर रात को सोने तक अधिकांश लोग अपने स्मार्टफोन के संपर्क में रहते हैं. कॉल, मैसेज, सोशल मीडिया नोटिफिकेशन और ईमेल की लगातार आवाजाही ने हमारी दिनचर्या को काफी हद तक प्रभावित किया है.

इसी बदलती जीवनशैली के साथ एक नया साइकोलोजिकल एक्सपीरियंस तेजी से लोग महसूस करने लगे हैं, जिसे फैंटम वाइब्रेशन सिंड्रोम कहा जाता है. इसमें व्यक्ति को ऐसा महसूस होता है कि उसका फोन वाइब्रेट हुआ है या कोई नोटिफिकेशन आया है, जबकि वास्तव में ऐसा कुछ नहीं हुआ होता.

क्या यह है कोई मानसिक बीमारी?

इस समस्या को लेकर हमने Dr.Vinit Banga, (Director-Neurology Fortis Hospital, Faridabad) से बात की, उन्होंने बताया कि फैंटम वाइब्रेशन सिंड्रोम कोई आधिकारिक तौर पर मानसिक बीमारी नहीं माना जाता, लेकिन मनोविज्ञान और न्यूरोसाइंस के क्षेत्र में इस पर काफी शोध हुआ है. विशेषज्ञों के अनुसार यह स्थिति तब पैदा होती है जब हमारा दिमाग मोबाइल से आने वाले संकेतों का अनुमान लगाने लगता है और कई बार बिना किसी वास्तविक कंपन के भी उसे महसूस कर लेता है. इसके साथ ही किसी बात का स्ट्रेस और लाइफस्टाइल में बदलाव भी इसे ट्रिगर करते हैं.

क्या है फैंटम वाइब्रेशन सिंड्रोम?

फैंटम वाइब्रेशन सिंड्रोम उस अनुभव को कहा जाता है जिसमें व्यक्ति को लगता है कि उसका फोन जेब में या बैग में वाइब्रेट हुआ या फिर बजा है, जबकि असल में ऐसा नहीं हुआ होता. कई बार व्यक्ति तुरंत फोन निकालकर देखता है और उसे पता चलता है कि कोई कॉल, मैसेज या नोटिफिकेशन नहीं आया है. फैंटम वाइब्रेशन सिंड्रोम की इनतेहां तो इतनी होती है कि लोगों को अकसर अपनी शरीर पर रखी फोन में वाइब्रेशन तक महसूस होती है.

इस अनुभव को फैंटम फोन वाइब्रेशन या फैंटम नोटिफिकेशन भी कहा जाता है. यह अनुभव स्मार्टफोन के बढ़ते उपयोग के साथ अधिक आम होता जा रहा है. कुछ लोगों को यह दिन में कई बार महसूस होता है.

कई अध्ययनों के मुताबिक स्मार्टफोन उपयोग करने वाले बड़ी संख्या में लोग अपने जीवन में कम से कम एक बार इस अनुभव से गुजर चुके हैं और गुजर रह हैं. हालांकि ज्यादातर मामलों में यह स्थिति अस्थायी होती है और गंभीर समस्या में नहीं बदलती. हालांकि, कुछ मामलों में इसने गंभीर रूप भी लिया है.

क्या कहती हैं रिसर्च?

फैंटम वाइब्रेशन सिंड्रोम पर कई वैज्ञानिक अध्ययन किए जा चुके हैं. 2012 में जर्नल कंप्यूटर्स इन ह्यूमन बिहेवियर में पब्लिश एक स्टडी में पाया गया कि स्मार्टफोन इस्तेमाल करने वाले लोगों में से लगभग 80 से 90 प्रतिशत ने कभी न कभी फैंटम वाइब्रेशन का अनुभव किया है.

इसी तरह इंडियाना यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं द्वारा किए गए एक अध्ययन में पाया गया कि कॉलेज छात्रों और मेडिकल इंटर्न में यह अनुभव काफी आम है. अध्ययन के दौरान करीब 89 प्रतिशत प्रतिभागियों ने बताया कि उन्हें कभी न कभी ऐसा लगा कि उनका फोन वाइब्रेट हुआ है, जबकि वास्तव में ऐसा नहीं था.

2016 में किए गए एक अन्य अध्ययन में पाया गया कि जो लोग अपने फोन को ज्यादा बार चेक करते हैं या लगातार नोटिफिकेशन का इंतजार करते रहते हैं, उनमें यह अनुभव अधिक पाया जाता है.

मनोविज्ञान के विशेषज्ञों का मानना है कि यह घटना हमारे मस्तिष्क की अपेक्षा और सतर्कता से जुड़ी हुई है. जब हम लगातार फोन पर आने वाले संदेशों की प्रतीक्षा करते हैं, तो हमारा दिमाग छोटे-छोटे शारीरिक संकेतों को भी फोन की वाइब्रेशन के रूप में समझ सकता है.

Phantom Vibration Syndrome – Research Facts

2012 Study

Journal *Computers in Human Behavior* में रिसर्च.

80–90% स्मार्टफोन यूजर्स ने फैंटम वाइब्रेशन महसूस किया.

