AI Layoffs का नया वार, क्यों 40+ उम्र वाले प्रोफेशनल्स हो रहे सबसे ज्यादा शिकार?
AI और कॉस्ट कटिंग के इस दौर में लेऑफ्स का ट्रेंड तेजी से बदल रहा है. अब सबसे ज्यादा असर 40+ उम्र के मिड-करियर प्रोफेशनल्स पर पड़ रहा है, जिन्हें कंपनियां ज्यादा लागत और कम लचीलापन के नजरिए से देख रही हैं.
क्यों 40+ उम्र वाले ले ऑफ का शिकार
AI और ऑटोमेशन के तेजी से बढ़ते दौर में नौकरी का बाजार भी तेजी से बदल रहा है. हाल के लेऑफ्स में एक चौंकाने वाला ट्रेंड सामने आया है. सबसे ज्यादा असर 40+ उम्र के मिड-करियर प्रोफेशनल्स पर पड़ रहा है. ये वो लोग हैं जिनके पास सालों का एक्सपीरियंस, स्टेबल करियर और अच्छी सैलरी होती है, लेकिन अब वही फैक्टर उन्हें कंपनियों के लिए महंगा और 'कम जरूरी' बना रहा है.
कंपनियां अब लागत कम करने और AI में निवेश बढ़ाने के लिए अपने स्ट्रक्चर को बदल रही हैं. ऐसे में मिड-लेवल रोल्स, जो पहले ऑर्गेनाइजेशन की रीढ़ माने जाते थे, अब धीरे-धीरे कम किए जा रहे हैं. नतीजा यह है कि 40+ प्रोफेशनल्स न सिर्फ नौकरी खोने के ज्यादा जोखिम में हैं, बल्कि नई नौकरी पाने की चुनौती भी उनके लिए पहले से ज्यादा कठिन होती जा रही है.
बदल रहा है Layoffs का पैटर्न
पहले लेऑफ्स का मतलब लो परफॉर्मेंस वाले कर्मचारियों को हटाना या जरूरत से ज्यादा हायरिंग को कम करना होता था. लेकिन अब यह ट्रेंड बदल गया है. आज कंपनियां खासतौर पर उन वर्कर्स को निशाना बना रही हैं जो एक्सपीरियंस हैं, मिड या सीनियर लेवल पर हैं, जिनकी सैलरी ज्यादा है, लेकिन वे ऑर्गेनाइजेशन के लिए “जरूरी” नहीं माने जाते है . यह एक शांत लेकिन बड़ा बदलाव है, जो कॉर्पोरेट स्ट्रक्चर को अंदर से बदल रहा है.
AI कर रहा है ‘मिड लेयर’ को रिप्लेस
पहले माना जाता था कि ऑटोमेशन और AI सबसे पहले जूनियर जॉब्स को खत्म करेगा. लेकिन अब तस्वीर उलटी दिख रही है. AI अब डेटा एनालिसिस, रिपोर्टिंग, प्रोजेक्ट मैनेजमेंट और मिड-लेवल कोडिंग जैसे काम आसानी से कर रहा है. ये वही काम हैं जिनमें मिड-करियर प्रोफेशनल्स एक्सपर्ट होते हैं. ऐसे में कंपनियां इन रोल्स को कम करके AI में निवेश बढ़ा रही हैं. यह सिर्फ लागत घटाने का कदम नहीं, बल्कि एक तरह से “रिप्लेसमेंट” है.
ज्यादा सैलरी बन रही सबसे बड़ी वजह
मिड-करियर कर्मचारियों को बनाए रखना कंपनियों के लिए महंगा पड़ता है. एक एक्सपीरियंस एम्प्लॉई की सैलरी एक जूनियर कर्मचारी से कई गुना ज्यादा होती है. इसके अलावा, उन्हें मिलने वाले बेनिफिट्स और रिटेंशन कॉस्ट भी अधिक होती है. ऐसे में जब कंपनियों को जल्दी खर्च कम करना होता है, तो यही वर्ग सबसे आसान टारगेट बन जाता है. सीधी भाषा में कहें तो, एक सीनियर कर्मचारी की जगह कई जूनियर हायर किए जा सकते हैं या वही काम AI से कराया जा सकता है.
‘Loyalty Trap’ भी बन रहा जोखिम
40 की उम्र के आसपास के प्रोफेशनल्स अक्सर लंबे समय तक एक ही कंपनी में काम करते हैं. यह स्थिरता पहले एक ताकत मानी जाती थी, लेकिन अब यही कमजोरी बनती जा रही है. कम जॉब-स्विचिंग की वजह से उनका नेटवर्क सीमित हो जाता है, इंटरव्यू का अनुभव कम हो जाता है और कई बार उनकी स्किल्स बाजार के हिसाब से अपडेट नहीं रहतीं. ऐसे में जब अचानक नौकरी जाती है, तो नई नौकरी पाना मुश्किल हो जाता है.
जब नौकरी का नुकसान बन जाता है पहचान का संकट
मिड-करियर लेऑफ्स सिर्फ आर्थिक झटका नहीं होते, बल्कि यह मानसिक और भावनात्मक स्तर पर भी असर डालते हैं.20 की उम्र में नौकरी सिर्फ करियर का हिस्सा होती है, लेकिन 40 की उम्र में यह आपकी पहचान, स्थिरता और सामाजिक स्थिति से जुड़ जाती है. ऐसे में नौकरी खोना एक बड़ा झटका बन जाता है, जो आत्मविश्वास और जीवन की दिशा दोनों को प्रभावित कर सकता है. आज जिस तरह अचानक ईमेल या सिस्टम एक्सेस बंद करके कर्मचारियों को हटाया जा रहा है, वह इस असर को और गहरा कर रहा है.




