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Makar Sankranti 2026: क्या है मकर संक्रांति पर पतंग उड़ाने की परंपरा, श्री कृष्ण से जुड़ा इतिहास!

Makar Sankranti 2026: भारत का एक प्रमुख पर्व है मकर संक्रांति जो सूर्य देव के मकर राशि में प्रवेश और उत्तरायण की शुरुआत का प्रतीक माना जाता है. इस दिन पतंग उड़ाने की परंपरा सिर्फ मनोरंजन नहीं, बल्कि गहरे आध्यात्मिक और धार्मिक अर्थ से जुड़ी है. पतंग आत्मा की ऊंचाई, मोक्ष और परमात्मा से जुड़ाव का प्रतीक मानी जाती है.

Makar Sankranti 2026: क्या है मकर संक्रांति पर पतंग उड़ाने की परंपरा, श्री कृष्ण से जुड़ा इतिहास!
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( Image Source:  Create By AI Sora )
रूपाली राय
Edited By: रूपाली राय

Updated on: 11 Jan 2026 10:28 AM IST

Makar Sankranti 2026: संक्रांति, यानी मकर संक्रांति, हमारे भारत देश की संस्कृति और परंपराओं की एक बहुत बड़ी और खूबसूरत पहचान है. यह त्योहार पूरे भारत में और नेपाल में भी बड़े उत्साह और भक्ति के साथ मनाया जाता है. अलग-अलग राज्यों में इसे अलग-अलग नामों से जाना जाता है, जैसे गुजरात में उत्तरायण, तमिलनाडु में पोंगल, पंजाब में लोहड़ी, असम में माघ बिहू, और महाराष्ट्र में मकर संक्रांति. हर जगह इसके रीति-रिवाज थोड़े अलग होते हैं, लेकिन खुशी, फसल की कटाई और सूर्य देव की पूजा का भाव एक जैसा रहता है.

इस त्योहार की सबसे रोमांचक और सबको पसंद आने वाली बात है पतंग उड़ाने की परंपरा. आसमान रंग-बिरंगी पतंगों से भर जाता है, बच्चे-बूढ़े सब छतों पर चढ़कर मस्ती करते हैं, 'कैचे बो' और 'यो यो' की आवाजें गूंजती हैं. लेकिन दोस्तों, क्या आप जानते हैं कि संक्रांति पर पतंग उड़ाने की यह परंपरा सिर्फ खेल या मनोरंजन के लिए नहीं है? इसके पीछे बहुत गहरा आध्यात्मिक, धार्मिक और वैज्ञानिक महत्व छिपा हुआ है.

पतंग उड़ाने का आध्यात्मिक महत्व

पतंग उड़ाना सिर्फ एक मजेदार गतिविधि नहीं, बल्कि हमारी आत्मा की यात्रा का बहुत सुंदर प्रतीक है.

-आत्मा की ऊंचाई और परमात्मा से मिलन- जैसे पतंग हवा के सहारे ऊपर उठती है और आसमान में बहुत ऊंचा चली जाती है, वैसे ही हमारी आत्मा भी भगवान की कृपा और सच्चे भक्ति के सहारे ऊंचा उठती है और परमात्मा के साथ एक होने की इच्छा रखती है. यह आत्मज्ञान की ओर बढ़ने और अलौकिक अवस्था प्राप्त करने की यात्रा को दर्शाता है.

-मोक्ष और मुक्ति का संकेत- जब पतंग पूरी तरह आजाद होकर आसमान में लहराती है, तो यह हमारे लिए मोक्ष या मुक्ति का प्रतीक बन जाती है यानी हम भौतिक दुनिया के बंधनों, अहंकार और सांसारिक सीमाओं से आजाद होकर ऊपर उठ सकते हैं. यह हमें सिखाता है कि सही मार्ग पर चलें तो हम भी ऊंचाइयों को छू सकते हैं.

-भगवान श्रीकृष्ण और कर्मों का संबंध- कुछ महान ग्रंथों जैसे 'श्रीकृष्ण चरित मानस' में बताया गया है कि पतंग की तरह हमारी आत्मा भगवान कृष्ण की कृपा से ऊपर उठती है. पतंग का धागा हमारे कर्मों का प्रतीक है जैसे हम धागे को हाथ में पकड़कर पतंग को नियंत्रित करते हैं, वैसे ही भगवान कृष्ण हमारे कर्मों को सही दिशा देते हैं और हमें आध्यात्मिक ऊंचाई तक ले जाते हैं. जब हम अच्छे कर्म करते हैं और भगवान से जुड़ाव मजबूत रखते हैं, तो हमारी आत्मा भी ऊंचा उड़ान भरती है.

सूर्य देव और नई शुरुआत का संबंध

संक्रांति का सबसे बड़ा महत्व है इस दिन सूर्य देव मकर राशि में प्रवेश करते हैं, जिसे उत्तरायण कहते हैं. यह सूर्य के उत्तर दिशा की ओर बढ़ने का समय है, जो सर्दी के अंत और गर्मी-बहारी मौसम की शुरुआत का प्रतीक है. सूर्य जीवन, ऊर्जा और प्रकाश का स्रोत हैं इसलिए इस दिन सूर्योदय के समय या सुबह-सुबह पतंग उड़ाना सूर्य की शक्ति को नमन करने, उनके आशीर्वाद से ज्ञान, स्वास्थ्य और मुक्ति की कामना करने का तरीका है. पतंग आसमान में जितनी ऊंची जाती है, उतना ही हम सूर्य के करीब पहुंचने की भावना महसूस करते हैं. यह नई शुरुआत, सकारात्मक ऊर्जा और पुरानी नकारात्मकता को दूर करने का संदेश देता है.

अन्य खास बातें और मान्यताएं

कुछ धार्मिक कथाओं के अनुसार इस परंपरा की शुरुआत भगवान श्रीराम से जुड़ी है. तमिल रामायण में वर्णन है कि भगवान राम ने मकर संक्रांति के दिन पतंग उड़ाई थी, जो इतनी ऊंची गई कि इंद्रलोक तक पहुंच गई तभी से यह परंपरा चली आ रही है. इस बार जब आप संक्रांति पर पतंग उड़ाएं, तो सिर्फ मस्ती न करें, बल्कि इसके पीछे छिपे इस गहरे आध्यात्मिक अर्थ को भी महसूस करें. पतंग को ऊपर जाते हुए देखें और सोचें कि हमारी आत्मा भी ऐसे ही ऊंचा उठ सकती है, अगर हम सही कर्म करें और भगवान से जुड़े रहें.

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