Indiana University Research

कॉलेज स्टूडेंट्स और मेडिकल इंटर्न पर अध्ययन.

करीब 89% प्रतिभागियों ने ऐसा अनुभव बताया.

2016 Study

जो लोग बार-बार फोन चेक करते हैं.

उनमें यह अनुभव ज्यादा पाया गया.

Psychology View

दिमाग नोटिफिकेशन की उम्मीद करता रहता है.

छोटे संकेत भी वाइब्रेशन जैसे लगते हैं.

80–90% स्मार्टफोन यूजर्स ने कभी न कभी Phantom Vibration महसूस किया

दिमाग कैसे पैदा करता है यह एहसास?

फैंटम वाइब्रेशन सिंड्रोम को समझने के लिए यह जानना जरूरी है कि हमारा दिमाग बाहरी संकेतों को कैसे समझता है. मानव मस्तिष्क लगातार आसपास के वातावरण से आने वाले संकेतों को प्रोसेस करता रहता है. इनमें स्पर्श, ध्वनि और दृश्य संकेत शामिल होते हैं.

जब कोई व्यक्ति लंबे समय तक फोन को जेब में रखकर चलता है और नियमित रूप से फोन की वाइब्रेशन महसूस करता है, तो उसका दिमाग उस अनुभव का एक पैटर्न बना लेता है. इसके बाद कभी-कभी कपड़ों की हल्की हलचल, मांसपेशियों की हल्की हरकत या त्वचा पर हल्का दबाव भी दिमाग को फोन की वाइब्रेशन जैसा लग सकता है. न्यूरोसाइंस के अनुसार यह एक तरह का सेंसरी मिसइंटरप्रिटेशन है. यानी शरीर से आने वाले सामान्य संकेतों को दिमाग गलत तरीके से समझ लेता है.

यह प्रक्रिया कुछ हद तक उसी तरह होती है जैसे कई बार लोगों को लगता है कि उनका फोन बज रहा है, जबकि असल में आसपास की कोई दूसरी आवाज होती है.

क्या डिजिटल आदतों का है प्रभाव?

विशेषज्ञों का कहना है कि फैंटम वाइब्रेशन सिंड्रोम का संबंध हमारे डिजिटल व्यवहार से भी जुड़ा हुआ है. आज के समय में लोग औसतन दिन में दर्जनों बार अपना फोन चेक करते हैं. कई सर्वे बताते हैं कि कुछ लोग दिन में 100 से 200 बार तक अपना फोन देख लेते हैं.

लगातार फोन चेक करने की यह आदत दिमाग को इस बात के लिए प्रशिक्षित कर देती है कि वह किसी भी छोटे संकेत को नोटिफिकेशन के रूप में पहचानने लगे. यही वजह है कि कई बार व्यक्ति को बिना वजह फोन की वाइब्रेशन महसूस होने लगती है.

इसके अलावा सोशल मीडिया और मैसेजिंग ऐप्स भी इस स्थिति को प्रभावित करते हैं. नोटिफिकेशन का इंतजार करना, तुरंत जवाब देने का दबाव और लगातार ऑनलाइन बने रहने की आदत दिमाग को सतर्क बनाए रखती है.

How Phantom Vibration Happens

Brain Processing

दिमाग लगातार स्पर्श, आवाज और दृश्य संकेतों को समझता है.

Pattern Formation

फोन जेब में रखने से दिमाग वाइब्रेशन का पैटर्न बना लेता है.

Minor Body Signals

कपड़ों की हलचल या मांसपेशियों की हरकत संकेत बन जाते हैं.

Sensory Misinterpretation

दिमाग सामान्य संकेत को फोन वाइब्रेशन समझ लेता है.

किन लोगों में अधिक देखने को मिलता है ये सिंड्रोम?

अध्ययनों से पता चलता है कि फैंटम वाइब्रेशन सिंड्रोम कुछ खास समूहों में अधिक पाया जाता है. जिन लोगों का काम मोबाइल पर ज्यादा निर्भर करता है, जैसे पत्रकार, डॉक्टर, आईटी प्रोफेशनल या बिजनेस से जुड़े लोग, उनमें यह अनुभव अधिक देखा गया है. ऐसे लोग अक्सर कॉल या मैसेज का इंतजार करते रहते हैं.

मेडिकल इंटर्न और स्वास्थ्य क्षेत्र में काम करने वाले कर्मचारियों पर किए गए शोध में भी यह पाया गया कि ड्यूटी के दौरान लगातार कॉल आने की वजह से उनमें फैंटम वाइब्रेशन का अनुभव अधिक होता है. इसके अलावा जो लोग फोन को ज्यादातर समय अपनी जेब में रखते हैं या वाइब्रेशन मोड पर रखते हैं, उनमें भी इसकी संभावना अधिक होती है.

किन लोगों में ज्यादा होता है Phantom Vibration Syndrome?
📰

Journalists

कॉल और मैसेज का लगातार इंतजार.

🩺

Doctors

ड्यूटी के दौरान लगातार कॉल.

💻

IT Professionals

काम के लिए फोन और नोटिफिकेशन पर निर्भरता.

📱

Heavy Phone Users

फोन जेब में और वाइब्रेशन मोड पर.

जिन लोगों का काम मोबाइल पर ज्यादा निर्भर करता है, उनमें Phantom Vibration Syndrome की संभावना अधिक देखी गई है।

क्या यह मानसिक समस्या है?

फैंटम वाइब्रेशन सिंड्रोम को आम तौर पर गंभीर मानसिक बीमारी नहीं माना जाता. अधिकतर विशेषज्ञ इसे एक सामान्य मनोवैज्ञानिक अनुभव के रूप में देखते हैं, जो स्मार्टफोन के अत्यधिक उपयोग से जुड़ा हुआ है. हालांकि यदि किसी व्यक्ति को यह अनुभव बहुत बार होने लगे, उसके कारण चिंता या तनाव बढ़ने लगे या वह लगातार फोन चेक करने लगे, तो यह डिजिटल निर्भरता या तकनीकी तनाव का संकेत हो सकता है.

कुछ स्टडीज़ में यह भी पाया गया है कि जिन लोगों में चिंता का स्तर ज्यादा होता है या जो हमेशा सतर्क रहने की स्थिति में रहते हैं, उनमें भी यह अनुभव अधिक हो सकता है.

क्या इससे कोई स्वास्थ्य जोखिम है?

सामान्य परिस्थितियों में फैंटम वाइब्रेशन सिंड्रोम से कोई सीधा शारीरिक नुकसान नहीं होता. लेकिन यह हमारी डिजिटल आदतों के बारे में संकेत जरूर देता है. अगर किसी व्यक्ति को दिन में कई बार ऐसा महसूस होने लगे कि उसका फोन वाइब्रेट हुआ है, तो यह इस बात का संकेत हो सकता है कि वह अपने फोन पर जरूरत से ज्यादा निर्भर हो चुका है.

लगातार फोन चेक करने की आदत नींद की गुणवत्ता, ध्यान क्षमता और मानसिक शांति को प्रभावित कर सकती है. कई अध्ययनों में पाया गया है कि स्मार्टफोन का अत्यधिक उपयोग तनाव और डिजिटल थकान से जुड़ा हुआ है. कई लोगों में देखा गया है कि जब भी वह ये फैंटम वाइब्रेशन महसूस करते हैं तो उनकी हार्टबीट तेजी से बढ़ती है और स्ट्रेस लेवल में भी इज़ाफा हो जाता है.

कैसे कम किया जा सकता है यह अनुभव?

विशेषज्ञों के अनुसार कुछ साधारण बदलाव करके फैंटम वाइब्रेशन के अनुभव को कम किया जा सकता है. सबसे पहला तरीका है फोन को लगातार वाइब्रेशन मोड पर रखने से बचना. यदि फोन को साइलेंट या रिंग मोड पर रखा जाए तो वाइब्रेशन की आदत कम हो सकती है. फोन को जेब में रखने की बजाय बैग या मेज पर रखने से भी यह अनुभव कम हो सकता है, क्योंकि शरीर को बार-बार कंपन जैसा संकेत नहीं मिलता.

नोटिफिकेशन सेटिंग्स को सीमित करना भी एक उपयोगी उपाय है. केवल जरूरी ऐप्स के नोटिफिकेशन चालू रखने से दिमाग पर आने वाले संकेतों की संख्या कम हो जाती है. डिजिटल डिटॉक्स यानी कुछ समय के लिए फोन से दूरी बनाना भी मददगार हो सकता है. कई विशेषज्ञ सलाह देते हैं कि दिन के कुछ हिस्सों में फोन को दूर रखकर काम करना या आराम करना दिमाग को शांत रखने में मदद करता है.

तकनीक और मानव व्यवहार

फैंटम वाइब्रेशन सिंड्रोम इस बात का एक दिलचस्प उदाहरण है कि नई तकनीकें हमारे दिमाग और व्यवहार को किस तरह प्रभावित कर सकती हैं. स्मार्टफोन ने संचार को आसान बना दिया है, लेकिन इसके साथ-साथ यह हमारे ध्यान, आदतों और मानसिक प्रतिक्रियाओं को भी बदल रहा है.

मनोविज्ञान के विशेषज्ञों का मानना है कि जैसे-जैसे तकनीक विकसित होती जाएगी, वैसे-वैसे मानव व्यवहार में भी नए बदलाव देखने को मिलेंगे. फैंटम वाइब्रेशन सिंड्रोम इन्हीं बदलावों में से एक है, जो यह दिखाता है कि हमारा दिमाग डिजिटल संकेतों के साथ किस तरह तालमेल बैठाने की कोशिश करता है.

हालांकि अधिकतर मामलों में यह अनुभव सामान्य और अस्थायी होता है. लेकिन यह हमें यह सोचने का अवसर जरूर देता है कि हम अपने स्मार्टफोन का उपयोग किस हद तक कर रहे हैं और क्या हमें अपनी डिजिटल आदतों में संतुलन लाने की जरूरत है.

हेल्‍थस्टेट मिरर स्पेशल
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